राजस्थान-बेचारे बाघ

रणथंभौर और सरिस्का बाघ अभयारण्यों की रैंकिंग में तेज गिरावट आई है. इन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत

चंद्रभाल सिंह
चंद्रभाल सिंह

राष्ट्रीय स्तर पर बाघों की संख्या बढऩे का जश्न मनाया जा रहा है, तो राजस्थान के वन्यजीव अधिकारी सदमे में हैं. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से किए गए देश के बाघ अभयारण्यों के ऑडिट, मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवैल्यूएशन (एमईई), 2018 में राजस्थान के दो अभयारण्यों—रणथंभौर और सरिस्का—की रैंकिंग को घटाकर 'अच्छा' से 'ठीक' कर दिया गया है.

रिपोर्ट में सरिस्का बाघ अभयारण्य की धीमी प्रगति का उल्लेख किया गया है और आशंका जताई गई है कि दीर्घावधि योजना की कमी तथा खराब प्रबंधन के कारण सरिस्का अपने बाघों को खो सकता है. राजस्थान में तीन बाघ अभयारण्य हैं—रणथंभौर, सरिस्का और मुकुंदरा हिल्स—जिनमें कुल 69 बाघ रहते हैं. साल 2014 में यहां कुल 45 बाघ थे.

रैंकिंग में कमी से क्षुब्ध राज्य के वन अधिकारियों ने एक विश्लेषण के साथ सफाई दी है. उन्होंने रणथंभौर में पूरे दिन और आधे दिन की सफारी शुरू करने के साल 2016 के फैसले को रैंकिंग में गिरावट का जिम्मेदार ठहराया है. सूत्रों का कहना है कि पर्यटन लॉबी के इशारे पर पिछली भाजपा सरकार ने दो प्रीमियम सफारी शुरू की, जिनमें बाघों पर पडऩे वाले असर की परवाह किए बिना पर्यटकों को रणथंभौर के जोन 10 में बेरोकटोक जाने की अनुमति दे दी गई. इसकी वजह साफ है कि पर्यटक सफारी पर भारी खर्च करते हैं, कभी-कभी तो 12 घंटे की सैर के लिए ढाई लाख रुपए तक.

राजस्थान के अतिरिक्त प्रधान मुख्य संरक्षक और मुख्य वन्यजीव वार्डन अरिंदम तोमर कहते हैं, ''लंबी सफारी ने बाघों के आराम के घंटों में बाधा डालते हुए उन्हें बहुत तनाव में डाल दिया. नतीजतन वे नए विश्राम क्षेत्रों की तलाश में भटक रहे  हैं.'' उन्होंने रणथंभौर के लोकप्रिय भ्रमण जोन 1 से 5 तक में पूरे और आधे दिन की सफारी पर रोक का आदेश दिया है. हालांकि अन्य कम-गतिविधि वाले जोन में ये सफारी जारी रहेंगी. नियमित सफारी अब प्रति जोन तीन घंटे से अधिक नहीं है.

राजस्थान अब देश में बाघों की मौजूदगी वाले 18 राज्यों में 15वें स्थान पर है. कुल मिलाकर, देश के बाघ अभयारण्यों में सुधार हुआ है और पिछले दो ऑडिट में किसी भी अभयारण्य को 'खराब' श्रेणी नहीं मिली है. 2014 के बाद से, चार अभयारण्यों में सुधार हुआ है और वे 'अच्छे' से 'बहुत अच्छे' श्रेणी में पहुंचे हैं, जबकि छह अभयारण्य 'ठीक' से 'अच्छे' श्रेणी में पहुंचे हैं. अलबत्ता, चार अभयारण्यों की रेटिंग गिरी है जिनमें रणथंभौर और सरिस्का शामिल हैं. रिपोर्ट ने यह भी उजागर किया है कि सरिस्का में बाघों की मृत्यु दर चिंताजनक रूप से ज्यादा है. फिलहाल वहां आठ मादा बाघों के बीच केवल एक स्वस्थ बाघ है. यह स्थिति भविष्य की आबादी के लिहाज से बहुत बुरी है. हाल के वर्षों में अवैध शिकार के भी मामले सामने आए हैं.

रिपोर्टों के अनुसार, सरिस्का के बाघों में बहुत ज्यादा कोर्टिसोल स्तर मिला है जो अत्यधिक तनाव का संकेत है. इसके परिणामस्वरूप प्रजनन क्षमता भी घट सकती है. एमईई की रिपोर्ट में रणथंभौर अभयारण्य के अधिकारियों की आलोचना की गई कि करीब 35 साल पहले अभयारण्य के मुख्य क्षेत्रों से 12 गांवों को खाली कराए जाने के बाद उपलब्ध भूमि पर अब तक चारागाह क्षेत्र विकसित नहीं किया जा सका. रिपोर्ट में कहा गया है, ''अभयारण्य के प्रबंधन में वैज्ञानिक प्रवृत्ति का स्पष्ट अभाव है.'' रिपोर्ट में उल्लेख है कि दोनों अभयारण्यों की बाहरी सीमा पर रह रहे लाखों ग्रामीणों के साथ उनका तालमेल खराब है. वहीं, सरिस्का प्रबंधन अभयारण्य के भीतरी क्षेत्रों में स्थित गांवों को खाली कराने की योजना भी नहीं बना सका है.

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