पहले कौन मारेगा पलटी?
क्या नीतीश कुमार और भाजपा के बीच चल रही रस्साकशी बस दिखावा है या रास्ते जुदा होने का आगाज हो चुका है?

अमित शाह ने 29 मई को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जनता दल (यूनाइटेड) के लिए महज एक सीट देने का प्रस्ताव दिया, जिसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खारिज कर दिया था. उसके बाद से बिहार की सत्ता के दो साझेदारों जद (यू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच संघर्ष की स्थिति बन गई है.
16 लोकसभा और छह राज्यसभा सांसदों वाली पार्टी के नेता के रूप में नीतीश को केंद्रीय मंत्रिमंडल में 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व' की अपेक्षा थी, न कि प्रतीकात्मक. नीतीश ने अपनी भावना को स्पष्ट तौर पर व्यक्त करने के दो दिन बाद 2 जून को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया. मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के दो दिन बाद हुए इस विस्तार में नीतीश ने जहां अपने दल के आठ लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया वहीं भाजपा को सिर्फ एक मंत्री पद की पेशकश की. बिहार कैबिनेट विस्तार के दो दिन बाद केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने एक इफ्तार में शिरकत करने के लिए नीतीश पर तंज कसा. गिरिराज ने तीन कार्यक्रमों की जो चार तस्वीरें ट्वीट की थीं, नीतीश ही एकमात्र ऐसे नेता थे जो हर तस्वीर में दिख रहे थे. जाहिर है, गिरिराज का निशाना कौन था.
बात यहीं रुकी नहीं. 9 जून को जद (यू) ने घोषणा की कि वह झारखंड, हरियाणा, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगा. भाजपा, झारखंड और हरियाणा में सत्ता में है. जाहिर है, जद (यू) बिहार को छोड़कर कहीं भी भाजपा गठबंधन का हिस्सा नहीं होगा. वैसे जद (यू) के इस फैसले का राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभाव नहीं होगा क्योंकि इन राज्यों में उसकी उपस्थिति बस नाम की है. जद (यू ) के एक नेता कहते हैं, ''जद (यू) और भाजपा को पता है कि हमारे चुनाव लडऩे से ज्यादा असर नहीं पड़ेगा और न उनके (भाजपा के) वोट कटने वाले हैं.'' यानी ''संदेश प्रतीकात्मक ज्यादा है.''
भाजपा ने जद (यू) को केंद्रीय मंत्रिमंडल में सिर्फ एक स्थान देने का फैसला करके नीतीश को यही संदेश दिया कि उन्हें सरकार में कोई विशेष भाव नहीं मिलने वाला. वहीं गठबंधन को बिहार तक सीमित करके नीतीश ने भाजपा को यह संदेश दिया कि बिहार उन्हें चलाने दें. जद (यू) के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''नीतीश कुमार की भावना भी कम आहत नहीं हुई है. दोहरेपन को देखिए. भाजपा ने बिहार के अपने 17 सांसदों में पांच को मंत्री बनाया, लेकिन 16 सांसदों वाले जद (यू) के लिए सिर्फ एक मंत्री पद की पेशकश की.''
एक और अहम बात यह कि जद (यू) ने ऐलान किया है कि उसे अपने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर के व्यवसायिक संगठन इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (आई-पैक) के जरिए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को चुनावों में परामर्श संबंधी मदद देने से कोई एतराज नहीं है.
टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के साथ 6 जून को कोलकाता में अपनी बैठक में किशोर ने उनके लिए चुनावी रणनीति बनाने पर अपनी सहमति दे दी है. भाजपा साल 2021 में पश्चिम बंगाल की सत्ता से तृणमूल को बेदखल करके खुद काबिज होने का लक्ष्य लेकर चल रही है.
जद (यू) का मानना है कि नीतीश ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के लिए काफी समझौता किया और इसलिए उन्होंने घोषणापत्र तक जारी करने से परहेज किया क्योंकि जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे से संबंधित धारा 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर के मुद्द पर उनकी पार्टी के विचार भाजपा के विचारों से इतर थे. जद (यू) के एक अन्य नेता का कहना है, ''नीतीश ने गठबंधन धर्म निभाने के लिए अतिरिक्त प्रयास किए.
प्रधानमंत्री की बिहार में आयोजित हर सभा में शामिल होने, गिरिराज सिंह जैसे हिंदूवादी नेताओं के लिए प्रचार करने और ऐसी नौ लोकसभा सीटों में से आठ पर चुनाव लडऩे को सहमत हो गए जहां 2014 में भाजपा हार गई थी. अगर भाजपा उनकी उदारता को उचित सम्मान देना नहीं जानती तो यह भाजपा की विफलता है.''
नीतीश का कहना है कि उनके पास विकल्प हैं पर वे एनडीए के साथ ही रहेंगे. राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने उन्हें घर वापसी की पेशकश की है, जबकि राबड़ी देवी ने घोषणा की है कि राज्य के महागठबंधन में जद(यू) के लिए दरवाजे खुले हैं.
नीतीश अगर राजद, जो कि अब भी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है, के साथ फिर से जा मिलते हैं तो इससे उन्हें सत्ता चलाने में लगातार मुखर हो रही भाजपा के मुकाबले उन्हें ज्यादा छूट तो मिल सकती है, लेकिन उनकी विश्सनीयता का संकट भी पैदा हो सकता है.
2010 के विधानसभा चुनाव में जद (यू) भाजपा के साथ गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में थी. उसने विधानसभा की कुल 243 सीटों में से भाजपा के लिए 102 सीटें छोड़ी थीं और खुद 141 सीटों पर चुनाव लड़ा था.
2015 में, भाजपा ने 157 सीटों पर चुनाव लड़कर 53 जीतीं, जबकि उसके विपक्षी महागठबंधन के हिस्से के रूप में जद (यू) ने 101 सीटों पर चुनाव लड़कर 71 सीटों पर जीत हासिल की. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और जद (यू) दोनों ने, 17 सीटों पर चुनाव लड़ा. भाजपा ने अपनी सभी सीटें जीत लीं. जद (यू) के नेता इस बात से इनकार नहीं करते कि 2020 के विधानसभा चुनावों में भाजपा बराबर सीटों की मांग करेगी.
2005 के बाद, बिहार में चार विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव हुए हैं. सिर्फ 2014 के लोकसभा चुनाव को छोड़कर जब नीतीश भाजपा के साथ नहीं थे, विजेता वही रहा है जिसकी ओर नीतीश थे.
उनके नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पास 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 123 का साधारण बहुमत है. भाजपा-जद (यू) के बीच तनाव बढ़ रहा है, पर नीतीश इतनी जल्दी एनडीए की नैया डुबोने का जोखिम नहीं उठा सकते. एक भाजपा नेता कहते हैं, ''अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होंगे. ऐसे में लगता नहीं कि जद (यू) वर्तमान विधानसभा में फिर से वैकल्पिक गठबंधन बनाने की कोशिश करेगा.''
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