फुरसत-आधुनिक भारतीय कला का सफर
आधुनिक भारतीय कला पर आई एक नई किताब में कई दिग्गजों के निजी संग्रह के चुनिंदा चित्र

पिछले हफ्ते 'आर्ट मार्केट इंटेलिजेंस' यानी कला बाजार की खुफिया फर्म आर्टरी इंडिया ने अपनी वेबसाइट पर ऐलान किया कि पिछले पांच साल में हिंदुस्तान के 'सबसे अव्वल 3 कलाकार' वी.एस. गायतोंडे, एम.एफ. हुसैन और एस.एच. रजा रहे हैं. कभी प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप के साथी रहे हुसैन और रजा के बीच कांटे का मुकाबला है, जिनकी क्रमशः 494 और 454 कलाकृतियां 331 करोड़ रु. और 321 करोड़ रु. में बिकीं. महज 81 कलाकृतियों से 392 करोड़ जुटा लेने वाले गायतोंडे छिपे रुस्तम निकले.
उस देश में यह दुखद है पर सटीक भी जहां कला की चर्चा उस पर लगी कीमत की चिप्पी की वजह से होती है. जब क्रिस्टीज फर्म तैयब मेहता की एक कलाकृति 22.9 करोड़ रु. में बेचती है या जब सूजा की एक 'अनदेखी' कलाकृति सॉदबी की नीलामी में प्रमुख आकर्षण होती है (जैसा कि वह 18 मार्च को न्यूयॉर्क में होगी), तो भारतीय आधुनिक कला राष्ट्रीय गर्व के यज्ञ में थोड़ी आहुति डाल सकती है.
नीलामियों में बिकी सबसे अव्वल 500 में से दो-तिहाई कलाकृतियां पांच कलाकारों—रजा, हुसैन, गायतोंडे, एफ.एन. सूजा और मेहता—की हैं. बड़े नामों के लिए इन बाजारों की बेलगाम लिप्सा उदास-अंधेरे रास्तों की तरफ ले जा सकती है. फरवरी में नेविल तुली की ओसियंस कनोजियर ऑफ आर्ट प्रा. लि. की नीलामी के लिए रखी गई कई कलाकृतियों—सूजा की 1957 की अनाम कलाकृति, भूपेन खक्कर की शैडो ऑफ डेथ, जहांगीर सबावाला की 1964 की पेंटिंग और अकबर पदमसी की 1952 की कलाकृति—पर नकली होने का आरोप लगा था.
कितो दि बोर और उनकी पार्टनर जेन गोवर्स ने 25 साल पहले हिंदुस्तान की सात साल की यात्रा के दौरान आधुनिक भारतीय कला का संग्रह करना शुरू किया था. अब करीब 1,000 पेंटिंग का उनका संग्रह इस बात की मिसाल है कि जानकार निजी संग्राहक किस तरह मनमाने कला बाजार से हटकर रास्ता बना सकते हैं. दि बोर के इस संग्रह के आधार पर एक नई किताब मॉडर्न इंडियन पेंटिंग आई है जिसका संपादन जिलेस तिलोत्सन और रॉब डीन ने किया है.
दि बोर बंगाल की कला में भी खासी दिलचस्पी दिखाते हैं. बंगाल स्कूल पर पार्था मित्तर का निबंध बताता है कि राष्ट्रवाद के साथ किस तरह भारतीय कला का बोरिया-बिस्तर बंध गया था. औपनिवेशिक भारत में पश्चिमी कला की तालीम के उभार ने पहले तो राजा रवि वर्मा सरीखे एक कलाकार को जन्म दिया, जिसने ''हिंदू अतीत की अपनी 'प्रामाणिक' पुनर्रचना के लिए विक्टोरियन अकादमिक कला के विन्यास का इस्तेमाल किया''.
वर्मा की चित्रांकन शैली, जिसे उनके छापेखाने ने फैलाया, लोकप्रिय कल्पना का नया मानक बन गई. किताब अवनींद्रनाथ टैगोर की भारतमाता और द पासिंग ऑफ शाहजहां, ए.आर. चुगताई की शाहजहां लुकिंग एट द ताज, क्षितिंद्रनाथ मजूमदार के चैतन्य पर काम से लेकर प्रशांतो रॉय की मारा्यज अटैक ऑन द बुद्धा में तिब्बती थांगका चित्रकला के प्रभाव जैसे उदाहरणों के साथ इस दौर का बखान करती है.
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