जनादेश 2019-चुनावी हलचल
देशभर में चुनावों को लेकर चर्चा गरम है. सियासी दांवपेच जमकर चले जा रहे हैं. पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल की सीटों पर इस बार चुनाव विश्लेषकों की खास नजर है.

पश्चिम बंगाल
वाम के अस्तित्व का सवाल
पश्चिम बंगाल गुजरात के धुर उलटी दिशा का राज्य है और दिलचस्प यह कि इसी राज्य की मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे आक्रामक अंदाज में ललकार रही हैं, तो भाजपा भी इसी राज्य में अपने प्रदर्शन को सुधारकर हिंदी पट्टी के अपने संभावित नुक्सान को पूरा करना चाहती है.
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पश्चिम बंगाल में महज दो सीटें ही हासिल हुईं और तीन सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही. लेकिन यह अब तक बंगाल में भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है.
इससे पहले 1991 में भाजपा ने बंगाल में 11.66 फीसदी वोट हासिल किए थे. विश्लेषक मानते हैं कि सूबे में वाम मोर्चे का संगठन कमजोर हुआ है और अब सीधी लड़ाई तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा की ही है. वैसे, राज्य में वाम मोर्चा और कांग्रेस सीटों के लिहाज से तालमेल कर रहे हैं.
फिलहाल उन छह सीटों पर उनका तालमेल है, जहां कांग्रेस और वाम मोर्चे ने फतह हासिल की थी. अगर वाम मोर्चा और कांग्रेस साथ लड़ें, तो वोट शेयर के लिहाज से उनकी ताकत तृणमूल के बराबर हो जाएगी.
2014 में 25,000 वोटों से कम अंतर से 4 सीटों, अलीपुर दुआर, जंगीपुर, मुर्शिदाबाद और रायगंज में मुकाबले हुए थे. इन सीटों पर पहले और दूसरे स्थान पर कांग्रेस और वाम मोर्चा ही रहा था.
2016 के बाद से हर उप-चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस और वाम मोर्चे से बेहतर रहा है. और अब उसकी निगाह कई कांग्रेसी और टीएमसी नेताओं को अपने पाले में लाने की है.
बहरहाल, वाममोर्चा, कांग्रेस और टीएमसी तीनों के समीकरण में मुस्लिम वोट अहम हैं. अगर ये वोट बंटे तो भाजपा की दाल गल जाएगी.
प्रदर्शन दोहराने की चुनौती
असम में 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में वोट शेयर के लिहाज से नतीजे 2014 का दोहराव थे. सूबे में एनडीए (भाजपा-अगप-बीडीएफ-आरजेएएम-टीजेएएम) ने कुल 86 सीटें जीतीं असम में भाजपा ने जिन मुद्दों का उभार दिया है, वे पहले असम गण परिषद के मुद्दे थे. असम के तीन इलाकों में से एक ऊपरी असम में भाजपा ने वोट शेयर में तिगुनी बढ़ोतरी की है और वहां इसका वोट शेयर 45 फीसद तक हो गया है. इस इलाके में भाजपा ने कांग्रेस के हिस्से के वोट हथिया लिए, जहां कांग्रेस का वोट शेयर भी गिरकर 41 से 34 फीसद हो गया. ऊपरी असम असम गण परिषद का किला था.
वहां अगप को महज 5 फीसद वोट हासिल हुए. एक तरह से भाजपा अगप की जमीन पर खड़ी है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम में करीब 34.2 फीसद मुस्लिम हैं. सूबे के 11 जिलों में मुस्लिम आबादी बहुमत में है जो 35 विधानसभा सीटों पर निर्णायक हैं. मुस्लिम बहुल इलाकों में, खासकर बांग्लाभाषी आप्रवासी मुसलमानों में बदरुद्दीन अजमल अब तक धाकड़ नेता साबित हुए हैं. अजमल ने भी कांग्रेस की जमीन ही हथियाई है.
पूर्वोत्तर (अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, सिक्किम)
क्षत्रपों की छत्रछाया
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पूर्वोत्तर में क्षत्रपों की छत्रछाया में कमल खिलाने की पुरजोर कोशिश कर रही है.
13 मार्च को 'पूर्वोत्तर के कौटिल्य' कहे जाने वाले हेमंत बिस्व सरमा ने एक ट्वीट किया, डियर सर, लेट मी एश्योर नॉर्थईस्ट इज ऑन हाइ जोश ऐंड सिंस बीमीव इट्स अपना टाइम फॉर अस, लब्बोलुबाब यह था कि पूर्वोत्तर में भाजपा का जोश चरम पर है, भरोसा रखिए यह अपना ही टाइम है.
दरअसल भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राम माधव ने हाल ही में दीमापुर और गुवाहाटी में पार्टी के सभी सहयोगी दलों के साथ बैठक की.
इसमें वे संगठन भी शामिल थे जो पिछले दिनों भाजपा से नाराज होकर छिटक गए थे. अब बोडो पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद (अगप) जैसे दलों की वापसी और सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा जैसे नए दलों के जुडऩे से भाजपा का उत्साह सातवें आसमान पर है.
पूर्वोत्तर में सरमा ने नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक एलाइंस (नेडा) की नींव रखी थी और अब बिखरे कुनबे को दोबारा समेटने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. माधव और सरमा की जोड़ी पहले ही केंद्रीय नेतृत्व से यहां की 25 सीटों में से 22 सीटें लाने का वादा कर चुकी है.
ऐसे में जब रूठे क्षत्रप और कुछ नए सहयोगियों ने भाजपा का दामन थामा, तो जोश तो हाइ होना ही था. फिलहाल नेडा में भाजपा के साथ 11 क्षेत्रीय दल हैं.
असम को छोड़कर बाकी पूर्वोत्तर में मौजूदा समय में भाजपा के पास केवल एक सीट है जबकि कांग्रेस के पास पांच सीट हैं. लेकिन अगर भाजपानीत गठबंधन की बात करें तो कुल सीटें चार हो जाती हैं.
ताकतवर क्षत्रप
कोई डेढ़ दशक पहले असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने हिकारत भरे लहजे में पूछा थाः अजमल कौन है? साल 2014 के लोकसभा में कांग्रेस के बराबर यानी तीन सीटें जीतकर एआइयूडीएफ के मुखिया मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने भी यही पूछारू तरुण गोगोई कौन है?
देवबंद से तालीम हासिल करने वाले अजमल की पार्टी 2006 में स्थापना के छह महीने के भीतर ही 2006 में 10 सीटें जीत गई थी. उनकी पकड़ मुस्लिम बहिरागतों खासकर बांग्लाभाषियों के बीच जबरदस्त है.
बंगाल का रणनीतिकार
भाजपा को बंगाल में एक चेहरा चाहिए था. तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक मुकुल रॉय के रूप में पार्टी की तलाश पूरी हुई. रॉय की रणनीति ने तृणमूल को विजेता बनाया था. रॉय पंचायत स्तर तक बंगाल की राजनीति की रग-रग से वाकिफ हैं. पिछले पंचायत चुनावों में रॉय की रणनीतियां एक हद तक कारगर भी दिखी हैं. ममता के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाकर रॉय ने भाजपा को बंगाल में मुखर विपक्ष बना दिया.भाजपा का ब्रह्मास्त्र
पूर्वोत्तर के मिजाज से अच्छी तरह वाकिफ हेमंत बिस्वा सरमा का पूर्वोत्तर में भाजपा के बढ़ते रुतबे के पीछे अहम किरदार है. 11 क्षेत्रीय दलों का गठबंधन नॉर्थ ईस्ट अलायंस बनाना और बिखरने के बाद दोबारा समेटना बिना सरमा के मुमकिन नहीं था. 2011 में कांग्रेस
की जीत में अहम भूमिका निभाने के बाद भी गौरव गोगोई को मिल रही तरजीह से भौचक सरमा 2015 में भाजपा में आ गए और उसके विजय रथ के सारथी बन गए.
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