सबको आरक्षणः कोटे का कार्ड

भाजपा के सूत्रों ने उल्लासपूर्वक आरक्षण के इस प्रस्ताव को 'गेमचेंजिंग' बताया. हाल के चुनावों की हार की वजह आंशिक रूप से, उच्च जाति के मतदाताओं की नाराजगी को बताया गया जो कि खुद को भाजपा से इसलिए छला हुआ महसूस कर रहा था.

हमें भी जून 2018 में भोपाल में जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन करते ब्राह्मण समाज के समर्थक
हमें भी जून 2018 में भोपाल में जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन करते ब्राह्मण समाज के समर्थक

सामान्य वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण देने का फैसला आसान राजनैतिक फैसला है. 1991 में पी.वी. नरसिंह राव ने भी राजनैतिक निहितार्थों के साथ ऐसी ही एक योजना का प्रस्ताव दिया था जिसे उच्चतम न्यायालय ने नहीं माना और इसीलिए आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के भाजपा के नवीनतम प्रस्ताव को विपक्ष के उन नेताओं का भी समर्थन मिला जो आमतौर आक्रामक रहते हैं.

प्रस्ताव के समय और इसके लागू होने के तरीकों पर कुछ संदेह जताए जा रहे हैं, लेकिन कोई भी दल या उसका नेता सामान्य वर्ग के लोगों को आरक्षण के दायरे में लाने के प्रयासों को रोकने का जोखिम नहीं उठाएगा. इसके लिए संविधान में संशोधन करके आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा को बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने की आवश्यकता होगी, लेकिन सरकार आम चुनाव से पूर्व कम से कम यह संदेश तो देना ही चाहेगी कि वह अपने मुख्य समर्थकों की बेहतरी के लिए गंभीरता से नीतिगत रूप से कुछ करने की मंशा रखती है.

चुनावी रूप से सुविधाजनक हो या नहीं पर आरक्षण बढ़ाने के इस आश्चर्यजनक प्रस्ताव ने हाल के दिनों में कुछ लडख़ड़ाती दिखी भाजपा को नई ऊर्जा दे दी है. हाल के विधानसभा चुनावों में पार्टी की अजेयता की हवा निकल गई थी, खासकर मध्य प्रदेश और राजस्थान में जहां जीत का अंतर थोड़ा ही कम रहा इसने संकेत दिया कि लोग बदलाव का मूड भी बनाने लगे हैं. भाजपा के सूत्रों ने उल्लासपूर्वक आरक्षण के इस प्रस्ताव को 'गेमचेंजिंग' बताया. हाल के चुनावों की हार की वजह आंशिक रूप से, उच्च जाति के मतदाताओं की नाराजगी को बताया गया जो कि खुद को भाजपा से इसलिए छला हुआ महसूस कर रहा था क्योंकि उसने अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट से खत्म किए जाने के फैसले को पलट दिया.

अधिनियम अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान करता है और कोर्ट ने जांच के बाद गिरफ्तारी की व्यवस्था दी थी. सवर्णों की नाराजगी भाजपा को कितनी महंगी पड़ी इसे इस बात से समझा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में 11 सीटों पर नोटा के लिए पड़े वोटों की संख्या भाजपा उम्मीदवारों की हार के अंतर से ज्यादा थी. ऐसा माना गया कि भाजपा से नाराज उसके कुछ परंपरागत वोटरों ने गुस्से में कांग्रेस को वोट करने के बजाए नोटा को वोट देकर अपना गुस्सा दर्ज कराया. उन 11 सीटों को जीतकर भाजपा मध्य प्रदेश में फिर से सरकार बना सकती थी.

आरक्षण के कथित चुनावी फायदे बताते हैं कि सरकार क्यों उस पुराने प्रस्ताव को लाने के लिए इतनी उत्साहित और सक्रिय है जिसे लागू करने के पिछले प्रयास नाकाम साबित हुए हैं. जो प्रस्ताव अभी तक कागज पर दर्ज एक विचार भर है उसे केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 'ऐतिहासिक कदम' बताया. उन्होंने कहा कि बहुत से लोगों ने इसका वादा किया या प्रयास किया लेकिन हमने इसे 'कर दिखाया है'. लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा ने वास्तव में ऐसा कर दिखाया है? इसका फैसला तो फिलहाल संभवतः अदालत में ही होगा.

1992 में, शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि केवल गरीबी ही आरक्षण देने की एकमात्र अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती है, गरीबी के साथ सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर 'पिछड़ापन' होने पर ही आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए. इसके अलावा, सरकार ने इस नए प्रस्तावित आरक्षण श्रेणी के लिए 'आर्थिक रूप से कमजोर' को जिस रूप में परिभाषित किया है उस पर लोगों की भौहें तनी हैं.

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश भारतीय (90 प्रतिशत से अधिक) आय 'क्रीमी लेयर' में गिने जाने के लिए आवश्यक 8 लाख रुपए से कम कमाते हैं. एक अन्य कट ऑफ पांच एकड़ से कम जमीन तय की गई है. ज्यादातर किसान (85 फीसदी से अधिक) इसके दायरे में आ जाएंगे. अधिकांश भारतीय शहरी या ग्रामीण 1,000 वर्ग फुट से कम के घर में रहते हैं और सरकार ने आरक्षण के लिए जो प्रस्ताव दिया है उसमें उल्लेख है कि 1,000 फुट से ज्यादा क्षेत्रफल के घर में रहने वाले शहरी लोगों आरक्षण के रूप में सहायता की आवश्यकता नहीं है. यानी साफ है कि सामान्य वर्ग से ताल्लुक रखने वाले बड़ी संख्या में लोग अब आरक्षण के पात्र होंगे. आरक्षण का जो दायरा तय किया गया है और यदि आप उसमें उपयुक्त नहीं है तो ऐसे समझ सकते हैं कि आप वास्तव में देश के शीर्ष पांच प्रतिशत कमाई वाले लोगों में आते हैं.

अगर देश में व्यावहारिक रूप से हर कोई उस आरक्षण का पात्र हो जाएगा तो क्या फिर भी सरकार यह दावा कर सकती है कि वह वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर हिंदुओं, ईसाइयों और मुसलमानों की मदद का प्रयास कर रही है? लेकिन इसके दूसरे पक्ष को देखें तो सबको शामिल करने वाला यह समीकरण ही भाजपा को सबसे ज्यादा चुनावी फायदा पहुंचाएगा. कोई भी ऐसा महसूस नहीं कर सकता कि वह आरक्षण के लाभ से वंचित रह गया और इससे गुजरात में हार्दिक पटेल और उनके जैसे दूसरे लोगों के हाथ से मुद्दा निकल जाएगा जो ऐसे समुदायों के लिए आरक्षण की मांग करते हैं जो आमतौर पर इसके पात्र नहीं होंगे.

अधिकांश आलोचक स्वीकार करते हैं कि सरकार के इस प्रस्ताव को सबसे कड़ी चुनौती अदालत से मिलने वाली है. यह वह जगह है जहां इस तरह के दूसरे प्रस्ताव ध्वस्त हो गए हैं. वह सवाल फिर से खड़ा होता हैः आरक्षण दरअसल है क्या और वह किसकी मदद के लिए है? सरकार भी इन तथ्यों से वाकिफ है और उसकी दलीलें भी कितनी मजबूत हैं यह कोर्ट में पता चलेगा.

***

Read more!