मीटू का शिकार एम.जे.अकबर

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, ''मोदी की चुप्पी बताती है कि महिलाओं की गरिमा को लेकर सरकार का दावा खोखला है और महिलाओं के हितों के प्रति मोदी सरकार में प्रतिबद्धता की कमी है. 'बेटी बचाओ' महज एक नारा भर है.''

अभियान एम.जे. अकबर के खिलाफ 15 अक्तूबर को प्रदर्शन करते यूथ कांग्रेस के नेता
अभियान एम.जे. अकबर के खिलाफ 15 अक्तूबर को प्रदर्शन करते यूथ कांग्रेस के नेता

आखिरकार घुड़की देने वाले एम.जे. अकबर पर दबाव इतना बढ़ गया कि उनका टिके रहना मुश्किल हो गया. इस दबाव में सबसे बड़ी भूमिका उस महिला पत्रकार प्रिया रमानी की रही जिन पर अकबर ने मानहानि का केस करने का फैसला किया जिससे रमानी ने अपनी आवाज और बुलंद कर ली. कुछ और महिलाओं ने भी अकबर के हाथों उत्पीडऩ की कहानियां बताईं. हालांकि कुछेक रमानी का साथ देती पाई गईं. कुछ महिलाओं ने उनकी ओर से क्राउडफंडिंग (जनसहयोग) से रकम जुटाने की तरकीब सोची है ताकि कानूनी खर्चे वहन किए जा सकें.

अकबर के अचानक इस्तीफे तक भाजपा में ये कयास लग रहे थे कि शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह अकबर को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए तैयार नहीं हैं. कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें आशंका थी कि ऐसा करने से भानुमती का पिटारा खुल सकता है जिससे राजनैतिक विरोधियों को बेतुके आरोप लगाने की शह मिलेगी. केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और स्मृति ईरानी अकबर के दुर्व्यवहार की जांच की मांग करती नजर आईं तो कुछेक ने इसे राजनैतिक साजिश करार दिया.

नाम न छापने की शर्त पर भाजपा के एक नेता कहते हैं, ''कांग्रेस ने सरकार की बेदाग छवि पर कीचड़ उछालने की नीयत से राफेल मुद्दे को उठाने में अपना पूरा जोर लगा दिया था. अब अगर अकबर को नैतिक आधार पर पद छोडऩे को कहा जाए तो इसके बाद आरोपों का एक सिलसिला शुरू हो सकता है.'' बेशक, कांग्रेस अकबर प्रकरण को एक अवसर के रूप में देखती है. कौन-सी विपक्षी पार्टी भला ऐसा नहीं करेगी? कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, ''मोदी की चुप्पी बताती है कि महिलाओं की गरिमा को लेकर सरकार का दावा खोखला है और महिलाओं के हितों के प्रति मोदी सरकार में प्रतिबद्धता की कमी है. 'बेटी बचाओ' महज एक नारा भर है.'' कांग्रेस के एक अन्य प्रवक्ता, शक्तिसिंह गोहिल ने कहा, ''मोदीजी के लिए नैतिक आधार जैसी बात का कोई अस्तित्व ही नहीं. अगर उन्हें लगेगा कि मंत्रिमंडल में अकबर के होने से उन्हें नुक्सान हो रहा है, बस तभी वह कोई कार्रवाई करेंगे, अन्यथा कुछ नहीं करने वाले.''

ऐसे ज्यादातर राजनैतिक संवाद अदूरदर्शी और चालबाजी से भरे हुए थे. लेकिन भारत में तेजी से जगजाहिर हो रहे #मीटू अभियान में कार्यस्थलों पर पुरुषों के महिलाओं से यौन दुव्र्यवहर के किस्से पीड़ितों ने जगजाहिर किए हैं. भाजपा सूत्र इशारा भी करते हैं कि अकबर ने इस्तीफे की पेशकश की थी लेकिन उन्हें कानूनी कार्रवाई करने की सलाह दी गई थी. लेकिन बाद में यह भी कानाफूसी हुई कि शाह चुनावी समय में कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते. सुषमा स्वराज से भी सलाह ली गई. हालांकि स्वराज ने चुप रहना बेहतर समझा.

इस सबके बावजूद भाजपा ने अकबर पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की. एक लंबी चुप्पी के बाद, पार्टी प्रवक्ता, जी.वी.एल. नरसिम्हा राव ने इस विषय पर पार्टी का पक्ष रखने की चुनौती स्वीकार की. क्या भाजपा अकबर के खिलाफ आरोपों पर विश्वास करती है, इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बस इतना कहा कि अकबर ने भी ''अपना पक्ष रखा है.'' भाजपा आरोपों पर विस्तार में जाकर उसका जवाब देने की इच्छुक नहीं है, रमानी ने ही सबसे पहले सोशल मीडिया पर अकबर के खिलाफ यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया था. उसके बाद ही कई महिला पत्रकारों ने अकबर पर ऐसे ही आरोप लगाए हैं. लेकिन अकबर अपने आचरण पर लगे आरोपों की जांच से खुद को कब तक रोक पाएंगे? उनकी कानूनी रणनीति आक्रामक है लेकिन 'राजनैतिक षड्यंत्र' वाला एंगल आसानी से गले नहीं उतर सकता क्योंकि महिलाओं ने जो आपबीती सुनाई है, वह कई दशक पुरानी है.

भाजपा सूत्र इशारा करते हैं कि अकबर ने इस्तीफे की पेशकश की थी लेकिन उन्हें कानूनी कार्रवाई करने की सलाह दी गई

बात पते की

''आम चुनावों से कुछ ही महीने पहले यह तूफान क्यों खड़ा हुआ है. क्या इसके पीछे कोई एजेंडा है. आप ही फैसला करें. इन झूठे, निराधार और बेहूदे आरोपों से मेरी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति हुई है. झूठ के पांव नहीं होते, लेकिन उनमें जहर होता है जो पागलपन पैदा कर सकता है.''

अगर किसी ने दर्जन भर से ज्यादा महिलाओं की ओर से यौन उत्पीडऩ के आरोपों पर राज्यसभा सदस्य और विदेश राज्यमंत्री एम.जे. अकबर से किसी पछतावे की उम्मीद की होगी तो उनके हठपूर्वक इनकार से लोगों को निराशा ही हुई होगी और उनका भ्रम दूर हो गया होगा. इसके पीछे किसी राजनैतिक साजिश की बात हास्यास्पद मालूम होती है, और अगर यह सोच रही हो कि मानहानि का दावा ठोकने (पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ) से ये आवाजें दब जाएंगी तो इसका भी कोई असर नहीं हुआ है, क्योंकि एक अन्य महिला ने भी उनके खिलाफ यौन दुराचरण का आरोप लगाया है.

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