जद(यू) में किशोर की राजनैतिक पारी की शुरुआत

नीतीश को ऐसे शख्स की जरूरत है, जो भाजपा, राजद और कांग्रेस के साथ किसी भी समीकरण के लिए भरोसेमंद संवाद-सूत्र बन सके, ताकि उनका सियासी अस्तित्व सुनिश्चित रहे. इसके लिए किशोर से बेहतर कौन हो सकता है.

तीर-कमान जद(यू) में शामिल होने के बाद प्रशांत किशोर, साथ में नीतीश कुमार
तीर-कमान जद(यू) में शामिल होने के बाद प्रशांत किशोर, साथ में नीतीश कुमार

जब चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने 16 सितंबर को औपचारिक रूप से जद(यू) में शामिल होने का फैसला लिया, तो इसके लिए 1, अणे मार्ग, पटना स्थित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आधिकारिक बंगले को चुना गया. नीतीश, जो जद(यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, ने किशोर को सदस्यता रसीद सौंपी और यह स्पष्ट कर दिया कि चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने किशोर को पार्टी में ऊंचा स्थान दिया जाएगा.

नीतीश कुमार ने किशोर के बारे में कहा, ''वे पार्टी के भविष्य हैं.'' जद(यू) के कुछ अंदरूनी सूत्र इस बयान को पार्टी में उत्तराधिकार की योजना के संकेत के रूप में देख रहे हैं. किशोर के लिए भी इससे बेहतर वक्त नहीं हो सकता. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव जेल में हैं और उनके पुत्र तेजस्वी नेता बनने के क्रम में हैं. ऐसे समय में जब नीतीश की भी सियासी हैसियत ढलान पर है, किशोर बिहार में नेतृत्व की इस शून्यता का लाभ उठाना चाहेंगे. विपक्षी पार्टियां खराब शासन के लिए बिहार के मुख्यमंत्री को घेर रही हैं और सहयोगी पार्टी भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में जद(यू) को पर्याप्त जगह देने के प्रति अनिच्छुक दिख रही है.

नीतीश को ऐसे शख्स की जरूरत है, जो भाजपा, राजद और कांग्रेस के साथ किसी भी समीकरण के लिए भरोसेमंद संवाद-सूत्र बन सके, ताकि उनका सियासी अस्तित्व सुनिश्चित रहे. इसके लिए किशोर से बेहतर कौन हो सकता है—वे आसानी से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और राजद प्रमुख लालू यादव तक पहुंच बना सकते हैं. जद(यू) के कई नेताओं के अनुसार, सहयोगी भाजपा के लोकसभा चुनाव के भव्य अभियान से बराबरी करने के लिए किशोर की मौजूदगी पार्टी को बहुत जरूरी आत्मविश्वास देगी. किशोर के सहयोगी दावा करते हैं कि उनकी मौजूदगी से नीतीश की भाजपा पर निर्भरता कम होगी.

एक सहयोगी बताते हैं, ''किशोर ब्राह्मण हैं, जो ऊंची जातियों के वोट को खींच सकते हैं, और भाजपा के प्रभाव को बेअसर कर सकते हैं. गैर-यादव ईबीसी (आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग) के बीच नीतीश का व्यापक जनाधार है. पार्टी अब अल्पसंख्यकों को लुभाने की कोशिश करेगी, जिन्होंने 2009 में नीतीश का समर्थन किया था. उस ताकत की कल्पना कीजिए, जब ये सभी समूह साथ आ जाएंगे.''

किशोर को जद(यू) के विस्तृत वर्ग में स्वीकृति मिली हुई है, हालांकि कई लोगों को डर है कि वे कुछ अहम लोगों पर ग्रहण लगा सकते हैं. अपने प्रखर चुनावी आकलन के लिए जाने जाने वाले किशोर के 2015 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) से जुड़ाव ने अनौपचारिक रूप से कई दिग्गज नेताओं का कद घटा दिया था. राज्यसभा सदस्य आर.सी.पी. सिंह ऐसे ही एक नेता हैं, जिनकी हैसियत खतरे में है. माना जाता है कि इस साल हुए उपचुनावों में रणनीतिकार के तौर पर वे नाकाम रहे.

हालांकि किशोर के आलोचक जद(यू) के साथ उनकी लंबी पारी को लेकर शक जता रहे हैं. 2015 की जीत के बाद नीतीश ने किशोर को अपना सलाहकार नियुक्त किया था और कैबिनेट स्तर के मंत्री का दर्जा दिया था. लेकिन दोनों के रास्ते तब अलग हो गए, जब नीतीश ने भाजपा के साथ हाथ मिला लिया. वहीं प्रदेश की विपक्षी पार्टियों ने किशोर के राजनैतिक अवतार को खारिज कर दिया है.

राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी दावा करते हैं, ''यह कदम अगले चुनाव में राजग को बिहार से बेदखल होने से नहीं बचा पाएगा.'' एक रणनीतिकार के रूप में किशोर ने 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री बनने में मदद की, जद(यू)-राजद-कांग्रेस के नेतृत्व में नीतीश को 2015 में फिर से सत्ता में लौटाया और 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में अमरिंदर सिंह को भारी सफलता दिलाई थी. लेकिन फिर कांग्रेस के लिए रणनीतिकार के रूप में वे 2017 में उत्तर प्रदेश में बुरी तरफ विफल रहे. ऐसे में, यकीनन अगले चुनाव में किशोर की परीक्षा होगी.

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