भीमों की भिड़ंत

सच तो यह है कि मायावती जब उत्साह के साथ लखनऊ में 2019 के लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत करने जा रही थीं, उसके एक दिन पहले ही 14 सितंबर को आजाद की रिहाई उनके प्रबल समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भ्रमित करने की एक रणनीति हो सकती है.

चंद्रशेखर आजाद
चंद्रशेखर आजाद

वंचित तबके के लिए चलने वाले ज्यादातर सामाजिक आंदोलन कुछ स्वीकार्यता हासिल करने के बाद चुनावी रास्ते पर चल पड़ते हैं. वैसे तो यह बदलाव सत्ता और न्याय हासिल करने के लिए होता है, लेकिन दलगत राजनीति उनके आंदोलन से सामाजिक झुकाव को खत्म कर देती है.

चंद्रशेखर आजाद की भीम आर्मी इसी तरह के चैराहे पर खड़ी है, जहां उसे यह तय करना है कि अब चुनावी छलांग लगाएं या सामाजिक आंदोलन के रूप में आगे चलते रहें. आजाद के सामने मायावती और बसपा जैसी मजबूत 'प्रतिद्वंद्वी' हैं.

आज आजाद जो कर रहे हैं, उसी तरह से मायावती ने 1980 के दशक में मनुवाद के खिलाफ अपने आग उगलने वाले भाषणों से सवर्ण हिंदुओं की ज्यादती का मसला उठाया था. लेकिन आजाद, मायावती का इस सर्वजन राजनीति की आलोचना करते रहे हैं और वे चाहते हैं कि फिर से बहुजन पर ध्यान केंद्रित किया जाए. हालांकि, वे इस बात को जानते हैं कि भारत के हाशिये के लोगों में मायावती का क्या स्थान है और यह भी जानते हैं कि अभी राजनैतिक छलांग लगाने का समय नहीं आया है. इसलिए उन्हें सार्वजनिक तौर पर 'बुआ' मायावती से टकराव से बचना होगा.

राजनैतिक विश्लेषक और विरोधी मायावती को तो खारिज कर सकते हैं, लेकिन उनकी बसपा अब भी एक राष्ट्रीय पहचान बनाए हुए है. आंबेडकरवादी जमात के भीतर से मिलने वाली चुनौती उनके लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन वे हमेशा भीतर से मिलने वाली चुनौती पर विजय पाती रही हैं और उन्होंने अपनी पार्टी को राष्ट्रीय आंबेडकरवादी राजनीति में एक अनुकूल और प्रभावी ताकत बनाए रखा है. हालांकि, इस विचार को खारिज नहीं किया जा सकता कि मायावती और नई पीढ़ी के आंबेडकरवादी नेताओं के बीच एक तरह की दूरी है.  

सच तो यह है कि मायावती जब उत्साह के साथ लखनऊ में 2019 के लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत करने जा रही थीं, उसके एक दिन पहले ही 14 सितंबर को आजाद की रिहाई उनके प्रबल समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भ्रमित करने की एक रणनीति हो सकती है.

आजाद की रिहाई से कांग्रेस को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने दलित-मुस्लिम गठजोड़ के जरिए फिर से अपनी जगह बनाने में मदद मिल सकती है. प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष इमरान मसूद आजाद के साथ लगातार संपर्क में रहे हैं और आजाद ने जेल से रिहा होने के बाद उनके सहयोग के लिए आभार भी जताया था.

बसपा की राजनैतिक विरोधी—भाजपा और कांग्रेस, दोनों जिग्नेश मेवाणी और आजाद जैसे नए नेताओं में अपने लिए अवसर देख रही हैं. कई टिप्पणीकार तो मेवाणी को अगला कांशीराम बताते हैं. आजाद ने जहां आंबेडकरवादी राजनीति में नीचे से जगह बनाई है, वहीं मेवाणी इस दुनिया में एक तरह से पैराशूट से उतरे हुए नेता हैं. मेवाणी ने तो अपनी राजनैतिक पारी आंबेडकर, कांशीराम और मायावती जैसे नेताओं की 'पहचान की राजनीति' की आलोचना के साथ शुरू की थी.

दिसंबर, 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को यह उम्मीद रही होगी कि जिग्नेश मेवाणी का समर्थन कर वह बसपा के थोड़े-बहुत प्रभाव को बेअसर कर देगी. लेकिन बाद में उसे लगा होगा कि बसपा के साथ गठजोड़ से ज्यादा फायदा था.

हमारी राष्ट्रीय राजनीति के इस मोड़ पर जब विपक्षी दल भाजपा के प्रभुत्व से मुकाबले के लिए एक ठोस रणनीति की तलाश के लिए जूझ रहे हैं, मायावती भी अपना आधार बढ़ाने के लिए अवसर की तलाश में हैं. अपने राजनैतिक गुरु की असल रणनीति पर चलते हुए वे एक मजबूर सरकार (कमजोर सरकार) चाहती हैं जिससे वंचित तबकों को ज्यादा मोलतोल का अवसर मिल सके.

दूसरी तरफ, भाजाप भी वंचित जातियों को लुभाने की कोशिश कर रही है. वह एक ऐसे नए हिंदुत्व को पेश करने की कोशिश कर रही है जो एक समावेशी सत्य धर्म है और जिसमें सबका साथ, सबका विकास (मुसलमानों को छोड़कर) होता है. कांग्रेस भी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर अपना दावा जता रही है.

शब्दाडंबरों को परे रख दें तो अभी तक भाजपा के कथित समावेशी हिंदुत्व में तो भाजपा शासित कई राज्यों में दलितों के प्रति हिंसा में बढ़ोतरी ही देखी जा रही है. दलितों को सहारा देने के लिए लाए गए अत्याचार निवारण ऐक्ट जैसे कानूनों की जरूरतों पर भी सवाल किए जा रहे हैं.

दूसरी तरफ, मायावती मंदिर-मंदिर दर्शन के लिए जाने में अपना समय बर्बाद करने वाली नहीं हैं. वे प्रभावी तरीके से बसपा की राष्ट्रीय मौजूदगी का फायदा उठाते हुए मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस से जबरदस्त मोलतोल में लगी हैं, जहां विधानसभा के चुनाव होने हैं. दलितों और अन्य वंचित तबकों को 'अपने लिए' वोट करने का आह्वान कर बसपा उस दस्तूर को खत्म करने की लगातार कोशिश कर रही है जिसमें वंचित तबका ऊंची जातियों के लिए वोट करता रहा है. मायावती ने ऐसी परिस्थितियों का भी निर्माण किया है, जिसमें ऊंची जातियों के लोग नीचे आकर बसपा के लिए वोट करते हैं.

बसपा की राष्ट्रीय उपस्थिति—और प्रासंगिकता—काफी हद तक इस तथ्य पर निर्भर है कि उत्तर भारत में आंबेडकरवादी दलगत राजनीति में बिखराव नहीं है. वैसे तो कई सामाजिक आंदोलन हैं, लेकिन बसपा आंबेडकरवादियों की सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक आवाज बनी हुई है. लोकतांत्रिक राजनीति में सफलता के लिए संतुलन और व्यावहारिकता के रास्ते पर चलने की जरूरत होती है. आजाद इस बात को जानते हैं और अब वे खुद को 'रावण' कहलाना पसंद नहीं करते. लेकिन उनके लिए मायावती के साथ राजनैतिक टकराव मोल लेना अभी बहुत जल्दबाजी होगी. उन्हें कुछ समय के लिए सामाजिक क्षेत्र में अपने उग्र बहुजनवाद को ही बनाए रखना होगा.  

—सूर्यकांत वाघमोरे सिविलिटी अगेंस्ट कास्ट के लेखक हैं. फिलहाल, आइआइटी बॉम्बे में समाजशास्त्र पढ़ा रहे हैं.

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