जब कश्मीर की मस्जिदों में अटल बिहारी वाजपेयी के लिए दुआएं मांगी गईं!
अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीरियों में आत्मविश्वास भरा और उम्मीदें जगाईं. कश्मीरियों को ऐसा महसूस होता था मानो वाजपेयी उनके ही बीच से ही निकले कोई शख्स थे.

अटल बिहारी वाजपेयी में न तो इच्छाशक्ति की और न ही आत्मविश्वास की कमी थी. उनका मानना था कि पाकिस्तान के साथ स्थायी टकराव खत्म करके हमें कश्मीर में आगे बढऩे की जरूरत है.
अलगाववादी नेता शब्बीर शाह की मार्च 1995 में संसद भवन में वाजपेयी से मुलाकात हुई तो वाजपेयी ने कहा कि कश्मीर की समस्या को हल करने की जरूरत है.
शाह के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए उन्होंने कहा, "इस गुत्थी को सुलझाना होगा.'' इस बात ने शाह के दिल पर बड़ा असर डाला.दुर्भाग्यवश वाजपेयी को ज्यादा समय नहीं मिला. 1977-78 में जब वे विदेश मंत्री बने, तब अगर मोरारजी देसाई की बजाए वे प्रधानमंत्री बने होते या फिर 2001 में अगर जनरल मुशर्रफ ने आगरा शिखर सम्मेलन में झुंझलाहट न दिखाई होती और 2004 का इस्लामाबाद का सार्क शिखर सम्मेलन बर्बाद नहीं किया जाता या फिर एनडीए 2004 के चुनाव में न हारती-तो कौन जाने आज क्या हालात होते?
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मुश्किल समय और पाकिस्तान की ओर से अड़चनों के बावजूद वाजपेयी ने कभी भी कश्मीर के मुद्दे पर अपना संतुलन नहीं गंवाया. इनसानियत के प्रति उनका जज्बा, उन्हें औरों से बहुत अलग बना देता था. जैसा कि डॉ. फारुक अब्दुल्ला ने कहा, "वाजपेयी का इनसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत का नजरिया उनके बड़प्पन की मिसाल देता है.''
उन्होंने कश्मीरियों में आत्मविश्वास भरा और उम्मीदें जगाईं. कश्मीरियों को ऐसा महसूस होता था मानो वाजपेयी उनके ही बीच से ही निकले कोई शख्स थे.
करगिल, कंधार और संसद पर हमले के बावजूद, 1999 से 2004 के बीच कश्मीर में जो भी सकारात्मकता दिखी, वह सब इस जीनियस शख्स की वजह से थी. वाजपेयी के इनसानियत के नजरिए और उनके दिलाए भरोसे के कारण कश्मीरियों ने आतंकवाद को खारिज कर दिया. वाजपेयी के लिए कश्मीरियों के दिलों में असाधारण प्रेम और सम्मान था.
एक दफे की बात है, सुरक्षा बलों को कश्मीर के ऊंचे इलाकों में छुपे आतंकवादियों को खोज निकालने में भारी दिक्कतें आ रही थीं तो किसी ने मशविरा दिया कि हेलिकॉप्टर पर लगे गन का इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन वाजपेयी ने इसके लिए साफ मना कर दिया.
वे "अपने ही लोगों'' के खिलाफ बेतहाशा ताकत के इस्तेमाल के बिल्कुल खिलाफ थे. इसकी बजाए जब 2000 में हिज्बुल मुजाहिदीन के साथ चला आ रहा संघर्ष विराम खत्म हो गया तब भी वाजपेयी ने रमजान के दौरान बिना शर्त संघर्ष विराम की पेशकश की.
जिसका नतीजा रहा 2003 का संघर्ष विराम, जिसकी रूपरेखा आइएसआइ और रॉ के प्रमुखों ने मिलकर तैयार की थी. तब दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय ऐसा था कि आइएसआइ ने रॉ से मिली खुफिया जानकारी के आधार पर मुशर्रफ की जान बचाई थी. जनरल मुशर्रफ ने भी इसके लिए शुक्रिया अदा किया था.
अगर 2002 का चुनाव सफल रहा, तो यह वाजपेयी की अधिकतम भागीदारी की सोच का नतीजा था. वाजपेयी का उमर अब्दुल्ला से बहुत लगाव था. वाजपेयी उन्हें भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे थे पर उमर चुनाव हार गए. नेशनल कॉन्फ्रेंस बेशक सबसे बड़ी पार्टी बनी पर उसके पास सरकार बनाने लायक संख्या नहीं थी. लेकिन पहली बार अलगाववादियों ने चुनावों में हिस्सा लिया था और पीडीपी सरकार में पीपल्स कॉन्फ्रेंस के एक मंत्री भी बने. यह सज्जाद लोन के मुख्यधारा में आने की शुरुआत भी थी.
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उनके पिता अब्दुल गनी लोन, अलगाववादी नेताओं में सबसे कद्दावर नेता माने जाते थे और उनका कहना था कि कश्मीर का मसला केवल वाजपेयी ही सुलझा सकते हैं. जैसा कि मीरवाइज उमर फारुक ने कहा, "वाजपेयी दुर्लभ नेता थे जो कश्मीर की मुश्किलों का रास्ता, इनसानियत के साथ तलाशने में यकीन रखते थे.''
उन्होंने हुर्रियत के साथ बिना शर्त बातचीत की पेशकश करके कश्मीर मसले को सुलझाने की ईमानदार कोशिश की. हुर्रियत के नेता 2004 में बातचीत के लिए प्रधानमंत्री निवास पर आए तो वाजपेयी ने बातचीत में जो गर्मजोशी दिखाई उससे वे काफी खुश थे.
अप्रैल 2003 में श्रीनगर में एक जलसे में वाजपेयी ने कहा कि उन्होंने दो बार पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया लेकिन उसने दोनों बार हाथ झटक दिया; फिर भी वे हार नहीं मानेंगे और दोस्ती की एक और पेशकश करेंगे. कश्मीरी यह सुनकर खुशी से झूम रहे थे. आज हमने कश्मीरियों को सुनना बंद कर दिया है, हमें जरूरत है कि हम वाजपेयी को अपना आदर्श बनाएं.
जब श्रीनगर तक यह खबर पहुंची कि अटलजी की तबीयत बेहद खराब है और वे AIIMS में भर्ती कराए गए हैं, तो उनकी खैरियत के लिए मस्जिदों और घरों में दुआ की गई. वाजपेयी के इंतकाल के बाद जब मैंने हुर्रियत नेता प्रो. अब्दुल गनी भट्ट को फोन मिलाया, तो वे गमगीन थे. उन्होंने कहा, "आज अटलजी के अलावा हम और क्या बात कर सकते हैं?
वे अमन बांटने वाले शख्स थे. वे हर मुश्किल का वाजिब रास्ता निकालने की काबिलियत रखते थे.'' भट्ट का मानना था कि "अगर वाजपेयी को और मौका मिला होता, तो आज भारत और पाकिस्तान, दोनों साथ-साथ चलते तरक्की कर रहे होते.''
मेरे दोस्त और स्पाइ क्रॉनिकल्स के सह-लेखक, जनरल असद दुर्रानी ने एक बार टिप्पणी की थी, "पाकिस्तान को वाजपेयी की सख्त जरूरत है.'' क्या अभी भी हमें शक है कि कश्मीर मसला अटलजी के रास्ते चलकर ही हल हो सकता है?
- रिसर्च ऐंड एनालिसिस (RAW) के पूर्व प्रमुख ए.एस. दुलत ने यह आलेख इंडिया टुडे मैगजीन के 5 सितंबर, 2018 के अंक में लिखा था