एनडीए को मिल रहा है नवीन सहयोग
बीजद के मोदी सरकार के पक्ष में खड़े हो जाने से भाजपा की राज्य इकाई और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की स्थिति असहज हो गई है. उनके सामने दुविधा है कि अब वे राज्य में बीजद के खिलाफ आक्रामक बने रहें या चुप्पी साध लें. बीजद न तो यूपीए में है और न ही एनडीए में, लेकिन प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नवीन पटनयाक मोदी सरकार के साथ हर बार खड़े दिख रहे हैं.

अगस्त की आठ तारीख को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक मुंबई में मेक इन ओडिशा कॉन्क्लेव की नींव मजबूत करने के लिए निवेशकों के सम्मेलन में थे. उसी दिन देर शाम को उन्हें राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में एनडीए उम्मीदवार हरिवंश नायारण सिंह के समर्थन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोन आया. पटनायक हरिवंश को समर्थन देने पर राजी हो गए और भुवनेश्वर आकर रात करीब 9 बजे उन्होंने हरिवंश को समर्थन देने की घोषणा कर दी.
सूत्रों की माने तो अगले दिन चुनाव जीतने के बाद फिर प्रधानमंत्री फोन करके पटनायक को आभार जताते हुए कहते हैं, ''आभारी हूं और आगे भी आभारी रहूंगा.'' ओडिशा के राजनीतिक तबकों में इसके नए निहितार्थ निकाले जा रहे हैं. एक ओर जहां राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भारी राहत मिलती नजर आ रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य में वह ऊहापोह में है.
हालांकि यह पहला वाकया नहीं है जब भाजपा के पुराने सहयोगी रहे बीजू जनता दल (बीजद) प्रमुख पटनायक ने नरेंद्र मोदी सरकार को राहत दी है. मानसूत्र के दौरान ही दो ऐसे मौके देखने को मिले. इससे पहले अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बीजद ने मोदी सरकार के खिलाफ वोट करने की बजाए अनुपस्थित रहकर एनडीए की परोक्ष मदद की थी. अब उपसभापति के चुनाव में अपने 9 सदस्यों का वोट एनडीए उम्मीदवार को दिला कर उन्होंने इस सियासी चर्चा की राह खोल दी है कि 2019 के लोकसभा और ओडिशा विधानसभा चुनाव तक दोनों साथ आ सकते हैं.
या फिर चुनाव बाद बीजद एनडीए का हिस्सा हो सकती है. दरअसल उपसभापति के चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कांटे का टक्कर था. एनडीए और यूपीए दोनों की नजर बीजद के वोट पर थी. कयास लगने लगे कि पटनायक खुद अपना प्रत्याशी उतार सकते हैं या फिर ऐन चुनाव के वक्त वाकआउट कर जाएंगे.
या फिर देश के मौजूदा हालात और राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनावी बयार के संकेतों को भांपते हुए बीजद, यूपीए के साथ जाने का फैसला करे. राज्यसभा में भाजपा और उसके सहयोगियों की संख्या कांग्रेस तथा उसके सहयोगियों की संख्या में ज्यादा अंतर नहीं था. भाजपा के दिग्गज परेशान थे. जनता दल (यू) के हरिवंश को एनडीए का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह लगातार फोन के जरिए पटनायक के संपर्क में थे.
मिनिमम वर्ल्ड, मैक्सिमम वर्क के लिए प्रसिद्ध पटनायक उन्हें बस यही एक लाइन कहकर जवाब देते रहे, ''हां देखते हैं.'' इन दोनों नेताओं ने फिर नरेंद्र मोदी को रिपोर्ट दी. और आखिरकार मोदी के फोन करने के बाद पटनायक राजी हो गए.
लेकिन मोदी सरकार के पक्ष में बीजद के खड़े हो जाने से भाजपा का ओडिशा में चेहरा कहे जाने वाले केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की स्थिति असहज हो गई है. राज्य में बीजद सरकार के 18 साल को नाकाम बताकर आक्रामक रहने वाले प्रधान के सामने दुविधा यह है कि वे अपना आक्रामक रुख जारी रखें या फिर चुप्पी साध लें. भाजपा की राज्य इकाई और उसके कार्यकर्ताओं के सामने सियासी धर्मसंकट खड़ा हो गया है कि अगर केंद्रीय नेतृत्व, बीजद से हाथ मिला लेता है तो फिर राज्य में पार्टी कितनी भी आक्रामक हो जाए जनता में गलत संदेश गलत जाएगा. भुवनेश्वर में पार्टी कार्यालय में मुरझाये से बैठे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं, ''ऐसी स्थिति में चुनाव के दौरान वोट कैसे मांगेंगे.''
वर्ष 2000 से 2009 तक गलबहियां डालकर राजनीति करने वाली बीजद और भाजपा ओडिशा में भले ही एक दूसरे के कट्टर दुश्मन की तरह दिखाई देते रहे हों, मोदी और शाह मंचों से पटनायक तथा उनकी पार्टी को पानी पी-पीकर कोसते रहे हों, लेकिन दिल्ली में दोनों ही दलों की जुगलबंदी जगजाहिर है. मौके-बेमौके एनडीए के पक्ष में खड़े होकर पटनायक ने 2019 के आम चुनाव में बीजद की भूमिका के साफ संकेत दिए हैं. ऐसे में अगर लोकसभा चुनाव के पहले या बाद में बीजद अगर एनडीए के पक्ष में चली जाए तो यह कोई हैरानी की बात नहीं होगी.
बीजद ने भाजपा के साथ वर्ष 2000 और 2004 में लगातार दो बार साझा सरकार बनाया था. बाद में 2008 में कंधमाल में विश्व हिंदू परिषद के प्रचारक लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद दोनों में खटास आने लगी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दखल के कारण दोनों की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई. उसके बाद 2009 से बीजद चुनावी मैदान में बढ़त लेती रही. यहां तक कि 2014 में ओडिशा मोदी लहर से भी अछूता रहा. हालांकि केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद बीजद केंद्र के प्रति नरम हुआ.
2014 के लोकसभा चुनाव 21 में से 20 लोकसभा सीट और विधानसभा चुनाव में 147 में 117 विधानसभा सीट हासिल करके बीजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, पर केंद्र के साथ रिश्ते मधुर बनाए रखने में पटनायक ने कोई कमी नहीं छोड़ी.
माइंस ऐंड मिनिरल डेवलपमेंट रेग्युलेशन ऐक्ट में संशोधन से यूपीए सरकार द्वारा आवंटित खनन ब्लॉक निरस्त करने के फैसले में बीजद ने केंद्र का साथ दिया, जबकि इससे मिनिरल माइंस में केंद्र का हस्तक्षेप में बढ़ा. ओडिशा के 37 ब्लॉक के पट्टे निरस्त किए गए.
राज्यसभा में विभिन्न विधेयकों को पास कराने में भी बीजद ने मोदी सरकार का साथ दिया. यही नहीं, पटनायक ने सर्जिकल स्ट्राइक की तारीफ की थी और जीएसटी का खुला समर्थन करके वे केंद्र सरकार की नजर में राष्ट्रीय स्तर पर सुधारवादी व्यक्तित्व के रूप में उभरे. राष्ट्रपति के निर्वाचन में भी बीजद ने व्हिप जारी करके एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
हालांकि, उपसभापति के पद पर हरिवंश के समर्थन को लेकर तर्क यह दिया जा रहा है कि जनता दल (यू) के नेता जयप्रकाश नारायण आंदोलन की देन हैं और दोनों पार्टियों की सियासी जड़ें जुड़ी हुई हैं. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और सियासी विश्लेषक रविदास कहते हैं, ''राज्य में भाजपा पटनायक सरकार के प्रति आक्रामक रहती है, पर केंद्र में कुछ और ही नजर आता है. यह 2019 के आम चुनाव में समर्थन पाने की रणनीति हो सकती है.'' हाल ही में पटनायक ने असम में राष्ट्रीय नागरिकता (एनआरसी) के मुद्दे की भी तारीफ की है.
ऐसे में कांग्रेस विधायक दल के मुख्य सचेतक तारा प्रसाद बाहिनीपति सवाल करते हैं, ''कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने का पटनायक का बयान अब कहां गया? आरोप लगाने वाले अचानक शांत क्यों हो गए? समान दूरी बनाए रखने का नवीन मंत्र कहां चला गया?''
हालांकि बीजद के प्रवक्ता और सहकारिता तथा नागरिक आपूर्ति मंत्री सूर्यनारायण पात्र का कहना है, ''दोनों दलों से समान दूरी के बयान पर हमारे नेता कायम हैं, और भाजपा के साथ गठबंधन का तो सवाल ही नहीं उठता.'' लेकिन कथनी और करनी का फर्क सार्वजिनक रूप से नजर आने लगा है. वैसे भी राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता.
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