पश्चिम बंगालः जांच के दायरे से अलग मुख्यमंत्री
राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष पूछते हैं, "मुख्यमंत्री खुद को ईमानदारी की प्रतीक बताती हैं, तो भला वे इन सुधारों के जरिए छूट हासिल कर खुद को सुरक्षित क्यों रखना चाहती हैं?''

पश्चिम बंगाल लोकायुक्त संशोधन विधेयक 2018 को 23 जुलाई को राज्य की विधायिका से मंजूरी मिल गई है. यह कानून मुख्यमंत्री को लोकायुक्त की जांच के दायरे से बाहर रखता है. राज्य सरकार द्वारा जारी गजट के अनुसार यह संशोधन "मुख्यमंत्री के खिलाफ सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की शिकायत को जांच के दायरे से बाहर करता है और किसी सार्वजनिक अधिकारी के खिलाफ शिकायत की जांच भी राज्य सरकार की मंजूरी के बगैर नहीं हो सकेगी.''
2003 में तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार द्वारा लाए गए मूल लोकायुक्त ऐक्ट में मुख्यमंत्री को ऐसी कोई राहत नहीं दी गई थी, हालांकि उसमें भी मुख्यमंत्री के लिए एक ढाल की व्यवस्था जरूर की गई थी. उसमें कहा गया था कि मुख्यमंत्री या अन्य मंत्रियों और लोक सेवकों के खिलाफ पद के दुरुपयोग की शिकायतों की जांच के लिए "उपयुक्त अथॉरिटी'' से मंजूरी लेनी होगी. जैसे, मुख्यमंत्री के मामले में विधानसभा के दो-तिहाई बहुमत की मंजूरी और मंत्रियों के मामले में विधानसभा के स्पीकर की मंजूरी.
वाममोर्चा के नेताओं ने ममता के नए संशोधन के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है. वाममोर्चा विधायक दल के नेता सुजान चक्रबर्ती ने कहा, "यह (मुख्यमंत्री को छूट) भेदभाव है और भ्रष्ट लोगों को बचने का रास्ता मुहैया करता है.'' विधानसभा में इस पर बहस का जवाब देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि उन्हें छूट सिर्फ "सार्वजनिक व्यवस्था'' के मामले में मिली हुई है, जिसका दायरा बहुत सीमित है. उन्होंने कहा, "राज्य सूची के अन्य विषय लोकायुक्त के दायरे में आते हैं.''
विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, "आपको लगता है कि यह कमजोर विधेयक है...तो जब आप सरकार में आइएगा, अपनी जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव कर लीजिएगा.''
लेकिन मौजूदा कानून के मुताबिक तो "सार्वजनिक व्यवस्था'' के अलावा मामलों में भी लोकायुक्त को मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के किसी आरोपों की जांच के लिए विधानसभा के दो-तिहाई बहुमत की मंजूरी लेनी होगी. विपक्ष इससे काफी खफा है. राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष पूछते हैं, "मुख्यमंत्री खुद को ईमानदारी की प्रतीक बताती हैं, तो भला वे इन सुधारों के जरिए छूट हासिल कर खुद को सुरक्षित क्यों रखना चाहती हैं?'' हालांकि, ममता बनर्जी कहती हैं कि संशोधित विधेयक केंद्र सरकार द्वारा पारित लोकपाल और लोकायुक्त ऐक्ट, 2013 के अनुरूप है, जिसमें प्रधानमंत्रियों को इसी तरह की छूट दी गई है.
तृणमूल कांग्रेस सरकार की स्वास्थ्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने भी केंद्र सरकार के ऐक्ट के मुताबिक मुख्यमंत्री को मिली छूट को न्यायोचित ठहराने की कोशिश की. कांग्रेस नेता अब्दुल मन्नान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्रियों को बाहर रखने को वाजिब ठहराते हैं.
कोलकाता में तो यह अटकलें तेज हो गईं हैं कि क्या यह कदम ममता बनर्जी को शारदा और नारद जैसे वित्तीय घोटालों की जांच के दायरे से बाहर रखने की कोशिश है (जेल में बंद शारदा के प्रमुख सुदीप्तो ने ममता की पेंटिंग आश्चर्यजनक कीमत में खरीदी थी).
लेकिन मुख्यमंत्री इस बात पर जोर देती हैं, "सिर्फ जनता मेरी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकती है.'' कांग्रेस के गांधी परिवार को निशाने पर लेते हुए उन्होंने कहा कि राजीव गांधी के समय कोई लोकपाल नहीं था, फिर भी वे बोफोर्स की जांच से बच नहीं सके.
आखिरकार तमाम हो-हंगामे के बावजूद यह संशोधन बिल भारी बहुमत से पास हो गया. हालांकि, कई लोग इसे अब भी "कमजोरी'' का संकेत मानते हैं. क्या ममता बनर्जी को अपनी पार्टी की बुनियाद हिलने का डर है?
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