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पिछले तीन वर्षों में गोरक्षा के नाम पर या सोशल मीडिया पर बच्चों के अपहरण की अफवाहों के चलते भीड़ के हाथों 50 लोगों—ज्यादातर अल्पसंख्यक और गरीब तबके से संबंधित—की हत्या हो चुकी है.

भीड़ की हिंसा
भीड़ की हिंसा

राजस्थान के अलवर जिले में 28 साल के रकबर खान की पीट-पीटकर हत्या और उसके एक साल पहले इसी तरह गौरक्षकों के हाथों पहलू खान की सरेआम हत्या पर सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि देश के भीतर हिंसक असहिष्णुता की संस्कृति तेजी से बढ़ती जा रही है.

पिछले तीन वर्षों में गोरक्षा के नाम पर या सोशल मीडिया पर बच्चों के अपहरण की अफवाहों के चलते भीड़ के हाथों 50 लोगों—ज्यादातर अल्पसंख्यक और गरीब तबके से संबंधित—की हत्या हो चुकी है. अकेले मई से ही इस तरह की 16 हत्याएं हो चुकी हैं.

और इनमें बदकिस्मत रकबर शामिल नहीं है जिसे 21 जुलाई को सुबह पौ फटने से पहले पीट-पीटकर मार डाला गया. वह अपने दोस्त असलम खान के साथ पैदल चलकर दो गायों को अलवर से लालवंडी गांव में अपने घर ले जा रहा था.

इस वारदात से एक दिन पहले मध्य प्रदेश के सि गरौली जिले में मानसिक रूप से बीमार एक महिला को इसलिए पीट-पीटकर मार दिया गया क्योंकि उस पर बच्चा चोरी का शक था. इसी तरह 22 जुलाई को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में भीड़ ने चार महिलाओं को सबके सामने नंगा कर दिया.

ये सारी घटनाएं सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की खंडपीठ की ओर से ‘भीड़तंत्र की जघन्य करतूतों’ पर नाराजगी जाहिर किए जाने के एक हक्रते के भीतर हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ‘बार-बार एक ही तरह की हिंसा’ का हवाला देते हुए इसे अब एक ‘नई सामान्य बात’ होने का खतरा बताया था.

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस डी.वाइ. चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने संसद से एक अलग कानून बनाने का आग्रह किया जिसमें भीड़ की हिंसा के लिए सख्त सजा का प्रावधान हो ताकि ‘‘इस तरह की गतिविधियों में शामिल लोगों के भीतर डर का भाव पैदा हो सके.’’

अदालत ने राज्य सरकारों को हर जिले में नोडल पुलिस अधिकारियों की नियुक्तिे का निर्देश दिया ताकि संभावित क्षेत्रों की पहचान की जा सके, नफरत फैलाने वाले व्यक्तिहयों या समूहों के बारे में सूचनाएं एकत्र की जा सकें और सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें फैलने से रोकने के लिए कदम उठाया जा सके. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को चार हफ्ते के भीतर इन निर्देशों पर अमल के बारे में रिपोर्ट देने का आदेश दिया था.

हालांकि सरकार ने गृह मंत्री राजनाथ सिंदह की अध्यक्षता में मंत्रियों के एक समूह का गठन कर दिया जो गृह सचिव के अधीन एक समिति के बनाए मसौदे के आधार पर भीड़ की हिंसा के खिलाफ एक नए कानून पर अपनी सिफारिशें देगा लेकिन संसद में इसे लेकर चल रही बहस बेहद दुखद है.

लोकसभा में बोलते हुए सम्मिलित विपक्ष सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ले आया, राजनाथ सिंकह ने देश में बढ़ती असहिष्णुता के लिए ‘हिंदू तालिबान’ और ‘मिनी पाकिस्तान’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर कांग्रेस के नेताओं को खरी-खोटी सुनाई.

उन्होंने यहां तक कह दिया कि ‘‘भीड़ की हिंसा की सबसे बड़ी घटना 1984 में हुई थी और एक बड़े नेता (राजीव गांधी) ने कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है. और वे हमें भीड़ की हिंसा का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.’’

इधर, अलवर के रामगढ़ में भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा का कहना था कि रकबर और असलम ‘गौ तस्कर’ थे और रकबर की मौत पुलिस की पिटाई से हुई, न कि ‘गोरक्षकों’ के हाथों. लेकिन इस घटना के एकमात्र ज्ञात प्रत्यक्षदर्शी असलम ने पुलिस को बताया कि पांच हमलावरों ने खुलकर दावा किया था कि वे आहूजा के आदमी हैं. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती.

हत्या के एक दिन बाद आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश को रांची में ऐसा कहते हुए बताया गया: ‘‘भीड़ की हिंसा का स्वागत नहीं किया जा सकता है (लेकिन) अगर गोमांस खाना रुक जाए तो इस तरह के अपराध रोके जा सकते हैं.’’

उनका यही ‘ज्ञान’ भाजपा के नेता विनय कटियार की ओर से भी सुनने को मिला. उन्होंने मुसलमानों को सलाह दी कि गाय को हाथ लगाने और हिंदुओं को भड़काने से बाज आएं. दिल्ली में केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने 2017 में झारखंड में पशुओं के एक व्यापारी अलीमुद्दीन अंसारी को मारने के दोषी आठ लोगों को माला पहनाने के लिए खेद प्रकट किया.

इस बीच राजस्थान के गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने 21 जुलाई की हिंसा की न्यायिक जांच कराने की घोषणा कर दी.

—साथ में रोहित परिहार

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