कर्नाटक में भाजपा से छिटक गए लिंगायत !

मठों के महंत भाजपा को छोड़ कांग्रेस के समर्थन में आगे आए.

बदला रुख बेंगलूरू में 7 अप्रैल को लिंगायत मठाधिपतियों की सभा में 30 महंतों ने कांग्रेस को समर्थन जा
बदला रुख बेंगलूरू में 7 अप्रैल को लिंगायत मठाधिपतियों की सभा में 30 महंतों ने कांग्रेस को समर्थन जा

आसार अच्छे दिखाई नहीं दे रहे हैं (भाजपा के लिए). कर्नाटक विधानसभा चुनावों में मुश्किल से एक महीना रह गया है और लिंगायतों के धर्मगुरुओं में सबसे श्रद्धेय आध्यात्मिक प्रमुख माते महादेवी ने समुदाय के लोगों से कांग्रेस को वोट देने का आह्वान किया है.

यह राज्य में भाजपा के लिए बड़े संकट का सबब हो सकता है. वह भी तब जब भगवा नेतृत्व 8 अप्रैल को उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने के बाद टिकट के दावेदारों की अप्रत्याशित बगावत से जूझ रहा है.

राज्य में असरदार लिंगायत और वीरशैव मठों का समर्थन जुटाने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के जोरदार अभियान के महज कुछ ही दिनों बाद बासव धर्मपीठ (उत्तर कर्नाटक में लिंगायतों का सबसे प्रभावशाली धार्मिक शिक्षा केंद्र) की पहली महिला प्रमुख और धर्मगुरु साध्वी महादेवी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

बेंगलूरू में 7 अप्रैल को लिंगायत साधुओं के जमावड़े में उन्होंने कहा, ''मैं चाहती हूं तमाम लिंगायत कांग्रेस पार्टी को वोट दें, क्योंकि मुख्यमंत्री सिद्धरामैया हमारे लिए अलग धर्म के दर्जे का ईमानदारी से समर्थन कर रहे हैं.''

उनके इस ऐलान से भाजपा का चुनावी गणित गड़बड़ा सकता है क्योंकि दूसरे 30 लिंगायत साधु-संतों ने भी उनके इस फैसले का समर्थन किया है. राज्य के मतदाताओं में लिंगायतों और वीरशैवों की तादाद 16 फीसदी है और ये पारंपरिक तौर पर भाजपा के समर्थक रहे हैं.

मगर अब मुख्यमंत्री सिद्धरामैया लिंगायतों को हिंदू धर्म से स्वतंत्र एक अलग धार्मिक पहचान का वादा कर रहे हैं. उनकी इस चाल से समुदाय का रुख कांग्रेस की तरफ पलटता दिखाई दे रहा है.

लिंगायतों की बहुतायत वाले रायचुर जिले के एक युवा नेता बासवेगौड़ा एच.पी. कहते है कि भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बी.एस. येदियुरप्पा हालांकि समुदाय के निर्विवाद नेता रहे हैं, ''पर वे दोबारा मुख्यमंत्री बनने पर हमारा मुद्दा उठाने का वादा तक नहीं कर रहे हैं.''

राज्य की मौजूदा विधानसभा में लिंगायतों के 50 विधायक (कांग्रेस के 29 और भाजपा के 16) हैं और भगवा पार्टी इस समुदाय के अपने विधायकों की तादाद बढ़ाने की उम्मीद कर रही थी. लिंगायत नेताओं का कहना है कि अगर भाजपा हमारा समर्थन चाहती है, तो उसे अपना रुख स्पष्ट करना ही होगा.

श्री मुरुगराजेंद्रन मठ के शिवमूर्ति शिवआचार्य स्वामी कहते हैं, ''समर्थन से समर्थन मिलता है. जब तक हमारी मांग मान नहीं ली जाती, हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.''

येदियुरप्पा ने 2013 में अपनी अलग सियासी पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष (केजेपी), जो बहुत कम वक्त कायम रही, बनाकर चुनाव लड़ा था और लिंगायतों के वर्चस्व वाली कम से कम 30 सीटों पर भाजपा को पलीता लगाया था.

बेंगलूरू के राजनैतिक पंडित ए. वीरप्पा कहते हैं कि इस बार लिंगायतों के लिए अलग धर्म का मुद्दा कुल 225 सीटों की विधानसभा में 80 सीटों पर असर डाल सकता है.

हालांकि येदियुरप्पा कहते हैं कि सिर्फ कुछेक लिंगायत साधु-संत ही असल में महादेवी के विचारों से इत्तेफाक रखते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री ने 9 अप्रैल को बेंगलूरू में कहा, ''समुदाय हमारे साथ है और दूसरे बड़े समुदाय भी हमारे साथ हैं. मुझे 150 सीटों के लक्ष्य पर पहुंचने का पूरा भरोसा है.''

मगर हालात और बदतर ही हुए हैं, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री को अब बगावत से भी जूझना पड़ रहा है. 72 उम्मीदवारों की पहली सूची में जिन लोगों को भाजपा का टिकट नहीं मिला, उनमें से कम से कम 15 दावेदारों ने निर्दलीय चुनाव लडऩे के अपने इरादे का ऐलान कर दिया है. जानकारों का कहना है कि इससे प्रभावित सीटों पर भाजपा की संभावनाओं को और भी धक्का पहुंचेगा.

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