पीडीपी साख बचाएगी या गठबंधन धर्म निभाएगी?
मुख्यमंत्री महबूबा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कई बार पाकिस्तान और हुर्रियत के साथ दोबारा बातचीत करने की अपील कर चुकी हैं. मुख्यमंत्री के इन अनुरोधों पर बिल्कुल भी गौर नहीं किया गया है और उसकी लगातार अवहेलना की गई है.

उमर अब्दुल्ला ने 16 मार्च को श्रीनगर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं को बताया, ''जम्मू-कश्मीर में पैदा होने जा रही अस्थिरता की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है.'' पूर्व मुख्यमंत्री राज्य के वित्त मंत्री हसीब द्राबू को एक झटके में असम्मानजनक तरीके से बरखास्त किए जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे.
द्राबू को सत्ताधारी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से केंद्र के साथ बातचीत करने वाले प्रमुख व्यक्ति के तौर पर भी जाना जाता था.
प्रत्यक्ष तौर पर उन्हें हटाए जाने की वजह उनका वह विवादास्पद बयान बताया जा रहा था जो उन्होंने नई दिल्ली में कुछ राजनयिकों के सामने दिया था, जिसमें उन्होंने कश्मीर समस्या के 'राजनीतिक' पहलुओं से ज्यादा उसके 'सामाजिक' पहलुओं पर जोर दिए जाने की मांग की थी.
लेकिन इसकी असली वजह कुछ और है जो पार्टी जाहिर नहीं करना चाहेगी. कुछ जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सईद के इस कदम का मकसद घाटी में पार्टी की तेजी से गिरती साख को बचाने और गठबंधन की साझीदार भाजपा को कड़ा संदेश देने की कोशिश है.
पिछले साल अक्तूबर में इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दिनेश्वर शर्मा की मध्यस्थ के रूप में नियुक्ति को छोड़कर पीडीपी-भाजपा गठबंधन ने एजेंडा ऑफ एलायंस (एओए) में किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में शायद ही कोई काम किया है.
इस एजेंडे का मसौदा 2014 में द्राबू और भाजपा महासचिव राम माधव ने संयुक्त रूप से तैयार किया था. गठबंधन के मुख्य बिंदुओं—शासन में जरूरी सुधारों से लेकर एनएचपीसी की दुलहस्ती और उड़ी बिजली परियोजना की राज्य को वापसी तक ''सभी अंदरूनी और बाहरी पक्षों के साथ बातचीत'' पर कोई भी काम नहीं हुआ है.
मुख्यमंत्री महबूबा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कई बार पाकिस्तान और हुर्रियत के साथ दोबारा बातचीत करने की अपील कर चुकी हैं. मुख्यमंत्री के इन अनुरोधों पर बिल्कुल भी गौर नहीं किया गया है और उसकी लगातार अवहेलना की गई है.
नवंबर 2015 में मोदी ने दिवंगत नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद को जो संदेश दिया था, ठीक उसी रुख का अनुसरण करते हुए माधव ने इस साल फरवरी में कहा था कि पाकिस्तान के साथ बातचीत का समय क्या होगा, यह केंद्र का विशेषाधिकार है. उनका कहना था, ''महबूबाजी की अपनी राय हो सकती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि दो सरकारें अगर एक-दूसरे से बातचीत करती हैं तो हिंसा में कमी आ सकती है.
लेकिन (इस विषय पर) गठबंधन में कोई राय नहीं बना सकता, इसके अधिकार राज्य के मामलों में सीमित हैं.'' पीडीपी के आम कार्यकर्ता लंबे समय से भाजपा के साथ गठबंधन करने के फैसले पर सवाल उठाते रहे हैं.
मुफ्ती परिवार के करीबी और पीडीपी के एक वरिष्ठ मंत्री का कहना है, ''इस गठबंधन के कारण पार्टी की साख खत्म हो चुकी है.'' पीडीपी के अधिकांश नेता स्वीकार करते हैं कि गठबंधन ने खासकर दक्षिण कश्मीर के पार्टी के गढ़ में मतदाताओं को विमुख कर दिया है.
निराश होने वाले इन मतदाताओं में बड़ी संख्या में वे युवा हैं जिन्होंने 2014 के विधानसभा के चुनाव प्रचार में 'अलगाववादियों के प्रति नरम रुख और भाजपा के खिलाफ सक्चत रुख' के कारण पार्टी को वोट दिया था.
पीडीपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''द्राबू को बर्खास्त करके महबूबा ने उस व्यक्ति को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया है जिसने पीडीपी और भाजपा के गठबंधन की शर्तों का मसौदा तैयार किया था. हालांकि गठबंधन अभी बरकरार है लेकिन महबूबा—भाजपा और अपने मतदाताओं दोनों को—संकेत दे रही हैं कि जरूरत हुई तो वे गठबंधन से अलग भी हो सकती हैं.''
महबूबा की ओर से द्राबू की जगह लाए गए नए वित्त मंत्री सैयद अल्ताफ बुखारी ने श्रीनगर में कहा, ''हमारी पार्टी की विचारधारा को लेकर किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा और अगर स्थिति बिगड़ी तो हम गठबंधन तोडऩे में जरा भी नहीं हिचकेंगे.''
भाजपा से अलग होने का संकेत देने का यह कोई पहला मामला नहीं है. इस महीने के शुरू में महबूबा ने अपनी कैबिनेट में भाजपा के मंत्रियों की उस मांग को ठुकरा दिया था जिसमें जनवरी के महीने में कठुआ (जम्मू) में आठ साल की एक मुसलमान लड़की के साथ बलात्कार और हत्या की जांच सीबीआइ को सौंपने की बात कही गई थी.
इस मामले ने एक बड़ा राजनीतिक रंग पकड़ा था क्योंकि इसे दक्षिणपंथी हिंदुओं की नाराजगी के नतीजे के तौर पर देखा जा रहा है जो जम्मू क्षेत्र में मुस्लिम प्रवासियों के आ जाने से गुस्से में हैं.
इस मामले को लेकर भाजपा के कुछ मंत्रियों ने सड़कों पर जुलूस निकालकर मामले को सीबीआइ के हवाले करने की मांग की है. लेकिन मुख्यमंत्री इस पर अड़ी हुई हैं कि राज्य पुलिस ही मामले की पूरी जांच करेगी. विश्लेषकों का मानना है कि अब केवल कुछ समय की बात रह गई है.
महबूबा कभी भी भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ सकती हैं. एओए की शर्तों को लागू करने की विफलता और घाटी में बढ़ती हिंसा को देखते हुए अब यही एकमात्र रास्ता रह गया है जिससे पीडीपी सूबे में अपनी स्थिति कुछ हद तक संभालने की उम्मीद कर सकती है.
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