आगामी आम चुनाव में सुस्त और बुजुर्ग मैदान से रहेंगे दूर

लोगों की जबरदस्त नाराजगी की शिकायत से अगले संसदीय चुनावों में कई सीटों पर उम्मीदवार बदलने की रणनीति पर भाजपा कर रही विचार

विक्रम शर्मा
विक्रम शर्मा

अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय में पिछले साल 25 दिसंबर को जब अमित शाह 2019 की लोकसभा चुनाव तैयारियों को लेकर महासचिवों और पदाधिकारियों के साथ बैठे तो उनके टेबल पर भारत का नक्शा रखा था. नक्शे में हर राज्य की लोकसभा सीटों के नाम और ए, बी, सी और डी श्रेणी लिखा था.

ए श्रेणी की सीट को भाजपा के लिहाज से सरल और डी श्रेणी की सीट को कठिन आंका गया. पार्टी महासचिव अरुण सिंह कहते हैं, ''2019 के लिहाज से ए और बी श्रेणी में काफी संख्या में ऐसी लोकसभा सीटें हैं, जहां भाजपा अपेक्षाकृत कमजोर थी. खासकर कोरोमंडल क्षेत्र (ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश) में हम शानदार प्रदर्शन करेंगे. हमारे कार्यकर्ताओं ने अपनी मेहनत से इन सीटों को सरल बना दिया है."

भाजपा अध्यक्ष शाह भी औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि 2014 के चुनाव में पार्टी ने लोकसभा की जितनी सीटें जीती थी, उन सभी को बचाना संभव नहीं है. लेकिन वे यह भी कहते हैं, ''2014 में जीतनी सीटें (282) पार्टी को मिली थीं, उससे कहीं अधिक सीटें 2019 में मिलेंगी." दरअसल, उन्हें उम्मीद है कि जितनी सीटें 2019 में गंवाने की आशंका है, उसकी भरपाई पिछली बार हारी हुई सीटों को जीतने से हो जाएगी. उनका गणित जो भी हो, मगर पार्टी में बेचैनी साफ देखी जा रही है.

सूत्रों का कहना है कि पार्टी को मिले फीडबैक के मुताबिक, दस राज्यों में मौजूदा सांसदों के खिलाफ सत्ताविरोधी रुझान जबरदस्त है. ये वही राज्य हैं, जहां 2014 में भाजपा सर्वाधिक सीटें जीतने में कामयाब रही थी. गुजरात, राजस्थान, हिमाचल, दिल्ली, गोवा और उत्तराखंड की सभी 69 लोकसभा सीटें भाजपा जीत गई थी.

अब भाजपा नेता यह मान कर चल रहे हैं कि इन छह राज्यों में पार्टी लगभग 50 फीसदी सीटें (यानी 35) गंवा सकती है. इसके अलावा, उत्तर प्रदेश की 80 में 71, छत्तीसगढ़ के 11 में 10, मध्य प्रदेश की 29 में 26 और झारखंड के 14 में 12 सीटें भाजपा जीतने में कामयाब रही थी. इन चार राज्यों की कुल 134 सीटों में भाजपा ने 119 सीटें जीत ली थी.

यहां भी नाराजगी के चलते उसे 2019 में आधी से अधिक सीटें गंवाने की आशंका है. दरअसल, पिछले लोकसभा चुनाव में 29 में से 15 राज्यों की 343 लोकसभा सीटों में से भाजपा 264 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, ऐसे लगभग 150 सांसद हैं, जिनके खिलाफ सत्ताविरोधी रुझान की फीडबैक है. इसी वजह से पार्टी नेतृत्व उत्तर प्रदेश में कुल 71 में से 32 सांसदों को बदलने की सोच रही है. इसी तरह बिहार में 22 में से 10, गुजरात में 26 में से 12, महाराष्ट्र में 23 में से 11, छत्तीसगढ़ में 10 में से 7, दिल्ली में 7 में से 4, राजस्थान में 25 में से 14, उत्तराखंड में 5 में से 3, हिमाचल में 4 में से 3, असम में 7 में से 3, झारखंड में 12 में से 8 तथा कर्नाटक में 17 में से 9 सांसदों को बदलने का विचार पार्टी कर रही है. इनके कई बुजुर्ग सांसदों को भी बदलने का विचार पार्टी ने किया है.

वोटरों की नाराजगी को देखते हुए भाजपा इस कोशिश में रही कि इस साल होने वाले चार प्रमुख राज्यों—कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव लोकसभा के साथ ही कराए जाएं. इसके लिए ''एक देश, एक चुनाव" की पहल भी शुरू हुई. लेकिन अनौपचारिक बातचीत में भाजपा नेताओं का यह कहना है कि समय की कमी और तकनीकी वजहों से ऐसा होना फिलहाल संभव नहीं है.

सांसदों और यहां तक कि कई केंद्रीय मंत्रियों केखिलाफ लोगों की नाराजगी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वाकिफ हैं. पिछले पौने चार साल में मोदी पार्टी, संसदीय दल और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकों में लगातार सांसदों से कहते आए हैं कि वे अपने संसदीय क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं. संसद के पिछले सत्र के दौरान संसदीय दल की बैठक में तो प्रधानमंत्री ने कहा था, ''ज्यादातर सांसद तो नमो ऐप पर मेरे गुड मॉर्निंग का जवाब तक नहीं देते हैं."

भाजपा के एक महासचिव कहते हैं कि पिछले छह महीने के दौरान हर संसदीय क्षेत्र से पार्टी को फीडबैक मिल रहा है. कई मामलों में गंभीर खामी यह है कि सांसद न तो केंद्र सरकार, न ही संबंधित राज्य सरकार (भाजपा शासित राज्यों में) की योजनाओं को अपने क्षेत्र तक गंभीरता से ले गए हैं. 

फिलहाल पार्टी लोगों में विरोधी रुझान को बदलने के लिए तीन-तीन संसदीय क्षेत्र का क्लस्टर बनाने पर विचार कर रही है. आसपास के इलाके के सक्रिय सांसदों को दूसरे सांसदों की मदद करने को भी कहा जा रहा है. भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी की तरफ से करीब 150 सांसदों से कह दिया गया है कि अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपने इलाके के 2-3 कर्मठ कार्यकर्ताओं के नाम सुझाएं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ पिछले साल सितंबर में मथुरा की समन्वय बैठक में यह सुझाव आया था कि चुनावी राजनीति में नीचे से ऊपर के क्रम में तीसरी, दूसरी और पहली पीढ़ी का पिरामिड तैयार किया जाए. मतलब यह कि नीचे युवाओं की तीसरी पीढ़ी (30 से 45 वर्ष), बीच में दूसरी पीढ़ी (45 से 55) और अंत में यानी ऊपर पहली पीढ़ी (55 से ऊपर) का जन प्रतिनिधि संसद तक पहुंचे.

संघ की इसी सोच के मुताबिक प्रधानमंत्री के निर्देश पर सभी सांसदों से कहा गया था कि अपने क्षेत्र के 5-5 ऐसे युवाओं के नाम पार्टी को लिखित में बताएं जो पेशेवर हों, अपने क्षेत्र में जिनकी पहचान हो और जिनकी आयु 40 साल से नीचे हो. पार्टी से मिली जानकारी के मुताबिक, 226 सांसदों ने ऐसे युवाओं के नाम संगठन को सुझा दिए हैं. संबंधित राज्य इकाइयां 300 से अधिक पेशेवरों की पहचान कर चुकी हैं.

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं, ''हमारा फोकस 2019 में 2014 से भी बड़ी जीत हासिल करने पर है." यह भी तय है कि जो पिछली बार चुनाव लड़े थे, जरूरी नहीं कि उनमें सभी इस बार भी चुनाव लड़ेंगे. वे कहते हैं, ''सिटिंग-गेटिंग का फॉर्मूला चलता रहेगा तो नए लोगों को तो मौका ही नहीं मिलेगा. इसलिए टिकट कटना भी सचाई है." भाजपा महासचिव अनिल जैन कहते हैं कि हर कार्यकर्ता का पूरा ब्यौरा पार्टी के पास मौजूद है और जो चुनाव लडऩे के लिए सबसे उपयुक्त होता है उसे टिकट दिया जाता है.

भाजपा नेतृत्व ने आम चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है, जिसमें बुजुर्ग नेताओं समेत सुस्त और प्रदर्शन न करने वाले मौजूदा सांसदों का टिकट कटना तय है.

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