पश्चिम बंगालः गजब का अनाज

उर्वरक लॉबी के आगे समर्पण करते हुए, पश्चिम बंगाल सरकार ऐसे धान को बढ़ावा देने में विफल रही है जिसे भिगोकर खाया जा सकता है. यह उन लोगों के लिए मुफीद है, जो ईंधन नहीं खरीद पाते

पकाने में अासान ऊंची पैदावार और कम उर्वरक से पैदा होने वाला धान कोमल
पकाने में अासान ऊंची पैदावार और कम उर्वरक से पैदा होने वाला धान कोमल

जब नरेंद्र मोदी सरकार भारत के सबसे गरीब परिवारों को एलपीजी कनेक्शन देने का प्रयास कर रही है, तब पश्चिम बंगाल में कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसे पारंपरिक अनाज को पुनर्जीवित किया है, जिसे पकाना नहीं पड़ता. पिछले दशक के दौरान फुलिया (जिला नादिया) में कृषि प्रशिक्षण संस्थान में उगाई गई—कोमलधान की एक स्वदेशी नस्ल है, इस चावल को कोई 30 मिनट भिगोने के बाद खाया जा सकता है.

संस्थान में सहायक निदेशक अनुपम पॉल, जो कोमल समेत धान की 430 अन्य देसी किस्मों को वापस लाने में मददगार रहे हैं, कहते हैं कि यह (कोमल) ज्यादा उपज वाली किस्म है जो प्रति हेक्टेयर 4 से 4.5 टन की पैदावार देती है और अतिरिक्त लाभ यह है कि इसे किसी रासायनिक उर्वरक या कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती.

भिगोए जाने के बाद इसे सामान्य चावल की तरह खाया जा सकता है और यह दही और गुड़ के साथ विशेष तौर पर स्वादिष्ट लगता है.

कृषि विभाग के अधिकारियों ने अपनी फील्ड रिपोर्ट में कहा है कि कई आदिवासी परिवार, जिन्हें सरकार से 2 रुपए प्रति किलो की दर से चावल प्राप्त होता है, वे सब्सिडी वाला अनाज बेचने के लिए मजबूर हुए हैं क्योंकि वे खाना पकाने के लिए महंगा ईंधन नहीं खरीद सकते. वे कहते हैं कि ''पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों में लोगों के लिए कोमल एक वरदान होगा.''

अपनी तमाम खूबियों के बावजूद, यह भी कि इसे पकाने की जरूरत नहीं होती, कोमल को राज्य सरकार ने किसी तरह से कभी बढ़ावा नहीं दिया. राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों ने इसके लिए 'रासायनिक उर्वरक लॉबी' को दोषी ठहराया है, जो ऐसे परंपरागत अनाजों के विरुद्ध है, जो कृत्रिम उर्वरकों के बगैर पैदा किए जा सकते हैं. एक अधिकारी बताते हैं, ''इन स्वदेशी अनाजों को जैविक खाद की जरूरत होती है.'' 

कई लोगों का मानना है कि जैविक खेती के पक्षधर कृषि मंत्री पूर्णेंदु बोस को कुर्सी से उतारने के पीछे यही लॉबी थी. बोस को 44 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में से एक लाख हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती के तहत लाने का श्रेय जाता है. कृषि विभाग से अचानक हटाए गए बोस को 6 सितंबर को अपेक्षाकृत कम महत्व वाला तकनीकी शिक्षा विभाग दोबारा सौंप दिया गया था. कोलकाता में यह चर्चा है कि बोस के राज्य के कृषि सलाहकार पी. मजूमदार के साथ गहरे मतभेद थे. मजूमदार के उर्वरक लॉबी से घनिष्ठ संबंध हैं.

वर्तमान कृषि मंत्री आशीष बनर्जी ने कोमल को बढ़ावा देने का वादा किया है. स्वदेशी नस्लों को बढ़ावा देने के प्रति राज्य सरकार की अनिच्छा किसानों और पर्यावरण दोनों को महंगी पड़ती है. गौर करें: कोमल की खेती की लागत शुरुआत में करीब 35,000 रु. प्रति हेक्टेयर होती है, लेकिन चौथे वर्ष में (जैविक खाद सूक्ष्म पोषक तत्वों को बढ़ाती है और फसल की पैदावार में वृद्धि कर देती है) यह 27,000 रु. प्रति हेक्टेयर रह जाती है. जैविक खाद का लगातार उपयोग मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है. इसकी तुलना में नई संकर धान की किस्मों को उगाने की लागत (जो 36,000 रु. से 40,000 रु. प्रति हेक्टेयर है) लगातार बढ़ती जाती है क्योंकि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से मिट्टी का पारिस्थितिकी तंत्र बर्बाद हो जाता है.

पॉल और उनके सहयोगियों का कहना है कि इस वर्ष किसानों ने 60 टन कालाभात की स्वदेशी नस्ल की खेती की है. कालाभात कैंसरप्रतिरोधी औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है और यह लौहतत्व में समृद्ध होता है. इसको अपना बाजार मिलेगा. लेकिन गरीबों के लिए वरदान कोमल जैसी किस्मों को सरकार से समर्थन की जरूरत होगी.

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