चीन के बढ़ते ताकतवर कदम
आज केवल भारत ही चीन के भूराजनैतिक असर को नहीं बढ़ा रहा, बल्कि दुनिया भर में उसके पैरों की बढ़ती छाप उसे आगे बढ़ा रही है

ठीक उसी दिन जब डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति से परदा उठाया और उसमें भारत को ''अव्वल वैश्विक ताकत और ज्यादा मजबूत रणनीतिक तथा प्रतिरक्षा भागीदार" बताया और चीन को ''प्रतिद्वंद्वी" करार दिया, चीन ने भी आहिस्ता से एक ऐलान किया.
पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के अफसरों ने 18 दिसंबर को पहली बार तस्दीक की कि चीन ''अफ्रीका, पश्चिम एशिया और दूसरे इलाकों में और ज्यादा विदेशी सैन्य चौकियां कायम करने की संभावना टटोलने की योजना बना रहा है." चीन का यह कदम जुलाई में जिबूती में उद्घाटित पीएलए के पहले विदेशी सैन्य अड्डे से आगे का कदम होगा.
पीएलए के सलाहकारों ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट को बताया कि इसका मकसद ''हिंद महासागर क्षेत्र में (चीन के) बढ़ते समुद्र-पार हितों की हिफाजत करना" है. यह ऐलान उस वक्त आया जब ट्रंप प्रशासन ने अपनी तरफ से हिंद महासागर क्षेत्र (आइओआर) और एशिया-प्रशांत में चीन के बेहद तेजी से बढ़ते असर और मौजूदगी का पुख्ता विरोध करने के लिए एक योजना का खाका पेश किया. ट्रंप की रणनीति में ''प्रतिद्वंद्वी ताकतों" के तौर पर चीन और रूस की साफ-साफ पहचान की गई. ऐसी ताकतें जो ''अमेरिकी सुरक्षा और खुशहाली की जड़ें खोदने" में मुब्तिला हैं. ट्रंप प्रशासन ने कहा कि वह ''जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ चौतरफा सहयोग बढ़ाने का जतन" करेगा और ऐसे वक्त में ''जब चीन क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, दक्षिण एशियाई देशों की अपनी संप्रभुता बनाए रखने में मदद करेगा."
रणनीति में यह बात अनकही छोड़ दी गई है कि वॉशिंगटन यह काम कैसे करेगा, खासकर तब जब ट्रंप के कार्यकाल के पहले साल में कई देश चीन के आर्थिक घेरे में और ज्यादा तेजी से गहरे खिंचते चले गए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति ''अमेरिका फर्स्ट" का राग अलापते रहे और उन्होंने अमेरिका को उस ट्रांस-पैसिफिक भागीदारी व्यापार समझौते से भी हटा लिया जो इस क्षेत्र में चीन के आर्थिक प्रभाव का मुकाबला करने में अब तक सबसे बड़ी काट का काम कर रहा था.
आर्थिक मोर्चे पर चीन अपनी वन बेल्ट, वन रोड बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के साथ ताकत और तेजी से आगे बढ़ ही रहा है. संकेत यही हैं कि जिबूती में अपने पहले समुद्र-पार सैन्य अड्डे को खोलने के छह महीने बाद चीन अपनी सुदूर चौकी को मजबूत करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है. सितंबर में पीएलए ने जिबूती रेगिस्तान में अपने इस नए अड्डे पर पहली लाइव-फायर ड्रिल को अंजाम दिया. यह कवायद अहम थी क्योंकि यह 1979 में वियतनाम युद्ध के बाद से पीएलए की पहली समुद्र-पार (संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों से अलग) लाइव-फायरिंग तैनाती थी.
यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के सीनियर पॉलिसी फेलो मैथ्यू डुशाटेल लिखते हैं कि चीन के इस बदले हुए गणित और समुद्र पार अपने पदचिन्ह फैलाने की गतिविधियों में हाल की तेजी के पीछे निर्णायक मोड़ 2015 में आया, जब लीबिया और यमन में उथल-पुथल से दसियों हजार चीनी नागरिकों को बचाने और बाहर निकालने के अभियान में पीएलए को लगाया गया.
चीनी योजनाकारों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जिबूती के बाद दो और आइओआर अड्डों पर विचार किया जा रहा है. बताया जाता है कि चीन की सेशेल्स के साथ शुरुआती बातचीत हो चुकी है, वहीं कई चीनी पर्यवेक्षक मानते हैं कि पाकिस्तान में ग्वादर स्वाभाविक जगह होगी. इसके अलावा, श्रीलंका और बांग्लादेश में चीन बंदरगाहों का निर्माण या देखभाल भी कर रहा है.
डुशाटेल कहते हैं, ये तमाम घटनाक्रम बताते हैं कि चीन की विदेश नीति जबरदस्त बदलाव से गुजर रही है और वह ''गैर-दखलअंदाजी" की अपनी पारंपरिक नीति से हटकर आहिस्ता-आहिस्ता विदेश नीति के ''सैन्यीकरण" की तरफ बढ़ रहा है. हिंदुस्तान को घेरने के इरादे से बिछाई जा रही चीनी ''मोतियों की माला"—यानी आइओआर में समुद्रतटीय सैन्य अड्डे—कई सालों से रणनीतिकारों के दिमाग में हावी रहे हैं. आज यह केवल हिंदुस्तान ही नहीं है जो चीन के गणित को हांक रहा है बल्कि दुनिया भर में उसके पैरों की बढ़ती छाप उसे और आगे बढ़ा रही है. मोतियों की गिनती बढ़ रही है और माला और ज्यादा लंबी होती जा रही है.
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