पश्चिम बंगालः शांति का दांव खेलती सरकार

सुभाष घीसिंग के चहेते रहे गुरुंग ने उनसे अलग होकर जीजेएम बनाया और अब 10 साल बाद तमांग अपने साथी गुरुंग को छोड़ रहे हैं.

सिलीगुड़ी के पास मिरिक में तृणमूल समर्थकों के साथ सामान्य जनजीवन बहाल करने की अपील करते लोग
सिलीगुड़ी के पास मिरिक में तृणमूल समर्थकों के साथ सामान्य जनजीवन बहाल करने की अपील करते लोग

पश्चिम बंगाल सरकार गोरखालैंड आंदोलन को तोडऩे के लिए अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' वाली तरकीब अपना रही है. इस आंदोलन के कारण राज्य के तीन पहाड़ी जिले दार्जिंलिंग, कलिमपोंग और कुर्सिंयांग पिछले तीन महीने से हिंसाग्रस्त हैं. पिछले हफ्ते गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के अध्यक्ष बिमल गुरुंग, जिन्होंने स्कूलों में बंगाली भाषा थोपने की कोशिश के विरोध में 9 जून को बेमियादी हड़ताल का आह्वान किया था और अभी हाल तक जीजेएम के मुख्य संयोजक बिनय तमांग करीबी साथी थे.

वे गोरखालैंड के लिए साथ धरने पर बैठे और रैलियां की थीं. पर अब वे एक-दूसरे के दुश्मन हो चुके हैं. गुरुंग का आरोप है कि तमांग उनकी गद्दी पर कब्जा करना चाहते हैं जबकि तमांग कहते हैं कि गुरुंग उन्हें जान से मारना चाहते हैं.

दोनों की इस दुश्मनी के पीछे राज्य सरकार की भूमिका है. सरकार वही कर रही है जो उसने 2007 में किया था जब गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) से निकले और उसके प्रमुख सुभाष घीसिंग के चहेते रहे गुरुंग ने अलग होकर जीजेएम बना लिया. अब दस साल बाद तमांग अपने साथी गुरुंग का साथ छोड़ रहे हैं. तमांग को आंदोलन का ज्यादा 'उदार चेहरा' माना जाता है. कलिमपोंग पुलिस स्टेशन पर एक ग्रेनेड विस्फोट के बाद 20 अगस्त को गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून (यूएपीए) के तहत आरोप दर्ज होने और लुक आउट नोटिस जारी होने के बाद से गुरुंग गायब हैं (वे शायद सिक्किम में हैं).

29 अगस्त को राज्य सरकार ने तमांग और उनके समर्थक अनिल थापा को एक मीटिंग के लिए बुलाया, जिसके बाद उन्होंने हड़ताल 12 दिन के लिए स्थगित कर दी. इसके बाद उन्हें 'गद्दार' बताकर जीजेएम ने तमांग को मुख्य संयोजक के पद से हटा दिया. जीजेएम के बड़े नेता रोशन गिरि जिन पर यूएपीए के तहत केस दर्ज है और वे खुद भी गायब हैं, कहते हैं, ''हमारे एक साथी ने दिखा दिया है कि किस तरह वे वास्तविक बैठक से पहले ही राज्य सरकार के अफसरों और मंत्रियों के साथ मेलजोल बढ़ा रहे थे.

गुरुंग और उनके समर्थक मानते हैं कि तमांग के हड़ताल स्थगित करने से आंदोलन का लक्ष्य कमजोर पड़ जाएगा. दूसरी तरफ गुरुंग का कहना है कि राज्य सरकार को गोरखालैंड के लिए अगर मजबूर करना है तो हड़ताल ही एकमात्र रास्ता है.

राज्य के गृह और पर्वतीय मामलों के विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''गुरुंग और उनके करीबियों पर यूएपीए के तहत केस दर्ज कर सरकार ने आधी लड़ाई जीत ली है. गुरुंग अब कभी भी सामने आकर समर्थकों को आंदोलित नहीं कर पाएंगे.'' यही वजह है कि तमांग उन्हें सामने आने की चुनौती दे रहे हैं.

अभी कुछ दिन पहले दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों में तमांग के पुतले जलाए गए थे. अब टीएमसी के समर्थन से तमांग गुट शांति रैलियां निकाल रहा है. एक अधिकारी कहते हैं, ''तमांग अगर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने में सफल रहते हैं तो संकेत साफ है कि एक नए नेता का उदय हो रहा है.'' गुरुंग समर्थकों को तब पाला बदलने में देर नहीं लगेगी.

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