मध्य प्रदेशः शिवराज की नई पेशकश
राज्य कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद योजना के तहत सरकार मंडी में किसी फसल की कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम होने पर एमएसपी और आदर्श मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान कर सकेगी.

मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है जहां कृषि उपज के लिए 'भावांतर योजना' शुरू की जा रही है. इससे सरकार किसानों की उपज खरीदे बिना ही उन्हें संकट से उबार सकेगी. योजना सरकार को उपज के भंडारण में अव्यवस्था और गड़बड़ी के आरोपों से बचाने में भी मददगार होगी, जैसा कि हाल ही में 8.7 लाख टन प्याज की सरकारी खरीद के मामले में हुआ था.
राज्य कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद योजना के तहत सरकार मंडी में किसी फसल की कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम होने पर एमएसपी और आदर्श मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान कर सकेगी. आदर्श मूल्य का निर्धारण मध्य प्रदेश और दो अन्य राज्यों—जहां उस फसल को पैदा किया जाता है—में दो महीने की अवधि के दौरान औसत मूल्य के आधार पर किया जाएगा. योजना में आठ फसलों को रखा जाएगा, जिनमें सोयाबीन भी शामिल है. मध्य प्रदेश सोयाबीन का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है.
नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद की बनाई यह योजना गोवा और दालों के लिए मध्य प्रदेश में प्रयोग के तौर पर आजमाई जा चुकी है. इस योजना को प्याज की खरीद में भारी अव्यवस्था के बाद शुरू किया गया है, जिसे जून में किसानों के आंदोलन के प्रतिक्रिया स्वरूप फौरी फैसले के तौर पर देखा जा रहा है. मार्कफेड की ओर से लाखों टन प्याज की खरीद और बारिश के कारण उसके सडऩे के बाद प्याज को सड़कों के किनारे फेंक दिया गया था.
इससे सरकार को अनुमानित 500 करोड़ रु. का नुक्सान हुआ था. सरकार ने किसानों से 8 रु. प्रति किलो के हिसाब से प्याज खरीदा था और पीडीएस के नेटवर्क के जरिए 2 रु. प्रति किलो की दर से बेचा था. बारिश शुरू होने के बाद तो उसे प्याज को 10 पैसे प्रति किलो के भाव से बेचना पड़ा था. एमपी राज्य नागरिक आपूर्ति निगम के एक महानिदेशक एस.के. सोनी को इंडिया टुडे टीवी चैनल के एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद गिरक्रतार कर लिया गया था. उस स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें प्याज को व्यापारियों के हाथ कौडिय़ों के दाम बेचने का सौदा करते हुए दिखाया गया था.
बदतर हाल तो यह कि करीब 25,000 टन प्याज अब भी नदारद है और मार्कफेड इसके लिए 'नमी सूखने' जैसी वजहें गिना रहा है जिसे उसका मूल विभाग यानी सहकारिता विभाग भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है. इस साल भी 2016 की तरह ही मार्कफेड की खरीद में गड़बड़ी के कारण नुक्सान हुआ है जो पिछले साल की तुलना में कहीं अधिक है. पिछले साल कुल 1.04 लाख टन प्याज का 72 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो गया था और बचा हुआ प्याज 3 रु. प्रति किलो के भाव से बेचना पड़ा था.
मार्कफेड के एमडी ज्ञानेश्वर पाटिल कहते हैं, ''प्याज की खरीद वास्तव में एक आपातकालीन स्थिति थी. यह बरसात के दौरान की गई थी और मार्कफेड के पास उसके भंडारण की कोई सुविधा नहीं थी और न ही खरीद की दक्षता थी. इस नुक्सान के लिए हम किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं. लेकिन इसके अलावा कोई अन्य गड़बड़ी पाई जाती है तो निश्चित तौर पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.''
इन आलोचनाओं के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने भावांतर योजना शुरू की है. राज्य में 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं और किसान ही मुख्यमंत्री का मुख्य जनाधार रहे हैं. जून में किसानों के आंदोलन के बाद पहले ही सरकार की चिंताएं बढ़ गई थीं. इस योजना में जल्दी खराब होने वाली उपज को शामिल नहीं किया गया है और इसी की सही कीमत न मिलने से किसान नाराज थे. इसके अलावा इस योजना में निष्प्रभावी मंडियों और व्यापारियों के कार्टेल का भी कोई समाधान नहीं है, जबकि इन्हीं के कारण किसानों को उसकी फसल का सही मूल्य नहीं मिल पाता है. कृषि विभाग के प्रधान सचिव राजेश राजोरा कहते हैं, ''हम आने वाले महीनों में मंडियों में प्रशासनिक सुधार करेंगे.''