तमिलनाडु में सत्ता संघर्ष

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री इडाप्पडी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) ने 3 सितंबर को चेन्नै के बाहर तिरुवल्लूर में एक सभा के दौरान स्वीकार किया कि उनकी सरकार को गिराने की कोशिशें की जा रही थीं.

मुखरः शशिकला समर्थक विधायक मीडिया से मुखातिब
मुखरः शशिकला समर्थक विधायक मीडिया से मुखातिब

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री इडाप्पडी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) ने 3 सितंबर को चेन्नै के बाहर तिरुवल्लूर में एक सभा के दौरान स्वीकार किया कि उनकी सरकार को गिराने की कोशिशें की जा रही थीं. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि जब तक ''पार्टी के सच्चे कार्यकर्ता उनके साथ हैं'' तब तक इस तरह की कोशिश कामयाब नहीं हो सकती. उन्होंने दुख जाहिर करते हुए कहा कि एआइएडीएमके की दिवंगत सुप्रीमो जे. जयललिता ने अपने किसी उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की थी लेकिन यह एक तरह से अच्छा ही है कि पार्टी में कोई भी नेता ''कड़ी मेहनत करके सबसे ऊपर तक पहुंचने'' की आकांक्षा कर सकता है.

सत्ताधारी एआइएडीएमके का जहाज इस समय उफनते पानी पर चल रहा है और उसे किनारे तक ले जाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी. जेल में बंद पार्टी महासचिव वी.के. शशिकला के परिवार की अब भी पार्टी पर काफी पकड़ है. उनकी अनुपस्थिति में भतीजे टी.टी.वी. दिनाकरन जिन्हें उन्होंने उप-महासचिव बनाया था) विधानसभा में एक शक्ति परीक्षण में पलानीस्वामी सरकार को गिराने के लिए विधायकों के एक गुट में समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं.

उधर, ईपीएस के साथ ही उपमुख्यमंत्री ओ.पन्नीरसेल्वम भी मन्नारगुडी कुनबे को एआइएडीएमके से बाहर करने के लिए कमर कस चुके हैं. दरअसल, 12 सितंबर को पार्टी की मीटिंग में शशिकला और उनके परिवार के भविष्य पर फैसला लिया जाएगा. इस बीच ईपीएस-ओपीएस का दोबारा संगठित होना पहले के मुकाबले कुछ कमजोर मालूम होता है. वे 'असली एआइडीएमके' होने का दावा तभी कर सकते हैं जब उन्हें पार्टी का चुनाव चिन्ह 'दो पत्तियां' मिल जाए. इस चुनाव चिन्ह को चुनाव आयोग ने ओपीएस गुट के कहने पर फ्रीज कर दिया था. कानूनी उलझन को देखते हुए इसकी संभावना कम ही है.

इस कानूनी लड़ाई में शशिकला अंतरिम महासचिव के तौर पर प्रतिवादी हैं. ओपीएस गुट की ओर से चुनाव आयोग में की गई शिकायत वापस लेने से चुनाव चिन्ह का मुद्दा निर्विरोध रह जाएगा और यह शशिकला गुट को मिल सकता है, क्योंकि वह कानूनी रूप से प्रतिवादी हैं. ईपीएस-ओपीएस गठजोड़ मन्नारगुडी कुनबे का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है और दिनाकरन की ओर से सत्ताधारी गुट में अपने 'स्लीपर सेल' को सक्रिय करने की चेतावनी भी इस गुट के लिए चिंता का विषय है.

राजनीतिक विश्लेषक एन. साथिया मूर्ति का कहना है, ''ज्यादा अच्छा यह है कि शशिकला गुट से समझौता कर लिया जाए, क्योंकि वह कोर्ट जा सकता है. अगर वे ऐसा करते हैं तो यह लंबे समय तक खिंच सकता है और चुनाव चिन्ह फ्रीज रह सकता है.'' इसके अलावा, हाल के महीनों में हठधर्मिता को देखकर एआइएडीएमके के कैडर और वोटर सक्रिय राजनीति से पीछे हट सकते हैं, जैसा कि पार्टी संस्थापक एम.जी. रामचंद्रन के निधन और पार्टी में टूट के तुरंत बाद के दिनों में तब की पीढ़ी ने किया था.

वहीं, डीएमके प्रतिद्वंद्वी एआइएडीएमके में बिखराव का इंतजार कर रही है. अगर सत्ताधारी पार्टी में स्थितियां बिगड़कर चुनाव की तरफ बढ़ती हैं तो डीएमके को इसका फायदा मिल सकता है. डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने घोषणा की है कि वे दिनाकरन गुट के साथ फिलहाल वैकल्पिक सरकार नहीं बनाएंगे.

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