"सुनो सबकी पर मानो अपने दिल की"
बाफ्टा पुरस्कार जीतने के बाद मणिपुरी फिल्म बूंग सिनेमाघरों में रिलीज हो रही. लेखक-निर्देशक लक्ष्मीप्रिया देवी कुमार को उम्मीद है कि इस फिल्म को खुले दिल से अपनाएंगे भारतीय दर्शक.

सवाल+जवाब
● आप लगभग दो दशकों से सहायक निर्देशक हैं. आपकी यह डेब्यू फिल्म कैसे बनी?
फिल्म डायरेक्ट करने की बात कभी मेरे जेहन में थी ही नहीं. मैं तो बस लिखना चाहती थी. अब चूंकि बूंग नाम के इस बच्चे की कहानी मेरे दिमाग में आई थी और मैं इसे डायरेक्ट करने के लिए किसी और को दे नहीं सकती थी. पहले भी कुछ कथासूत्र उभरे थे पर उनमें वह बात नहीं थी. कहानी सीधी दिल से निकलनी चाहिए ना!
● आपने इसकी शूटिंग मणिपुर के मोरेह में की. कैसा रहा वह अनुभव?
क्रू के लिए बंदे जुटा पाना काफी मुश्किल काम था. लोगों की रोजमर्रा की अपनी व्यस्तताएं थीं. मसलन, फुटबॉल खेलना, घूमना-फिरना, कुछेक घंटे काम करने के बाद फिर आराम. लेकिन जो लोग इस प्रोजेक्ट से जुड़े थे और इसको लेकर उत्साहित थे, वे अंत तक साथ रहे. मणिपुरी लोगों के भरपूर सहयोग से ही हम यह फिल्म शूट कर पाए.
● बहुत-से लोगों के लिए यह फिल्म मणिपुर की एक शानदार प्रतिनिधि की तरह है. आप मैतेई हैं. मुख्य बाल कलाकार कुकी समुदाय से है. आपको लगता है, यह फिल्म घावों पर थोड़ा मरहम लगा पाएगी?
उम्मीद तो यही है. हम मणिपुरी लोग 1949 से ही परेशानियों और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं. अब सोशल मीडिया के जरिए ज्यादा लोग यह जान पा रहे हैं कि हम लगातार एक संकट से गुजरते आ रहे हैं.
● आपने मणिपुरी सिनेमा को मुख्यधारा में और दुनिया के नक्शे पर लाने में अहम भूमिका निभाई है. मणिपुर की कहानियां सुनना क्या आपके लिए एक दायित्वबोध की तरह है?
इस बारे में मेरा एक सीधा-सा नियम है: सुनो सबकी पर मानो अपने दिल की. जब भी मुझे लगेगा कि मेरे पास कहने के लिए कोई किस्सा है, वह कहीं का भी हो, मैं उसे कहूंगी. मुझे नहीं लगता कि मुझे मणिपुरी सिनेमा का झंडाबरदार बनने की जरूरत है. खुद को इतनी भी गंभीरता से नहीं लेती.