''हमारी डील्स में हितों से कोई समझौता नहीं किया गया"

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इस समय सुर्खियों में छाए हुए हैं. उन्होंने एक ही हफ्ते में यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ दो बड़े व्यापार समझौते किए. भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर संयुक्त बयान के तुरंत बाद ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने उनसे बात की. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (फाइल फोटो)
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (फाइल फोटो)

क्या ईयू और अमेरिका के साथ हाल के व्यापार समझौते भारत की व्यापार नीति में बुनियादी बदलाव का संकेत हैं?
ये बताते हैं कि भारत अब दूसरों के प्रभाव से बाहर आ चुका है. आज भारत एक आत्मविश्वासी देश है. हम विकसित देशों से अपने दम-खम पर बातचीत करते हैं. आखिरकार, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (मुक्त व्यापार समझौते) भविष्य के लिए होते हैं. जब भारत 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का रोडमैप बना रहा है, तो 4 ट्रिलियन से 30 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अवसर बहुत बड़ा है और इसकी मिसाल नहीं मिलती.

इस समय सभी परिस्थितियां अनुकूल हैं. हमारे पास निर्णायक नेतृत्व है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद आगे रहते है, जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं, बड़े सुधारों के फैसले करते हैं और देश की सोच बदल रहे हैं. हमारे पास 30 साल से कम उम्र के युवाओं की ताकत है, और जब हम 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं तो अगले 30 साल तक वह ताकत हमारे साथ रहेगी. मैं इसे 30-30-30 की ताकत कहता हूं.

1.4 अरब की आकांक्षी आबादी, जो बेहतर जीवन चाहती है और बड़ी मांग पैदा करती है. हर लिहाज से भारत तेज विकास की दहलीज पर खड़ा है. जब हम अमेरिका, ईयू (यूरोपीय संघ), ब्रिटेन जैसे साझेदारों से जुड़ते हैं तो हम गुणवत्ता के सर्वोत्तम मानकों के साथ जुड़ने की तैयारी करते हैं. हम अपने युवाओं की प्रतिभा और कौशल का लाभ उठाने की तैयारी कर रहे हैं. हम महिलाओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था में ज्यादा योगदान देने के लिए तैयार कर रहे हैं. लिहाजा, इस अमृत काल में हम समावेशी विकास और स्थिरता को अपना मंत्र बना रहे हैं.

कई देशों की तरह भारत के पास पहले सुरक्षात्मक टैरिफ दीवारें थीं. अब हम अपने उद्योग की रक्षा करते हुए अपने आर्थिक दरवाजे खोलने का आत्मविश्वास कैसे हासिल कर रहे हैं?

कांग्रेस और यूपीए सरकार ने प्रधानमंत्री मनमोहन ‌सिंह के नेतृत्व में एफटीए करते समय एक बुनियादी गलती की. उन्होंने ऐसे देशों से समझौते किए जो या तो कम विकसित थे या विकासशील, और ज्यादातर हमारे प्रतिस्पर्धी थे. उन्होंने जापान और कोरिया के अलावा विकसित दुनिया से बातचीत का साहस नहीं दिखाया. और दुर्भाग्य से, उन दोनों समझौतों की शर्तें इतनी खराब थीं कि 15 साल में उन देशों में हमारे निर्यात में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई.

इसके उलट, प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले कुछ वर्षों में जो भी व्यापार समझौते किए—मॉरिशस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ओमान, यूएई, ईएफटीए ब्लॉक, ईयू और यूके के साथ—वे ऐसी अर्थव्यवस्थाओं से हैं जो भारत के विकास के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं. हम उनके निवेश को कारगर बनाने का मौका देते हैं, उनकी तकनीक और नवाचार का लाभ उठाते हैं और भारतीयों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करते हैं.

भाजपा स्वदेशी आर्थिक मॉडल की समर्थक रही है, जिसे आलोचक संरक्षणवादी मानते हैं. क्या आपकी पार्टी या संघ परिवार ने इन व्यापार समझौतों का विरोध किया?
मुझे किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी. मैं पूरे भरोसे से कहता हूं कि हमने किसी भी डील में देश के हितों से समझौता नहीं किया है. उदाहरण के तौर पर, हमने अपने डेयरी सेक्टर को किसी भी एफटीए में आयात के लिए नहीं खोला है. स्विट्जरलैंड, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ जैसे देश कभी भी डेयरी सेक्टर को शामिल किए बिना एफटीए नहीं करते.

हम पहले हैं जिन्होंने ऐसा किया, क्योंकि हमें भरोसा था कि हम उन्हें समझा पाएंगे कि हम अपने उन छोटे पशुपालकों और किसानों से समझौता नहीं कर सकते, जिनके पास सिर्फ तीन या चार पशु होते हैं और जो विकसित देशों की बड़ी संगठित डेयरी इंडस्ट्री से मुकाबला नहीं कर सकते. बातचीत में हमारा तरीका साफ और सीधा रहा है. आज देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा करते हैं कि वे उनके साथ एक निष्पक्ष समझौता करेंगे.

वे मानते हैं कि भारत एक भरोसेमंद साझेदार है जो आगे चलकर उनकी अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचाएगा. हमारी सोच साफ है कि जो मौके आसानी से मिल सकते हैं उन्हें पकड़ें, अच्छे को बेहतरीन के चक्कर में खराब न करें और जहां समान हित हों वहां आगे बढ़ें. वे हमारी और मैं उनकी संवेदनशीलताओं का सम्मान करता हूं.

आलोचक यह भी कहते हैं कि अमेरिका के साथ करार में कृषि के मामले में समझौता किया गया है. क्या यह सही है?
कृषि के मामले में बिल्कुल समझौता नहीं किया है. भारत के संदर्भ में जो कई उत्पाद संवेदनशील हैं, उन पर कोई समझौता नहीं हुआ है. यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौता है.

सोयाबीन और सेब के बारे में क्या कहना है?
हमने सोयाबीन या सोयाबीन मील को आयात के लिए नहीं खोला है. हम सोयाबीन तेल आयात करते हैं, और यह काम कांग्रेस सरकारों के समय से ही हो रहा है. हम अमेरिका और दूसरे देशों से फल भी आयात करते हैं. इससे उपभोक्ताओं को ज्यादा विकल्प मिलते हैं. जैसे उन्हें तुर्की से आने वाले सेब के मुकाबले बेहतर क्वालिटी के सेब मिल सकते हैं. इसलिए वहां रियायत देना कोई नुक्सान का सौदा नहीं है.

भारत ने अमेरिका के सभी औद्योगिक सामान पर मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) टैरिफ खत्म या कम करने पर सहमति दी है, लेकिन अमेरिका ने ऐसा नहीं किया. उसने सिर्फ रेसिप्रोकल (पारस्परिक) टैरिफ घटाए हैं. वॉशिंगटन खुद जिन्हें शर्तों वाला और वापस लिए जा सकने वाला बता रहा है, ऐसे टैरिफ के बदले भारत ने स्थायी रियायतें क्यों दीं?
दो बातें साफ कर दूं. पहली बात, हमने सभी औद्योगिक सामान पर टैरिफ शून्य नहीं किया है. कुछ मामलों में टैरिफ समय के साथ धीरे-धीरे कम होंगे. कुछ जगह हमने कोटा तय किया है.

और जहां हमें कोई संवेदनशीलता नहीं है और अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए आयात की जरूरत है, जैसे एनविडिया चिप्स, वहां हमने अनुमति दी है. यानी यह हर आइटम को देखकर, सोच-समझकर लिया गया फैसला है. दूसरी बात, रेसिप्रोकल टैरिफ वास्तविक हैं और पूरी दुनिया ने उन पर बातचीत की है. हमारी अमेरिका के साथ यह समझ बनी है कि अगर ये रेसिप्रोकल टैरिफ सबके लिए हटा दिए जाते हैं, तो हमें भी अपनी रियायतों को दोबारा तय करने का मौका मिलेगा. इसलिए यह पूरी तरह संतुलित और समझदारी भरा रिश्ता है. और मैं कहूंगा कि अमेरिकी वार्ताकार काफी निष्पक्ष रहे हैं.

भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने की मंशा जताई है. जब मौजूदा भारत-अमेरिका व्यापार करीब 212 अरब डॉलर है, तो अगले पांच साल में इसे कैसे पूरा करेंगे?
हमने बहुत सावधानी से इसका आकलन किया है. कई अमेरिकी उत्पाद दूसरे देशों के मुकाबले अपेक्षाकृत सस्ते हैं. आज भी हम दुनिया भर से करीब 300 अरब डॉलर का ऐसा सामान आयात करते हैं और इसकी जरूरत तेजी से बढ़ रही है. मसलन, आइसीटी (सूचना और संचार तकनीक) से जुड़े उत्पादों का आयात कुछ सालों में 20 प्रतिशत तक बढ़ा है. हमारा अनुमान है कि अगले पांच साल में हमें करीब 2 ट्रिलियन डॉलर का आयात करना पड़ेगा.

इसमें ऊर्जा उत्पाद जैसे कच्चा तेल और एलपीजी, कीमती धातुएं, आइसीटी उत्पाद, हाइ-टेक सेमीकंडक्टर चिप्स, कोकिंग कोल, विमान और विमान के पुर्जे शामिल हैं. जब 2 ट्रिलियन डॉलर का इतना बड़ा आयात होना ही है, तो मुझे कोई वजह नहीं दिखती कि भारतीय आयातकों के पास अमेरिका से खरीदने का विकल्प क्यों न हो. हमारा नजरिया साफ है. जो चीज हमें खरीदनी ही है, उसमें जितने ज्यादा विकल्प हों उतना बेहतर. मैं तो चाहूंगा कि वैश्विक सप्लायरों के बीच प्रतिस्पर्धा हो ताकि भारत को सबसे अच्छा सौदा मिले. इससे भारतीय उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था, दोनों को फायदा होगा और विकास को रफ्तार मिलेगी.

मोबिलिटी समझौते का क्या होगा, खासकर तब जब ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में एच-1बी वीजा पर पाबंदियां बढ़ी हैं और वे महंगे भी हो गए हैं?
देखिए, हर देश अपने नियम और कानून बना सकता है, इसमें एच-1बी वीजा पर पाबंदियां भी शामिल हैं. मुझे नहीं लगता कि इससे हमारे रिश्तों या व्यापार की संभावनाओं पर कोई असर पड़ेगा. उल्टा, यह भारत के लिए अच्छा ही होगा. आज भारत में 1,800 से ज्यादा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) हैं. कई काम ऐसे हैं जिन्हें न्यूयॉर्क या टोक्यो के दफ्तर में बैठकर करने की जरूरत नहीं है, वे भारत से ही हो सकते हैं.

तो कंपनियां लोगों को अमेरिका भेजकर वहां ऊंची सैलरी देने के बजाए भारत में ही जीसीसी खोलकर बेहतरीन प्रतिभा को यहां काम दे सकती हैं. इससे वे ज्यादा कुशल बनेंगी और लागत भी घटेगी. जब वे भारत में आकर भारतीयों को यहीं रोजगार देंगी, तो हम अपने घरों में, अपने परिवार के साथ, अपनी संस्कृति और मूल्यों के साथ रह सकेंगे. हम यहीं टैक्स देंगे, यहीं निवेश करेंगे, यहीं खर्च करेंगे और मांग पैदा करेंगे. इससे रियल एस्टेट, रेस्तरां, होटल और कई जुड़े हुए सेक्टरों को भी फायदा होगा. सबसे बड़ी बात, हमें ज्यादा विदेशी मुद्रा भी मिलेगी. हर लिहाज से यह उस मामूली रकम से बेहतर है जो कोई व्यक्ति विदेश में रहकर घर भेजता है.

एक और बड़ा मुद्दा है: अमेरिका के साथ वह समझौता, जिसके तहत रूसी तेल की खरीद रोकने के बदले अतिरिक्त 25 प्रतिशत जुर्माना हटाने की बात है. अब हम अपनी तेल जरूरतें वाजिब दाम पर कैसे पूरी करेंगे?
यह मामला विदेश मंत्रालय देखता है. हमने इसे बहुत संतुलित तरीके से संभाला है. वे समय-समय पर इस पर जानकारी देते रहे हैं. इस बारे में आप उनसे बात कर सकते हैं.

हमने गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने या कम करने पर भी सहमति दी है. क्या हम अमेरिका को इन्हें तय करने दे रहे हैं?
यह हमारे लिए फायदे का सौदा है. हम भारत को एक आधुनिक देश के रूप में देखना चाहते हैं जो दुनिया से बराबरी के आधार पर जुड़ता है. हम चाहते हैं कि 1.4 अरब भारतीय उपभोक्ताओं को भी वही उच्च गुणवत्ता मिले जो दुनिया को मिल रही है.

प्रधानमंत्री मोदी ने पहले दिन से ही जीरो इफेक्ट, जीरो डिफेक्ट की बात की है. हाल के मन की बात कार्यक्रम में भी उन्होंने कहा कि भारत को गुणवत्ता के प्रति जागरूक राष्ट्र बनना होगा. हमारा इरादा बिल्कुल साफ है कि हमें ऐसा ब्रांड इंडिया बनाना है जिसे दुनिया भर में उसके ऊंचे स्तर के सामान और सेवाओं के लिए पहचाना जाए.

इन समझौतों से आम आदमी को क्या फायदा होगा. कितनी नौकरियां बनेंगी और किन क्षेत्रों में?
भारत के लोगों को अर्थव्यवस्था के हर सेक्टर में फायदा होगा. चाहे वह लेबर आधारित सेक्टर हों जैसे टेक्सटाइल, गारमेंट, जूते, लेदर गुड्स, स्पोर्ट्सवियर, या फिर मछुआरे, किसान, कारीगर, हुनरमंद कारीगर, हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम से जुड़े लोग. ये समझौते मेक इन इंडिया को बड़ा बढ़ावा देंगे और इससे बड़े पैमाने पर नौकरियां और निवेश के मौके बनेंगे. इससे हमारे स्टार्टअप्स को भी निवेश आकर्षित करने में मदद मिलेगी और उन्हें स्थिरता और भरोसे का माहौल मिलेगा.

क्या आप बता सकते हैं कि इन व्यापार समझौतों से कितनी नौकरियों का सृजन हो सकता है?
संख्या तो लोगों और निवेशकों पर निर्भर करती है. अगर हमारे निर्यातक इस मौके को पकड़ लेते हैं तो संभावनाओं की कोई सीमा नहीं है. लाखों नौकरियां बन सकती हैं. साथ ही हमें भी अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा और उन वैश्विक मौकों को पकड़ना होगा जो प्रधानमंत्री मोदी अपनी समझदारी से भारतीय अर्थव्यवस्था को संभालते हुए खोल रहे हैं.

पिछले छह महीने में प्रधानमंत्री मोदी ने सुधारों की रक्रतार बहुत तेज कर दी है. हमारे एफटीए और अंतरराष्ट्रीय समझौते उनके सुधार और बदलाव के एजेंडा का अहम हिस्सा हैं. अगर हम सुधार नहीं करेंगे, कारोबार करना आसान नहीं बनाएंगे, आम आदमी की जिंदगी आसान नहीं करेंगे, कानूनों के बोझिल प्रावधानों को खत्म नहीं करेंगे, प्रक्रियाओं और अनुपालन का बोझ कम नहीं करेंगे, तो 2047 तक विकसित देश नहीं बन पाएंगे. यह 140 करोड़ भारतीयों का साझा संकल्प है. 2047 तक विकसित भारत बनाना किसी भी हाल में टाला नहीं जा सकता.

हम बातचीत में साफ और सीधी बात करने का तरीका अपनाते हैं. आज दुनिया के देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा करते हैं कि वे उनके साथ निष्पक्ष समझौता करेंगे और मानते हैं कि भारत एक भरोसेमंद साझेदार है.

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