"लोकसभा चुनाव लड़ने को कई पार्टियों ने फोन किया"

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर ने एक्टिंग के अपने तरीके, फिल्मों, दर्शन, दोस्तों और किसानों के लिए बनाए ट्रस्ट समेत जीवन के कई पहलुओं पर इंडिया टुडे हिंदी और लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी से खुलकर बात की. पेश है बातचीत का संपादित अंश

नाना पाटेकर, दिग्गज फिल्म अभिनेता
नाना पाटेकर, दिग्गज फिल्म अभिनेता

 राजनीति में आने और चुनाव लड़ने पर :

मुझे अपने गुस्से पर काबू करना नहीं आता. मैं किसी पार्टी में कैसे रह सकता हूं. कल को कोई बात बुरी लगी तो पार्टी अध्यक्ष के मुंह पर बोल दूंगा, ऐसा कहां चल पाएगा. लेकिन सभी पार्टियों ने बुलाया, इस बार के लोकसभा चुनाव में भी इलेक्शन लड़ने के लिए फोन आया. शरद राव ने पूछा था कि इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं क्या? क्योंकि उनको पता चला था कि किसी और पार्टी से नाम चल रहा था मेरा. मुझे भी उन्हीं से पता चला लेकिन सब अफवाहें थीं. ऐसी बातें तो चलती रहती हैं. मुझे खुशी है कि कई ऐक्टर चुनकर संसद पहुंचे हैं.

 विधु विनोद चोपड़ा के बारे में :

उसके साथ काम की बहुत-सी यादें हैं जो बहुत बकवास हैं. इसीलिए मुझे विधु बहुत पसंद नहीं है. परिंदा (1989) के टाइम उनसे इसीलिए मन खटका, क्योंकि कोई सीन है मान लो, उसके लिए ऐक्टर अपने दिमाग में तैयारी कर रहा है. वो किरदार के जोन में जाने की कोशिश कर रहा है और आप उसके कान के पास चिल्लाओगे तो फिर ऐक्टर का सुर बिगड़ जाएगा न. (ये पूछने पर कि वो कहते हैं आपसे उन्होंने गालियां सीखीं) अब उनको मुझसे यही सीखने लायक लगा तो सीखा होगा उन्होंने, मैंने तो उनसे झूठ बोलना नहीं सीखा न.

वेलकम (2007), उसके सीक्वल और अनीस बज्मी पर :

वेलकम जैसी हल्की फुल्की फिल्म मैं बार-बार नहीं कर पाऊंगा. सिनेमा जैसे माध्यम का इस्तेमाल और ज्यादा जरूरी बात कहने के लिए होना चाहिए. हमारे लिए वो जॉनर अलग था. अनीस बज्मी ने कहा कि उदय का रोल नाना आप बहुत अच्छा करोगे, तब मैंने कहा था कि तू मां कसम खाकर बोल कि अच्छा करूंगा (हंसते हैं). उसने कहा भी कि मां कसम आप अच्छा करोगे. एक चीज और कि अगर अनिल (अनिल कपूर) और मैं दोनों हैं तभी वेलकम है. उसको या मुझे निकाल दो तो नहीं बन पाएगी वेलकम. उसका सीक्वल उतना चला नहीं. वेलकम 3 के लिए मुझे ऑफर आया था लेकिन अब बस हो गया. मैं उसमें नहीं हूं और अनिल भी नहीं है.

फिल्म तिरंगा, क्रांतिवीर और राजकुमार के बारे में :

लोगों ने कहा था कि ये फिल्म (तिरंगा) कभी नहीं बनेगी क्योंकि इसमें दो सिरफिरे हैं (नाना पाटेकर और राजकुमार). लेकिन फिल्म बनी और खूब चली. राजकुमार साब के बारे में सब अफवाहें हैं कि वो गुस्सैल थे या किसी से भी कुछ भी बोलते थे. इतना सज्जन आदमी कि मैं क्या बोलूं. कभी एक गंदा शब्द उनके मुंह से नहीं सुना मैंने. कभी गुस्से में भी उन्होंने किसी से उल्टा नहीं बोला. जो उनको जानते थे वो सब उनकी इज्जत करते थे. मैं तो बाकायदा उनके पैर छूता था.

क्रांतिवीर के क्लाइमैक्स वाली बात...दरअसल सीने में दर्द की वजह से मैं अस्पताल में एडमिट था. शूटिंग की सारी तैयारियां हो चुकी थीं. डॉक्टर मना कर रहे थे. मेहुल (कुमार, क्रांतिवीर के निर्देशक) भी कह रहा था कि नुक्सान होने दो नाना, बाद में करते हैं. प्लान था कि सात दिन में क्लाइमैक्स शूट करेंगे. मैंने अगले दिन मेहुल से बोला कि सेट पर 5-7 कैमरा लगाओ और सबमें एक्स्ट्रा रील रखना. फांसी के तख्ते से मैंने जो भाषण दिया, कहीं कुछ लिखा (डायलॉग) नहीं था. मैं गया और उस वक्त जो सूझा, बोल गया. सात दिन का काम ढाई घंटे में खत्म कर दिया.
 
► संजय लीला भंसाली और स्मिता पाटील के बारे में :

खामोशी (1996) के बाद संजय ने मेरे साथ फिर कभी काम नहीं किया. उस फिल्म के एक सीन में हम एक दूसरे से सहमत नहीं थे. मैं उनसे एक ऐक्शन की वजह पूछ रहा था और जो वजह वे बता रहे थे वो मुझे ठीक नहीं लगी. हमने फिर कभी (साथ) काम किया नहीं. मेरा मानना है कि लोगों के रिश्ते सिर्फ काम की वजह से नहीं होने चाहिए. फिल्में तो आती-जाती रहती हैं. रिश्ते बने रहने चाहिए.

स्मिता से मेरी पुरानी पहचान थी. वो टीवी पर न्यूज रीडर (हुआ करती) थी. उसका स्क्रीन प्रेजेंस कमाल का था. कैमरे के सामने आते ही वो बिल्कुल बदल जाती थी. एक दिन मेरे मना करने के बावजूद वो मुझे जबरदस्ती बी.आर. चोपड़ा के यहां ले गई. उनके बेटे रवि तब आज की आवाज (1984) डायरेक्ट कर रहे थे. उन्होंने मुझे उसमें लीड विलेन के गुर्गे का रोल ऑफर किया. मैं भड़क गया. मैंने कहा कि आपने देखा भी है मेरा काम? उसके बाद स्मिता के कहने पर उनसे दोबारा मिला तो उन्होंने लीड विलेन का रोल करने को कहा. मैंने कहा, एक शर्त है 'डायलॉग मैं खुद लिखूंगा'. फिर वो किरदार किया था मैंने.

प्रहार, मिलिट्री ट्रेनिंग और करगिल युद्ध में शिरकत करने पर :

मैंने मराठा लाइट इन्फेंट्री के साथ तीन साल तक ट्रेनिंग की. 40 की उम्र में कमांडो कोर्स किया. प्रहार बनाने में मराठा लाइट इन्फेंट्री के ही सुनील देशपांडे ने बहुत मदद की थी. जनरल वी.के सिंह तब कमांडो विंग में डिप्टी थे. इन सब लोगों की वजह से फिल्म इतनी ऑथेंटिक बनी. अब भी कई बच्चे मिलते हैं जो कहते हैं कि यह फिल्म देखकर ही वे आर्मी में आए. मैं खुद भी आर्मी में जाना चाहता था. तो इसी बहाने यह इच्छा भी थोड़ी-सी पूरी हुई. करगिल युद्ध के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस (तत्कालीन रक्षा मंत्री) साहब से मैंने कहा कि हम (मोर्चे पर) जाना चाहते हैं. शुरू में मना करने के बाद उन्होंने इजाजत दे दी.

पुरस्कारों की अहमियत पर :

मुझे अवॉर्ड से कुछ फर्क नहीं पड़ता. वो सिर्फ एक थपकी भर होते हैं. क्रांतिवीर के लिए मुझे दिलीप साहब के हाथ से बेस्ट ऐक्टर का अवार्ड मिला था. मुझे उन्होंने घर बुलाया. बारिश हो रही थी. मैं पहुंचा तो भीगा हुआ था. दिलीप साहब ने देखा तो मुझे बिठाकर अपने हाथों से पहले तौलिए से मेरा सिर पोंछा और अपना कुर्ता लाकर दिया. इससे बड़ा अवार्ड कोई क्या दे सकता है? सत्यजीत रे साहब की डायरी पब्लिश हुई तो उसमें लिखा था कि 'आइ वांट टु वर्क विद नाना पाटेकर' (मैं नाना पाटेकर के साथ काम करना चाहता हूं) बताओ! है कोई इससे बड़ा अवॉर्ड?

बाल ठाकरे से दोस्ती पर :

उनसे रिश्ता ही कुछ अलग था. बहुत प्यार करते थे मुझसे. एकदम बच्चे जैसा मानते थे. उनके आखिर के दिनों तक भी यह रिश्ता ऐसे ही रहा. हमारे एक डॉक्टर थे अमित महादेव. वे उनका इलाज कर रहे थे. आजतक उनके बारे में मैंने कुछ बोला नहीं, इसलिए ज्यादा नहीं कहूंगा. कुछ फोटो हैं हमारे. आप देखोगे तो हैरान रह जाओगे. मैंने कभी किसी को दिखाईं नहीं वे तस्वीरें. हालांकि वह एल्बम उन्होंने खुद मेरे घर भेजा था. उन्होंने बहुत इज्जत दी मुझे. एक बार बंबई में एक बड़ा प्लॉट मुझे देने लगे. मैंने मना कर दिया, मैंने कहा, मेरे पास घर है अपना.

सांप्रदायिकता पर :

1993 के मुंबई बम धमाकों पर हमने क्रांतिवीर (1994) बनाई. लोगों से बात करने के लिए मैं जगह-जगह घूमा. अकेला घूमता था लेकिन मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई. सबने प्यार से बुलाया, खाना खिलाया. मुझे आज तक समझ नहीं आया कि हिंदू मुसलमान में फर्क क्या है? पहले देश होना चाहिए. मेरी बहन ने अब्बास से शादी की. मैंने कहा मेरी बहन तो कहीं नहीं गई बल्कि हमें अब्बास मिल गया.
  
किसान, अपने एनजीओ फाउंडेशन और अगली फिल्म जर्नी के बारे में :

(देश में) किसान तो बस अपना हक मांग रहा है. ज्यादा नहीं मांग रहा. हर चीज के दाम इतने बढ़ गए लेकिन किसान की फसल का क्या, वो किससे मांगने जाएगा. साठ प्रतिशत (लोग) किसान हैं इस देश में. सोचिए. उसकी सारी धन दौलत खेत में खुले आसमान के नीचे रहती है. जानवर, मौसम सबसे बचाकर आपके लिए अनाज लाता है किसान.

स्वामीनाथन आयोग के हिसाब से उसको उसकी कीमत दे दो और क्या मांग रहा है वो आपसे. मैंने एक नई गाड़ी खरीदने के लिए डेढ़ करोड़ रुपए रखे थे. एक शाम टीवी पर आत्महत्या कर चुके एक किसान के परिवार का इंटरव्यू देखा. उसी वक्त फैसला किया कि गाड़ी खरीदने का पैसा ऐसे किसान परिवारों को देना है. सोचा 15,000-15,000 रु. की रकम एक हजार किसानों को बांट दी जाए. बांट भी दी. लेकिन समस्या ऐसे खत्म नहीं होती दिखी तो 'नाम फाउंडेशन'  की शुरुआत की. महाराष्ट्र से शुरू हुई ये संस्था आज पूरे भारत के लिए काम कर रही है.

मैंने अभी एक फिल्म की है जर्नी. इसके डायरेक्टर अनिल शर्मा ने कमाल का काम किया है. आप फिल्म देखेंगे तो समझेंगे. अनिल के साथ इस फिल्म की राइटिंग के टाइम से ही जुड़ गया था. किसी सीन को देखने और दिखाने का अनिल का नजरिया मुझे पसंद है. इस फिल्म में एक गाना भी गाया है. उम्मीद है लोगों को यह कोशिश अच्छी लगेगी.

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