''मोदी 3.0 में टेक्नोलॉजी से जुड़े बदलाव हमारी बड़ी प्राथमिकता होंगे''
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और मैनेजिंग एडिटर एम.जी. अरुण के साथ बातचीत

आम चुनाव 2024 के दौर में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण नॉर्थ ब्लॉक के लकदक परिसर से निकलकर चुनावी मैदान की धूल-गर्मी झेल रही हैं. चुनाव प्रचार की अपनी भारी व्यस्तता के बीच उन्होंने ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और मैनेजिंग एडिटर एम.जी. अरुण के साथ खास बातचीत में बेबाकी से जवाब दिए. उन्होंने बेरोजगारी और महंगाई जैसे असहज मसलों सहित अर्थव्यवस्था से जुड़े सभी मुद्दों पर रोशनी डाली और यह भी बताया कि अगर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आती है तो हम मोदी 3.0 से क्या उम्मीद कर सकते हैं. बातचीत के संपादित अंश:
प्र. मोदीनॉमिक्स के 10 साल हो गए हैं. मोदी सरकार की नीतियों के चार मुख्य स्तंभ क्या रहे हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था न सिर्फ महामारी के बाद पटरी पर लौटी, बल्कि 7.6 फीसद की मजबूत वृद्धि दर्ज की?
मेरे दिमाग में जो चार बातें फौरन आती हैं, उनमें एक, भारत के बारे में भ्रामक धारणा को दूर करने के लिए किया गया प्रयास है कि आप कुछ भी करने के काबिल नहीं, कि आप बढ़ नहीं सकते, कि आप भ्रष्ट हैं, कि आपकी लालफीताशाही हमेशा कायम रहेगी...दूसरा, यह तय करना कि नीतियां लोगों और उनकी जरूरतों के मुताबिक हों—इतनी रैडिकल न हों कि खारिज कर दी जाएं, लेकिन भारत को आगे ले जाएं. नीतियां स्थिर हों जो लोगों को हमारे देश की ओर आकर्षित करें, अपने देश के लोगों को यकीन दिलाएं कि सरकारें काम कर सकती हैं और न सिर्फ गरीबों और जरूरतमंदों, बल्कि व्यवस्था में सुधार के लिए भी. तीसरा, यह तय करना रहा कि उन क्षेत्रों की पहचान की जाए, जिनमें नीतियां टिकाऊ विकास के साथ 21वीं सदी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनें. और चौथा, उन क्षेत्रों की पहचान करें जिनमें भारत विश्व स्तर पर नेतृत्व कर सकता है, उनमें निवेश करें और लोगों को उस ओर बढ़ने में मदद मुहैया करें और देश को फायदा पहुंचाएं.
• आपने सुधारों में संतुलन बनाए रखने की बात की, मगर 2016 में नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोर दिया. उसके अमल से क्या सबक मिले?
तथ्य यह है कि लोगों ने उसे बड़ी नोटों की वजह से काले धन को दूर करने के बड़े कदम के रूप में स्वीकार किया. लोगों ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के इरादे एकदम साफ हैं; हां, कठिनाइयां हैं, हम उनका मुकाबला करेंगे. इसका एक नतीजा यह हुआ कि लोग उसकी और कोविड की वजह से डिजिटल लेनदेन ज्यादा करने लगे. और आप कह रहे हैं कि भारत ने अपने लिए नेतृत्व की भूमिका तैयार की, यह सिर्फ नेताओं के मामले में नहीं, (बल्कि) आम लोगों के लिए भी, जिस तरह से उन्होंने इसे अपनाया है. विदेशों से आने वाले कुछ नेता यह देख बेहद प्रभावित होते हैं कि नारियल पानीवाला, ठेलेवाला, यहां तक कि दूर-दराज के गांवों में भी लोग कितनी आसानी से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
• फिर भी कुछ लोग कहते हैं कि नकदी पूरी मात्रा में वापस आ गई है और इसलिए नोटबंदी बेमानी साबित हुई, यह नाकामी है.
उन्हें क्या उम्मीद थी? क्या प्रधानमंत्री के नोटबंदी पर अमल से पहले उनके पास इसका कोई ब्लूप्रिंट था कि नोटबंदी क्या है? क्या प्रधानमंत्री, खासकर सभी उच्च मूल्य वाले नोट की बंदी जैसे बड़े कदम के पहले सभी दलों के साथ बैठ कर पूछते, ''देखो, आप लोग मुझे मुहूर्त बताओ, मैं ऐलान करूंगा और फिर हम यह करेंगे?'' उस समय उनकी दलील क्या थी? आप काले धन के जखीरे पर हमला करने जा रहे थे, आप उसके प्रवाह के बारे में बात नहीं कर रहे थे. ये ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो 2014 में आते ही जिस पहली फाइल पर हस्ताक्षर करते हैं, वह काले धन के मामलों के लिए विशेष जांच दल का गठन है. उसके बाद, एक के बाद एक, कानून यह तय करने के लिए लाए गए, ताकि विदेशों में पैसा जमा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए. उसके बाद, आप बैंकों में कुछ खास केवाईसी (अपने ग्राहक को जानें) प्रथाएं लागू करते हैं, बैंकों का संचालन पेशेवर तरीके से करते हैं, देखते हैं कि पैसा कहां जा रहा है, किसका पैसा आ रहा है. राजनैतिक रूप से संवेदनशील व्यक्तियों या (जो लोग) एफएटीएफ (वित्तीय कार्रवाई कार्यबल) कानून का उल्लंघन करने वालों के मद में यही उम्मीद की जाती है कि जब भी एक खाते से बड़ी मात्रा में नकदी स्थानांतरित की जाती है, तो उसे रोक दिया जाए. ये सभी कदम प्रधानमंत्री मोदी ने उठाए हैं.
• और क्या काले धन की मात्रा कम हो गई है?
कम से कम आप यह सब ट्रैक करने और उसके खिलाफ कार्रवाई करने के काबिल हैं. और देखिए कि कैसे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) या केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) घरों, शौचालयों या फार्महाउसों में छुपा कर रखे रुपए-पैसों के ढेर पकड़ रही है. क्या यह काले धन को खत्म करने की दिशा में कोशिश नहीं है? जब हम ऐसा करते हैं, तो वे कहते हैं, ''हे भगवान, आपने इन एजेंसियों को पीछे लगा दिया है.'' और जब हम ऐसा नहीं करते, तो वे पूछते हैं, ''आपने इसके बारे में क्या किया है?''
• इस चुनाव में एक बड़ा मुद्दा नौकरियों और रोजगार का उभर आया है. इंडिया टुडे सहित तमाम जनमत सर्वेक्षण बता रहे हैं कि बेरोजगारी आज देश में नंबर एक मुद्दा है. आपका क्या कहना है?
इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि नौकरियों या रोजगार के बारे में सही बात करने के लिए आपको अधिक डेटा की जरूरत है. हमारे देश में ये आंकड़े नहीं हैं, और मैं ऐसा बचने के लिए नहीं कह रही हूं. मैं मानती हूं कि औपचारिक क्षेत्र और समान रूप से या उससे बढ़कर अनौपचारिक क्षेत्र में नौकरियों के लिए अच्छे और भरोसेमंद दोनों आंकड़ों की जरूरत है. हमें औपचारिक क्षेत्र का कुछ डेटा मिलता है तो हम पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक निष्कर्ष पर पहुंचने लगते हैं, जो सही नहीं है. अनौपचारिक क्षेत्र में आज काफी उछाल दिखा है. अब आइए इन सवालों का जवाब देते हैं. क्या स्टार्ट-अप किसी तन्हाई में काम करते हैं? मुझे लगता है कि आखिरी आंकड़ा 97,000 स्टार्ट-अप का था, जो उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआइआइटी) में पंजीकृत हुए थे. यानी 2016 के बाद से जब (स्टार्ट-अप इंडिया योजना) लॉन्च की गई. क्या आपको लगता है कि ये नौकरियां पैदा नहीं करते? क्या इन कंपनियों को इकलौते आदमी चलाते हैं? दूसरे, नए उभरते क्षेत्रों—अक्षय ऊर्जा, ग्रीन अमोनिया, खासकर सौर ऊर्जा—में हम कितनी बड़ी सौर ऊर्जा कंपनियां देख रहे हैं? क्या आपको लगता है कि ये एक व्यक्ति के जरिए चलाई जाती हैं? फिर पीएम स्वनिधि और पीएम मुद्रा के जरिए ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जिन्होंने बिना किसी गारंटी के ऋण लिया है. मैं न्याय की बात करने वाली कांग्रेस से पूछना चाहती हूं कि जब छोटे लोगों को कर्ज दिया जाता है तो आप उसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं और इसकी आलोचना करते हैं कि मोदी सिर्फ अपने दोस्तों को कर्ज दे रहे हैं. तो क्या ये अंबानी और अदाणी हैं? साथ ही, सरकारी रोजगार मेले के तहत नवंबर 2022 से अक्तूबर 2023 तक पिछले 12 महीनों में खाली पड़ी 10 लाख नौकरियां भरी गई हैं.
• स्व-रोजगार की यह कहकर आलोचना की जा रही है कि यह औपचारिक नौकरियों के मुकाबले काफी हद तक प्रच्छन्न रोजगार या अधूरा रोजगार है.
जब लोग बैंक से पैसा ले रहे हैं और अपना खुद का काम-धंधा कर रहे हैं तो यह अधूरे रोजगार का तर्क काम नहीं कर सकता. जब कृषि पर निर्भर लोगों की अधिक संख्या के बारे में बात की जाती थी तो अधूरा रोजगार अर्थशास्त्र में एक कारक के रूप में महत्वपूर्ण था. पिछले दशक में कृषि से दूसरे हुनर के पेशों की ओर लोगों का जाना साफ-साफ दिखा है. इसीलिए जब ई-श्रम पोर्टल लॉन्च किया गया, तो खुद मंत्रालय को बहुत आश्चर्य हुआ, उसमें 200 से अधिक पेशे पंजीकृत थे, जिनमें लोग जुड़े हुए थे, और जिन पर अब राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद काम कर रही है. इसलिए, जब स्व-रोजगार आता है तो अधूरा रोजगार कोई मुद्दा नहीं है. आज की अर्थव्यवस्था लोगों को अपना काम करने की ओर ले जा रही है, यह सब उद्यमशील बनने के बारे में है.
• दूसरा बड़ा चुनावी मुद्दा महंगाई है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि महंगाई नियंत्रण में है लेकिन जब आम आदमी सामान खरीदने निकलता है तो उसे कीमतें ऊंची लगती हैं. क्या महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए और कुछ किया जा सकता है?
महंगाई पर मेरा जवाब यह है कि बाजार में आने वाली और गरीब आदमी की थाली तक पहुंचने वाली वस्तुओं की प्रकृति के कारण कोई भी कोशिश हमेशा नाकाफी होगी. इसका मतलब यह नहीं है कि मैं उससे (समस्या से) हाथ धो रही हूं. बिल्कुल नहीं. चाहे मामला प्याज, आलू, खाद्य तेल का हो, या यह तय करना हो कि सब्जियां समय पर पहुंचें, या दालों की पैदावार कम होती है, तो उन्हें समय पर और थोक में आयात करना हो, सब पर ध्यान दिया जाता है. कम से कम, 5-6 साल पहले दिए गए प्रोत्साहन के कारण कई किसान दलहन ज्यादा उगाने लगे. लेकिन उसके बाद खरीद या कीमत संबंधी मुद्दों के कारण दिलचस्पी घट गई. इसमें राज्य सरकारें भी भूमिका निभाती हैं. अब एक सीमा के बाद आयातित महंगाई भी आपका बोझ बढ़ा देती है. खाद्य तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव हो रहा है. क्रूड ऑयल में तो बहुत ही ज्यादा. कोविड के बाद यूरिया की कीमतें 3,000 रुपए प्रति बोरी तक पहुंच गईं. किसान जो बोरी 298 रुपए में खरीदता है, वह पूरी तरह से आयातित होती है. मुझे इसे प्रधानमंत्री के सामने रखना था और उनका कहना एकदम साफ था. उन्होंने कहा कि आपको आयात करना होगा. आप कितनी भी कीमत पर आयात करें, इसकी कमी न हो और इसका बोझ हमारी सरकार उठाएगी. यह स्पष्ट निर्देश था. इसलिए हम उस इनपुट लागत का प्रबंधन कर रहे हैं और यह भी तय कर रहे हैं कि ईंधन की कीमतें भी एक स्तर पर कायम रखी जाएं, जो एक बड़ा घटक है. प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के कारण, हमें प्रतिबंधों का डर नहीं था और यूक्रेन युद्ध के बाद भी हम रियायती दर पर रूस से कच्चा तेल आयात कर सकते थे. हमने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखा और पीछे नहीं हटे.
• रूस से तेल आयात करने के फायदे अब कुछ अर्थों में घट रहे हैं, और पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात हैं. उनका असर क्या होगा?
मुझे लगता है कि तीन युद्धों के साथ-साथ लाल सागर में भी एक बड़ा अड़ंगा है. खुले समुद्र में माल ढुलाई सहित भारी अस्थिरता होने वाली है. भारत समेत सभी देशों को इन अनिश्चितताओं के लिए तैयार रहना है. क्रूड की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल (18 और 19 अप्रैल को) को पार कर गई हैं. कोविड, कई युद्धों, खुले समुद्र में रुकावटों, चीन-अमेरिका समस्या के बावजूद हम अब भी महंगाई पर काबू रखे हुए हैं और इसे सीमा के भीतर रख रहे हैं.
• विशेषज्ञ अर्थव्यवस्था में अंग्रेजी के अक्षर के-आकार की वृद्धि की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसमें अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, और गरीब और गरीब. क्या यह चिंता का विषय नहीं होना चाहिए?
जरा जीएसटी संग्रह पर गौर कीजिए. जीएसटी अभी अपने अनुकूल ग्रेड ढांचे में नहीं है. हमें दरों को तर्कसंगत बनाने पर कुछ काम करना होगा. हमें प्रत्यक्ष कर संग्रह पर भी नजर रखनी होगी. एक समय था जब लोग कहते थे कि जीएसटी प्रत्यक्ष कर से ज्यादा कमाई करा रही है. यह सच नहीं है. प्रत्यक्ष कराधान अब बहुत अधिक योगदान दे रहा है और ऐसा ही होना चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक दृष्टि यह है कि हर कोई अपने लिए धन पैदा करे. जैसे कि तमिल में एक कहावत है—विरलुक्वेथा वीक्कम—उंगली का आकार बताएगा कि उसमें सूजन कितनी है. इसी तरह हर कोई अपने आकार के अनुसार कमाएगा. अगर लोग अपने दम पर कमाने में सक्षम हैं, अपने दम पर बचत कर सकते हैं, उनके पास अपनी खुद की कुछ संपत्ति है, तो यह उन्हें अपने पायदान से ऊपर ले जाता है. यह उस प्रकार का लक्षित दृष्टिकोण है जो असमानता को दूर करने में मदद कर सकता है और जिसे बहुआयामी गरीबी को देखने वाले लोगों से भी मान्यता मिली है. लगभग 25 करोड़ लोगों को नितांत गरीबी से बाहर निकाला गया है. गरीबी हटाओ ने 50 साल में ऐसा नहीं किया.
• कांग्रेस तो सहमत नहीं है.
गैर-बराबरी ऐसी बहस है जो कांग्रेस को बहुत पसंद है क्योंकि वे संपदा निर्माण के विरोधी हैं. क्या आपको लगता है कि एक लाख रुपए देने से जैसा कि कांग्रेस ने वादा किया है, किसी व्यक्ति की चिकित्सा, शिक्षा, मकान या उस मकान में पीने के पानी या रसोई गैस हासिल करने की जरूरतें पूरी होंगी. इससे कांग्रेस की मानसिकता साफ पता चलती है. गरीबी पर पैसा फेंको और गरीबी चली जाएगी. इसीलिए वे हमेशा यह बात कहते हैं, ''मेरे पास जादुई छड़ी है जिससे मैं गरीबी दूर कर सकता हूं.'' आपको अपने बचपन में भी अपनी दादी मां को बताना चाहिए था कि यह जादुई छड़ी है, इंदिराम्मा, आपको इसका इस्तेमाल गरीबी दूर करने के लिए करना चाहिए! यह इस बात का भ्रम पैदा करने का बहुत गैर-जिम्मेदार तरीका है कि समस्या कितनी सीधी-सादी है.
• निजी निवेश के मामले में क्या आप निराश हैं कि कॉर्पोरेट टैक्स घटाने सहित सरकार के बहुतेरे कदमों के बावजूद यह सुस्त ही है? क्या कंपनियों ने जो मुनाफा कमाया, वह अर्थव्यवस्था को लौटाया नहीं?
उन्होंने अर्थव्यवस्था को लौटाया या नहीं, इस पर मुझे लगता है कि यह उन्होंने अपने शेयरधारकों को बेहतर लाभांश देने की शक्ल में किया है. ज्यादातर निजी मिल्कियत वाली कंपनियां नहीं हैं. उनमें छोटे निवेशक धन लगाते हैं, जो बैठकर उस सुनहरे दिन का इंतजार कर रहे हैं जब उन्हें वह धन मिलेगा. इसलिए लाभांश निजी और छोटे निवेशकों के पास भी गया है. दूसरे, उन्होंने टैक्स चुकाया है. उन्होंने बैंकों का भी धन लौटाया. इसीलिए आपके बैंकों की सेहत बहाल हुई. ऐसा नहीं कि उन्होंने इसमें ज्यादा नहीं किया. मगर मैं यह भी चाहूंगी कि हमारा ध्यान उन निवेशों पर जाए जो नए इलाके में हो रहे हैं, जो इलेक्ट्रिक वाहनों में निवेश कर रहे हैं, पवन और सौर पार्क लगा रहे हैं. फिर, आज के भारत में, चाहे सरकारी बॉन्ड हों या व्यावसायिक उधारियां, लोग भारत में ऐसे बाजार ढूंढते हैं जहां धन मौजूद हो और जहां से कोई भी उधार ले सके. जिसे 'क्राउडिंग इन' (सरकारी खर्च से निजी निवेश का बढ़ना) कहा जाता है, वह वास्तव में अब हो रहा है. निजी धन बाजारों में आ रहा है. कंपनियां इससे उधार ले पा रही हैं. बाजार से सरकारी उधारियों ने उन्हें बाहर नहीं निकाला है.
• तो जो निजी निवेश आ रहा है, उससे आप संतुष्ट हैं?
मैं चाहूंगी कि यह और ज्यादा आए. नए-नए इलाके हैं. भारत में अक्षय ऊर्जा, एपीआई, मेडिसिन, विशाल जेनरिक ड्रग मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार हो रहा है. देखिए कि एपीआई या एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट (सक्रिया दवा घटक) किस तरह भारत में वापस आ रहे हैं. कम से कम 30 साल पहले भारत एपीआई में अगुआ था. धीरे-धीरे हम चीन की प्रीडेटरी प्राइसिंग से हार गए. आज सरकार की नीति ने इसे कंपनियों के लिए आकर्षक बनाया है कि वे आएं और भारत में एपीआई उत्पादन की इकाइयां स्थापित करें. वे बहुत ज्यादा निवेश करने वाली इकाइयां हैं क्योंकि एपीआई के उत्पादन में ढेरों ऐसी प्रक्रियाएं शामिल हैं जिनसे प्रदूषण हो सकता है. उस प्रदूषण से निबटने के लिए उन्हें प्रदूषण उपचार संयंत्रों वगैरह में निवेश करना पड़ता है. सरकार एपीआई इकाइयां नहीं लगा रही है, निजी क्षेत्र उनकी स्थापना कर रहा है.
• एयर इंडिया की बिक्री तो देखने को मिली मगर विनिवेश के कुछ दूसरे ऐलान लंबित हैं. इसकी क्या वजह है और अगर आपकी सरकार फिर चुनी गई तो क्या उस दिशा में आगे बढ़ा जाएगा?
कैबिनेट पहले ही उन मामलों की सूची सौंप चुकी है, जिनमें विनिवेश को मंजूरी दी गई है. कैबिनेट से जिसकी मंजूरी मिल चुकी है, उसका विनिवेश हमने अगर पूरा नहीं किया है तो ऐसा नहीं है कि हमने उसे छोड़ दिया है. ऐसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का मूल्यांकन कई गुना बढ़ गया है. दरअसल, वैल्युएशन में सबसे कम बढ़ोतरी 150 फीसद की है. कुछ का मूल्यांकन तो 1,000 गुना तक बढ़ गया है. हम उनमें विनिवेश को लेकर गंभीर हैं और ऐसा करने के लिए सही समय ढूंढेंगे.
• विनिवेश खासा उत्तेजक राजनैतिक मुद्दा भी है. क्या आप निजीकरण की सूची वाली कंपनियों की ट्रेड यूनियनों के विरोध से चिंतित हैं?
लगातार वही दलीलें आगे रखना अच्छा नहीं है. एयर इंडिया के मामले में, ट्रेड यूनियनों के साथ अंतिम समय तक बातचीत चलती रही. मुझे बताइए कि निजी क्षेत्र को सौंपने के बाद क्या किसी को नौकरी से हटाया गया? इसके बदले उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है. और जो कोई छोड़ना चाहता था, उसे विदाई में इतना कुछ मिला, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होगी. इसलिए, जब हम विनिवेश कर रहे हैं, तो हम वहां काम करने वाले लोगों की जरूरतों के प्रति लापरवाह या बेफिक्र नहीं हैं. आज ट्रेड यूनियनें बहुत व्यावहारिक हैं. वे जानती हैं कि उनका क्या काम है. वे चाहती हैं कि कामकाज चलता रहे और कंपनी मुनाफा कमाती रहे. वे चाहती हैं कि ये संस्थान काम करें. वे उन्हें बंद होते नहीं देखना चाहतीं. इसलिए, हमारा विनिवेश उन्हें बंद करने के लिए नहीं है. वे उन्हें विकसित फर्मों के रूप में बिक्री के पक्ष में हैं और उनकी नौकरियां कायम रहेंगी.
• एसेट मॉनिटाइजेशन के बारे में क्या चल रहा है? ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां बात आगे नहीं बढ़ी.
सड़कों के मामले में, आरईआईटी (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट) और आईएनवीआईटी (बुनियादी ढांचा निवेश ट्रस्ट) जैसे निवेश के दो नए तरीके हैं जो उस क्षेत्र में जान फूंकने में कामयाब साबित हुए हैं. आज, रियल एस्टेट अच्छा प्रदर्शन कर रहा है क्योंकि मांग बढ़ी है और बकाया भी पूरा हो रहा है. आज रियल एस्टेट क्षेत्र में हम राज्यों के साथ मिलकर काम करते हैं और राज्य सरकारों ने भी पंजीकरण स्टांप शुल्क में आसानी से बदलाव किया है. खासकर महाराष्ट्र ने शानदार काम किया है, जिसकी वजह से सभी बकाया खाता साफ-सुथरा हो गया है.
• क्या दूसरे क्षेत्रों के एसेट मॉनिटाइजेशन के फैसले तेजी से किए जाएंगे?
हमें उस ओर आगे बढ़ना होगा, इसमें कोई संदेह नहीं. कैबिनेट के फैसले पर मोलतोल या विवाद नहीं किया जा सकता. लेकिन ऐसा करने का सही मौका कब और क्या है, सवाल यह है.
• मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी औसतन 15 फीसद ही बनी हुई है. क्या हमें नौकरियों में इजाफे के लिए इसे कम से कम 20 फीसद तक बढ़ाने की जरूरत नहीं है?
मैं कोई संख्या तय नहीं कर रही हूं. मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाना होगा. यह कौन-सा मॉडल होगा, यह दीगर बात है. कुछ लोग कहेंगे, ''चीन की नकल करो.'' कुछ कहेंगे कि ऐसा मत करो. भारत को अपनी खपत वाली कई चीजों पर आत्मनिर्भर बनना होगा, जिनका उत्पादन करने में देश सक्षम है. हमें उन चीजों को प्राथमिकता देने की जरूरत है जिनका हम फिलहाल आयात कर रहे हैं, लेकिन अंतत: उतना भर ही नहीं होना चाहिए. दूसरी चीजों के मामले में भी विस्तार किया जाना चाहिए. इसमें शक नहीं कि आपके पास कुछ मैन्युफैक्चरिंग आधार होना चाहिए.
• एमएसएमई (लघु, छोटे और मंझोले उद्यम) क्षेत्र विकास का एक प्रमुख इंजन है. उसके लिए और क्या किया जा सकता है?
मैं यह कतई नहीं कहना चाहती कि हमने बहुत कुछ किया है. लेकिन हमने एमएसएमई के लिए वाकई बहुत कुछ किया है, उनकी परिभाषा बदल दी है, उन्हें 59 मिनट के भीतर कर्ज मुहैया कराया है. उन्हें बस पंजीकरण कराना होगा और कहना होगा कि इतनी रकम चाहिए, और 59वें मिनट में मंजूरी मिल जाती है. उसके बाद वे हमेशा के लिए तमाम लाभ उठा सकते हैं. एमएसएमई को सीधे पैसा मुहैया कराने के लिए सिडबी (भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक) को अधिक से अधिक धन दिया गया है. मैंने सिडबी के साथ बैठक की और कहा कि इस देश में एमएसएमई के लगभग 300 क्लस्टर हैं, अधिकांश में सिडबी की मौके पर मौजूदगी होनी चाहिए. हमने उससे हर क्लस्टर में शाखाएं खोलने को कहा है और जहां वे दूरी या किसी दूसरी वजह से शाखाएं नहीं खोल सकते हैं, वे वहां का काम ऑनलाइन करते हैं. इसके अलावा, 45 दिन में भुगतान का मामला है. एमएसएमई वाले कहते हैं कि कोई भी उन्हें 45 दिनों के भीतर (बकाया) भुगतान नहीं कर रहा है. यह 2008 या 2006 से एमएसएमई कानून है. कोई भी उसका पालन नहीं कर रहा था. हमने यह तय किया कि भुगतान 45 दिनों के भीतर किया जाए ताकि उनका पैसा न फंसे. एमएसएमई के साथ हम बैठकें करके उनकी बात सुन रहे हैं और उनके सुझावों को आगे बढ़ा रहे हैं. हम ऐसा करना जारी रखेंगे.
• अब मोदी 3.0 की बात करते हैं. अगर आपकी पार्टी तीसरी बार सत्ता में आती है तो किन बातों की उम्मीद की जा सकती है?
इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर जारी रहेगा. जो इलाके अभी भी दूर-दराज हैं, उन तक पहुंच काफी हद तक आसान हो जाएगी. डिजिटल बुनियादी ढांचे को निश्चित रूप से बढ़ाया जाएगा. शिक्षा, स्वास्थ्य के प्रति सरोकार उसी तरह बना रहेगा, जो पिछले कुछ वर्षों से कायम है. इसी तरह कौशल विकास. हमें ऐसे युवाओं की जरूरत है जो विश्वविद्यालय का कोर्स पूरा करते ही नियुक्ति के लायक तैयार हो जाएं. आज उद्योगों की शिकायत है कि कॉलेजों से निकलने वाले स्नातकों को नौकरी में प्रशिक्षित करने में लगभग साल भर लग जाता है. यह खर्च कोई भी उद्योग नहीं करना चाहता. हमें चाहिए कि हमारे स्नातक नौकरियों के लिए तैयार होकर आएं और उनमें से कई जो नौकरी के लिए विदेश जाते हैं, उनके पास उस देश की भाषा के साथ-साथ आवश्यक हुनर होना चाहिए. इसलिए हम इन बातों पर बहुत ज्यादा जोर देंगे. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी ध्यान देना होगा, लोगों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले उपकरणों का इस्तेमाल करने में कुशल बनाना है. फिर, उभरते हुए क्षेत्र हैं—रेयर अर्थ मटीरियल, ग्रीन अमोनिया के इस्तेमाल वगैरह में निवेश आ रहे हैं. यह तय करना है कि भारत सेवा क्षेत्र में अग्रणी बना रहे. इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में भारत में मैन्युफैक्चरिंग हो.
• वे कौन-से प्रमुख क्षेत्र हैं जिनमें आगे सुधार या बड़े बदलाव की संभावना है?
टेक्नोलॉजी आधारित बदलाव सर्वोच्च प्राथमिकता होने जा रहे हैं. बेशक, फिनटेक के क्षेत्र में स्टार्ट-अप, ग्रामीण आजीविका की समस्याओं के समाधान के लिए टेक्नोलॉजी, पर्यावरण के लिए मिशन जीवन-शैली वगैरह पर भी जोर होगा. आपको ऐसे उपकरण, टेक्नोलॉजी की जरूरत है जो जिंदगी को आसान और टिकाऊ बना सके. हम जेनरिक दवाओं के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं को बढ़ाने की ओर भी देख रहे हैं. सुधारों को अब क्रमबद्ध तरीके से नहीं किया जा सकता, उन्हें निरंतर और व्यवस्थागत होना होगा. कुछ समय से लंबित व्यवस्थागत सुधारों को शुरू करना होगा और पंचायत और स्थानीय निकाय स्तर तक ले जाना होगा. मसलन, किसी पंचायत में कोई संयंत्र लगाने की मंजूरी. आपको लगता है कि पंचायतें इसे आसान बना रही हैं? आपको वह करने की जरूरत है, ताकि यह पारदर्शी तरीके और सरलता से हो.
• क्या जीएसटी में भी कुछ बदलाव देखने को मिलेंगे, जिनमें इसे तर्कसंगत बनाना भी शामिल है?
यह कोई उपेक्षा वाला क्षेत्र बिल्कुल नहीं है. एक मंत्री-समूह है और उसकी रिपोर्ट को चुनाव के बाद जीएसटी परिषद की बैठक में रखा जाएगा और अगले स्तर तक ले जाना होगा.
• जीएसटी और उसके बंटवारे को लेकर केंद्र-राज्य संबंधों में कई ऊंच-नीच बनी हुई है. इसे सुलझाने का आपका प्रस्ताव क्या है?
मुझे लगता है कि यह पूरी तरह से राजनैतिक खेल है जो विपक्षी दल खेल रहे हैं. मैं किसी को भी चुनौती देती हूं, वह मुझे बताए कि क्या किसी राज्य को उसका बकाया देने से इनकार किया गया है. वित्त मंत्रालय की ओर से मैं आपको बता सकती हूं कि अगर कुछ हुआ है तो यह कि वित्त आयोग की सिफारिश के मुताबिक भुगतान समय पर किया गया है, कभी-कभी तो समय से काफी पहले. जनवरी में जो भुगतान करना था, मैंने दिसंबर में कर दिया, दिसंबर में जो भुगतान करना था, नवंबर में ही कर दिया गया है. लेकिन फिर भी आपको अपने कामकाज या आपकी आबादी या आपकी कार्यकुशलता के स्तर की वजह से कोई और मुद्दा उठाना है, तो आपको अगले वित्त आयोग से बात करनी चाहिए. उसका पहले ही गठन हो चुका है.
• तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने चुनावी रैलियों में यही कहा है. उनके राज्य से केंद्रीय खजाने में हर एक रुपए के योगदान के बदले करों के हिस्से के रूप में सिर्फ 29 पैसे वापस आते हैं.
यह कैसी दलील है भला, यह सनसनीखेज बनाने और लोगों के बीच दरार पैदा करने जैसी है. सोचिए, अगर तमिलनाडु के भीतर ही राज्य के खजाने में अच्छा-खासा योगदान करने वाला कोयंबत्तूर और उसके आसपास के इलाके के लोग कहने लगें, ''नहीं, हमारा सब हमें वापस दे दो,'' तो क्या होगा. जिस जिले से मुख्यमंत्री आते हैं यानी तंजावुर को पैसा नहीं मिलेगा, या श्रीपेरंबदुर को. क्या वे देश में यही सब चलाना चाहते हैं? क्या तमिलनाडु में बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे नहीं बनाए जा रहे? क्या वंदे भारत ट्रेनें नहीं जा रही हैं? इन सब मदों में कौन खर्च करता है? तमिलनाडु में निर्मित उत्पादों की खरीदारी पूरे देश में होती है. तो टैक्स के रूप में जो पैसा आपको मिलता है, वह कोई आपका अपना पैसा नहीं है, उसमें सभी देशवासियों का योगदान है. यह किस तरह का कैसा ऊल-जुलूल तर्क है?
• सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं, दक्षिणी राज्यों के सभी वित्त मंत्रियों ने यह सवाल उठाया है.
इसीलिए मैं कह रही हूं कि यह पूरा राजनैतिक मामला है. अब कर्नाटक इसे उठा रहा है क्योंकि मुफ्त सुविधाओं के नाम पर न निभ सकने वाले वादे किए गए हैं और अब वहां के उप-मुख्यमंत्री कहते हैं, ''मेरे पास विकास की मद में देने के लिए और पैसा नहीं है. अब बस. माफ करें, मैंने सब कुछ दे दिया है.'' और फिर कहते हैं, ''मोदी, आप मुझे पैसे नहीं दे रहे हैं.'' बताओ मोदी ने कौन-सा पैसा नहीं दिया? यह पूरी तरह से विकृत राजनैतिक, अवसरवादी दलील है. अगर कारगर कामकाज के संदर्भ में कोई मुद्दा है, तो वित्त आयोग से बात करनी चाहिए, केंद्र सरकार को दोष नहीं देना चाहिए.
• आप आईबीसी (दिवाला और दिवालियापन संहिता) प्रक्रिया में देरी से कैसे निबटेंगी, जो अभी भी दिवालियापन के मुद्दों के समाधान का मुफीद तंत्र है?
मेरा मानना है कि आईबीसी में कोई गलती नहीं है. इसे उद्योग की आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित किया गया है ताकि प्रक्रिया में तेजी आए. यह कंपनियों को खत्म करने के बजाए चालू बनाए रखने के लिए है. लेकिन राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) की रिक्तियों को भरने, ज्यादा उम्दा समाधान देने वाले प्रोफेशनल्स की उपलब्धता निश्चित रूप से समस्याएं हैं जो कुछ स्किल सेट्स के साथ आते हैं और उन्हें प्रशिक्षित भी करना पड़ता है. फिर कई बार ऐसा भी आ जाता है जब आप झटका खा जाएं, जब लोग सिस्टम के साथ ऐसा खिलवाड़ करते हैं कि पुराना, बदनाम प्रमोटर खुद पिछले दरवाजे से अंदर आना चाहता है. इसलिए, हम फायरवॉल बनाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि ऐसा न हो. इस तरह की शुरुआती दिक्कतें हैं जिनसे आईबीसी में रुकावट आई है, लेकिन आईबीसी में कोई दिक्कत नहीं है. यह ऐसी प्रणाली है जिसे और अधिक बेहतर बनाना होगा ताकि यह समय की कसौटी पर खरा उतरे.
• क्या मोदी 3.0 में सरकारी बैंकों का अधिक एकीकरण होगा और नए निजी बैंकों को लाइसेंस दिए जाएंगे?
इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में बहुत ज्यादा बैंकों की जरूरत है. बहुत सारे बड़े बैंकों की. साथ ही साथ, बहुत सारे छोटे बैंक भी हैं, जिनकी आपको जमीनी स्तर पर जरूरत है, जो स्थानीय क्षेत्रों में हों. छोटे वित्तपोषण संस्थान अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और हमें उनकी और ज्यादा जरूरत भी है. इसलिए बैंकिंग प्रणाली को और अधिक चुस्त होना होगा. हमें खुशी है कि हमने भारतीय बैंकों को अच्छी स्थिति में ला दिया है, लेकिन पूरे क्षेत्र को काफी चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है और हमें बहुत अधिक बैंकों की जरूरत है.
• कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ कमजोर रुपए का अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
इसमें संदेह नहीं कि यह बड़ी चुनौती होगी. लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपया और उसके उतार-चढ़ाव की कहानी दूसरी मुद्राओं के मुकाबले रुपए की स्थिति जैसी नहीं है. यह दूसरी मुद्राओं के मुकाबले स्थिर रहा है, उतार-चढ़ाव न्यूनतम रहा है. अगर डॉलर के मुकाबले इसमें उतार-चढ़ाव हो रहा है, तो वजह डॉलर की ताकत है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संकेत हैं कि वह और मजबूत होगी. इसलिए, हमें यह देखना होगा कि हम उस चुनौती का सामना कैसे कर सकते हैं, चाहे वह कच्चे तेल की कीमतें हों या खासकर डॉलर के मुकाबले विनिमय दर में उतार-चढ़ाव हो. रिजर्व बैंक भी लगातार नजर बनाए हुए है.
• अर्थव्यवस्था को संभालने के यूपीए के तरीके पर आपने जो श्वेत-पत्र निकाला था, उसमें आपने 2011 और 2013 के बीच रुपए को 36 फीसद तक गिरने देने के लिए उसकी आलोचना की थी. लेकिन एनडीए के तहत भी रुपया काफी गिर रहा है.
क्या नाजुक पांच अर्थव्यवस्थाओं के दौरान डॉलर के कमजोर होने और आज की मजबूत अर्थव्यवस्था के बीच कोई फर्क नहीं है? आज वह तेजी से बढ़ रही है, जहां जीडीपी का विस्तार हो रहा है और आप दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य कर रहे हैं.
• सेंसेक्स 75,000 अंक को पार कर गया. यह क्या दर्शाता है?
भारतीय अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास की भावना. स्थिर नीतियों वाली, स्थिर बहुमत वाली सरकार में विश्वास. कराधान में विश्वास, जो ऊपर-नीचे नहीं होता. कोई फ्लिप-फ्लॉप नहीं. शेयर बाजार यही दिखा रहा है.
• प्रधानमंत्री 2047 तक भारत को विकसित अर्थव्यवस्था बनाने पर जोर दे रहे हैं. मोटे अनुमान कहते हैं कि आपको लगभग 12 फीसद चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ना होगा. क्या आपके पास इसका कोई खाका है कि लक्ष्य पूरा हो जाए?
ऐसी कई बातें हैं जो मैं आपको पहले ही बता चुकी हूं. हमें अपनी नीति में सुसंगत रहना होगा. हमें समाज के हर वर्ग का मददगार बनना होगा. हमें भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की जरूरत है, वरना लोग दूसरों का धन हड़प लेंगे और अर्थव्यवस्था को बढ़ने नहीं देंगे. देश के हर क्षेत्र में निर्यात की संभावनाएं हैं. कृषि में निर्यात की बड़ी संभावनाएं हैं. मैन्युफैक्चरिंग को अपने अच्छे, गौरवशाली दिनों में वापस आना होगा. इसी तरह, सेवा क्षेत्र को दी जा रही मदद को व्यापक करना होगा. हमारे रक्षा निर्यात ने दिखाया है कि हमारी नीतियों का संतुलन सही रहे तो वे अच्छा कर सकते हैं. हमें यह सब करना है और करते रहना है. लेकिन कुछ हल्के-फुल्के अंदाज में कहें तो, हमें कम से कम विपक्षी दलों में ऐसे लोगों की जरूरत है, जो भारत में विश्वास करते हों. अगर उन्हें हमारे अपने लोगों पर विश्वास नहीं है, तो उन्हें भारत के विचार का प्रचार करने की जरूरत नहीं है. कृपया भारत के अपने लोगों की विश्वसनीय उपलब्धियों को कमजोर न करें.

