"मैं और गुलज़ार, हम एक दूसरे को बेचते रहते हैं"
लेखक-निर्देशक विशाल भारद्वाज से उनकी ताजा सीरीज चार्ली चोपड़ा, गुलजार के साथ जोड़ी और उनकी फिल्मों में मजबूत स्त्री किरदारों पर संपादक सौरभ द्विवेदी की बातचीत

● हाल ही में सोनी लिव पर आई आपकी वेब सीरीज चार्ली चोपड़ा की आखिर खास बात क्या है?
अगाथा क्रिस्टी को बचपन से पढ़ता आया था. उन्हीं के एक उपन्यास पर बनी है यह. हमने इस सीरीज में एक नया प्रयोग किया है. स्क्रीन पर दिख रहा किरदार बीच-बीच में सीधे दर्शक से बात करने लगता है. थिएटर में इस ब्रेकिंग द फोर्थ वॉल कहते हैं, जिसमें नाटक का कोई भी किरदार कभी भी सामने बैठे दर्शक से बतियाने लगता है और फिर नाटक में लौट आता है. विदेशी फिल्मों में तो यह प्रयोग हुआ था पर हिंदी सिनेमा में इससे पहले यह प्रयोग नहीं किया गया था.
● गैंगस्टर रामपाल त्यागी (लंगड़ा त्यागी/ओमकारा) की क्या कहानी थी?
तब मैं सातवीं क्लास में था. हॉस्टल गैंगस्टर का गढ़ होता था. वहां रामपाल वॉर्डन के कमरे में रहता था और वॉर्डन हॉस्टल में. त्यागी हॉस्टल हमारे स्कूल की बगल में ही था. रामपाल हम लोगों से बहुत प्यार करता था. कई बार हमारे साथ क्रिकेट भी खेले. इसका जिक्र फिल्म (ओमकारा) में भी किया है.
● अपनी और गुलजार साहब की जोड़ी के बारे में बताइए जरा.
मैंने अगर 55 फिल्मों का म्यूजिक किया तो उनमें से 52-53 गुलजार साहब के साथ. उनके साथ जितना भी काम कर लो कम लगता था. उस वक्त मेरे पास कोई आता तो (मैं कहता) गुलजार साहब को लेकर काम करते हैं. हम दोनों एक-दूसरे को बेचते रहते थे (मुस्कराते हैं).
● आपकी फिल्मों में महिला किरदारों के इतना वजनी होने की वजह क्या रही है?
हमारे देश में जिस तरह से औरत को दबाया गया है, उससे मुझे बहुत तकलीफ है. औरत न हुई जायदाद हो गई. मैं लेफ्ट या राइट में नहीं, बीच में हूं. जहां गलत लगता है आवाज उठाता हूं. मर्द शारीरिक तौर पर ताकतवर हो सकता है पर औरत भीतर से ज्यादा ताकतवर है. दादी, चाची, बीवी, गर्लफ्रेंड सब में आप देख लीजिए.
● हमने देखा है कई ऐक्टर्स के साथ आपने बार-बार काम किया, मसलन इरफान और नसीर जी.
नसीर (नसीरुद्दीन शाह) और इरफान ये सारे बड़े कलाकार रहे हैं और किसी भी किरदार को अपने हिसाब से ढाल लेते थे. मैंने अगर 70 प्रतिशत सोचा है तो ये लोग उसे 170 प्रतिशत पर ले जाते हैं.
आम तौर पर ऐसा नहीं होता. मेरी कोशिश होती है कि जितना मैंने लिखा है उसका 70 प्रतिशत भी कलाकार से मिल जाए तो बहुत बड़ी बात है. नसीर साहब अपने काम के प्रति बहुत ही ईमानदार हैं. और उनका कहना होता है कि ऐक्टिंग इज ऑल अबाउट रिऐक्टिंग.