‘‘यह जी20 दक्षिणी दुनिया की आवाज का आईना है’’
भारत की जी20 अध्यक्षता वह ऐतिहासिक पल है, जो देश को कई वैश्विक मुद्दों को आकार देने में मददगार होगी. इस साल इसे आगे ले जाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धुरी की भूमिका निभाई और सफलतापूर्वक यह आश्वस्त किया है कि दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों के सरोकार को अहमियत दिलाने में भारत अहम भूमिका निभाए. जी20 नेताओं के शिखर सम्मेलन से कुछ ही दिन पहले, हमारे सहयोगी प्रकाशन बिजनेस टुडे के साथ विशेष बातचीत में प्रधानमंत्री ने वैश्विक चिंताओं को दूर करने में भारत की भूमिका के बारे में विस्तार से बात की. प्रमुख अंश:

● भारत को जी20 की अध्यक्षता ऐसे समय मिली है जब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास संभावनाओं को लेकर उत्साहित हैं. जी20 शिखर सम्मेलन भारत की तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति और वैश्विक आर्थिक मंचों पर विश्वसनीय आवाज के रूप में छवि को मजबूत करने में किस प्रकार मददगार होगा?
मैं नहीं समझता कि किसी देश की छवि और उसकी ब्रांडिंग को किसी शिखर सम्मेलन के जरिए मजबूत किया जा सकता है. वित्तीय दुनिया वास्तविक तथ्यों से संचालित होती है. यह प्रदर्शन देखती है, धारणा नहीं. चाहे वह कोविड-19 महामारी से लड़ते हुए अन्य देशों की भी मदद करना हो, या फिर हमने अपनी अर्थव्यवस्था को जिस तरह से विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनाया, या फिर हमारी वित्तीय और बैंकिंग प्रणाली के लगातार मजबूत होने की बात हो, भारत आज जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, उसे पूरा विश्व देख रहा है.
किसी शिखर सम्मेलन को छवि निर्माण के दृष्टिकोण से देखना, भारत की विकास गाथा को कमजोर करता है. जी20 शिखर सम्मेलन को वैश्विक संदर्भों में देखा जाना चाहिए. जी20 देशों का मानना है कि सिर्फ अरबों-खरबों की बात करने से कुछ खास नहीं होने वाला, जरूरत मानव-केंद्रित विकास पर ध्यान फोकस करने की है. मेरा अनुभव है कि हमारी जी20 की अध्यक्षता के दौरान इसी लाइन पर चर्चा होती रही है. कई बैठकों और चर्चाओं में हमने देखा है कि पुराने दृष्टिकोण की जगह नए दृष्टिकोणों को अपनाया गया है.
पहली बार, विकसित और विकासशील देश एक साथ आएंगे और वैश्विक समस्याओं का समाधान ढूंढेंगे. हमने अफ्रीकन यूनियन को आमंत्रित करके समावेशी वातावरण की नींव रखी है. हमारी जी20 की अध्यक्षता में भागीदारी को जिस सीमा तक बढ़ाने का प्रयास हुआ है, वह अभूतपूर्व है और प्रतिभागियों ने भी अद्वितीय खुलेपन का परिचय दिया है. मुझे विश्वास है कि सभी देशों के योगदान से यह बहुत सफल रहेगा. भारत और भारत का जी20 सम्मेलन नई वैश्विक व्यवस्था के लिए उत्प्रेरक स्रोत के रूप में कार्य करेगा.
● आपकी सरकार ने भारत की जी20 अध्यक्षता को सफल बनाने में काफी ऊर्जा लगाई है. इसके समापन पर अंतत: कौन से मुख्य परिणाम हासिल करने की आप आशा करते हैं?
सुधारों के अभाव में, आज दुनिया भर में बहुपक्षीय संस्थाएं विश्वसनीयता और भरोसा खो रही हैं. दूसरी ओर, कई छोटे समूह उभर रहे हैं. दुनिया देख रही है कि बहुपक्षीय संस्थानों की शून्यता को भरने के लिए जी20 किस तरह का आकार ले रहा है. जी20 समूह को आशा की किरण के रूप में देखा जाता है और इसकी नींव भारत की अध्यक्षता के दौरान रखी गई थी. इस कार्य के अपेक्षित परिणाम क्या होंगे, इसे भविष्य पर छोड़ते हैं.
यह जी20 दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों की आवाज और चिंताओं का इजहार कर रहा है. यह महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को गति दे रहा है. भविष्य में प्रौद्योगिकी एक बड़ी भूमिका निभाने जा रही है, ऐसे में यह जी20 एआइ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और डीपीआइ (डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर) के क्षेत्र में लंबी छलांग लगा रहा है. भारत की जी20 की अध्यक्षता अग्रणी पर्यावरण-अनुकूल पहल के रूप में 'एक पृथ्वी', समावेशी और समग्र विकास के प्रयासों के रूप में 'एक परिवार' और दक्षिणी दुनिया की आवाज और चिंताओं को दर्शाते हुए 'एक भविष्य' की दिशा में योगदान देगी.
● मौसम में बेहिसाब बदलाव की घटनाओं ने जलवायु परिवर्तन को एक ऐसी वैश्विक समस्या में बदल दिया है जिस पर तत्काल कदम उठाने की जरूरत है. आप जी20 में इस संबंध में क्या प्रगति हासिल करने की उम्मीद कर रहे हैं?
मनुष्य को यह स्वीकार करना होगा कि इस संकट की जड़ हम ही हैं. इंसान इस धरती को कितना ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं, हमें यह स्वीकार करना होगा. एक बार जब हम इसे पूरी तरह से स्वीकार कर लेंगे तब यह मुद्दा हमारे लिए चुनौती या समस्या नहीं रहेगा. हम स्वाभिवक रूप से इसके समाधान की ओर बढ़ेंगे, चाहे वह प्रौद्योगिकी के जरिए हो, या जीवनशैली में बदलाव लाकर या फिर किसी अन्य तरीके से. आज सीमाओं की बात हो रही है और जलवायु संबंधी कार्रवाइयों पर आलोचना का माहौल है, जिससे देशों के बीच टकराव बढ़ रहा है.
हमारी सारी ऊर्जा इस बात पर लग रही है कि क्या नहीं किया जाना चाहिए, जबकि बात यह होनी चाहिए कि क्या करने की जरूरत है. इस तरह के दृष्टिकोण से तो कोई ठोस कार्रवाई संभव नहीं होगी. इसी वजह से जी20 की अध्यक्षता के दौरान हमारा ध्यान दुनिया को इस बात पर एकजुट करने पर रहा है कि क्या किया जा सकता है. गरीबों और धरती, दोनों को मदद की जरूरत है. भारत न केवल सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ, बल्कि समाधान लेकर आने की मानसिकता के साथ इस पर आगे बढ़ रहा है. 'वन वर्ल्ड, वन सन, वन ग्रिड’ की हमारी पहल ऐसी ही एक सकारात्मक पहल थी.
हमारी सोच व्यावहारिक होनी चाहिए ताकि उसे हकीकत में बदला जा सके. प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण नहीं होगा और पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं होगा, तो गरीब देश जलवायु परिवर्तन को रोकने की दिशा में कैसे काम कर सकते हैं? अपनी अध्यक्षता में हमने जलवायु संबंधी वित्तीय संसाधन जुटाने और प्रत्येक देश की उसकी विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक बदलाव के लिए समर्थन तैयार करने को प्राथमिकता दी है. हमने नवीन हरित प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए, निम्न-कार्बन उत्सर्जन वाले तरीकों के विकास और उन पर अमल में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय समाधानों, नीतियों और प्रोत्साहनों पर जोर दिया है.
संक्रमण के दौरान भारत विविधतापूर्ण वैश्विक नीति की वकालत करता है, जिससे देशों को कार्बन करों से लेकर हरित प्रौद्योगिकी मानकों तक, मूल्य निर्धारण और गैर-मूल्य निर्धारण की विभिन्न रणनीतियों में से उनकी अपनी विशेष परिस्थितियों के आधार पर रणनीति के चयन की छूट मिलती हो. हमारा अनुभव रहा है कि वास्तविक परिवर्तन जन आंदोलनों से, लोगों की भागीदारी से ही आता है. हमारा मिशन लाइफ, जीवनशैली परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित करके जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को एक जन आंदोलन बनाना चाहता है. जब प्रत्येक व्यक्ति को यह लगने लगेगा कि वह पृथ्वी की भलाई में प्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान दे सकता है, तो परिणाम अधिक व्यापक होंगे.
● कुछ महत्वपूर्ण वित्तीय मुद्दे हैं जो भारत के जी20 एजेंडे का हिस्सा हैं, जिसमें उच्च स्तर के सार्वजनिक ऋण से जूझ रहे देशों के लिए ऋण पुनर्गठन भी शामिल है. आप इन मुद्दों पर आम सहमति को लेकर कितने आशान्वित हैं?
वित्तीय अनुशासन सभी देशों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. वित्तीय अनुशासनहीनता से अपनी रक्षा करना प्रत्येक देश का कर्तव्य है, लेकिन साथ ही ऐसी ताकतें भी हैं जो ऋण संकट को बढ़ाकर उसका अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर रही हैं. इन ताकतों ने दूसरे देशों की मजबूरी का फायदा उठाया और उन्हें कर्ज के जाल में फंसाया. जी20 ने 2021 से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में कर्ज की मुश्किलों को दूर करने को प्राथमिकता दी है. एसडीजी (टिकाऊ विकास लक्ष्य) 2030 हासिल करना इन देशों की प्रगति पर निर्भर करता है लेकिन ऋण चुकाने के बोझ से इनके प्रयासों में बाधा आती है और एसडीजी के लिए निवेश की उनकी क्षमता सीमित हो जाती है.
2023 में, भारत की अध्यक्षता में जी20 ने 'कॉमन फ्रेमवर्क’ के माध्यम से ऋण पुनर्गठन को महत्वपूर्ण बढ़ावा दिया. भारत की अगुआई से पहले, केवल चाड में इस ढांचे के तहत ऋण पुनर्गठन हुआ था. भारत के फोकस के साथ, इस मामले में जाम्बिया, इथियोपिया और घाना में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. प्रमुख ऋणदाता होने के नाते भारत ने यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कॉमन फ्रेमवर्क के बाहर जी20 मंचों ने भारत, जापान और फ्रांस की सह-अध्यक्षता वाली एक समिति के साथ, श्रीलंका के लिए ऋण पुनर्गठन समन्वय की भी सुविधा प्रदान की. आइएमएफ, विश्व बैंक और जी20 प्रेसिडेंसी की सह-अध्यक्षता में ग्लोबल सावरेनडेट राउंडटेबल (वैश्विक संप्रभु ऋण गोलमेज सम्मेलन) की शुरुआत भी हुई है.
● भारत ने बहुपक्षीय विकास बैंक (एमडीबी) के ढांचे में सुधार के लिए महत्वपूर्ण एजेंडे को उठाया है. लेकिन पिछले प्रयासों का कोई खास असर नहीं हुआ....
जहां तक एमडीबी एजेंडे की बात है, जी20 में हाल तक के प्रयास इस बात पर केंद्रित रहे हैं कि बैलेंस-शीट को कैसे सुखद स्तर पर लाया जा सकता है, ताकि अपने मौजूदा संसाधनों का सबसे प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके. हालांकि, कोविड-19 महामारी के बाद से, यह एहसास हुआ है कि एमडीबी को अपने विकास के मुख्य उद्देश्यों के साथ वैश्विक चुनौतियों पर गौर करने की आवश्यकता है. इसके लिए एमडीबी की कार्यप्रणाली के मौजूदा ढांचे में सुधार और उनके मौजूदा वित्तीय संसाधनों के विस्तार की आवश्यकता होगी.
अपनी अध्यक्षता के दौरान, हम इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाने और हल की ओर बढ़ने में सक्षम रहे हैं. पहले के विपरीत, एमडीबी में सुधार की मांग अब खुद शेयरधारकों की ओर से उठ रही है और इस वजह से इस मुद्दे ने बहुत ध्यान आकर्षित किया है. अध्यक्षता की वजह से 'एमडीबी को मजबूत करने पर जी20 स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह’ की भी स्थापना हो पाई. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना पर दुनिया के कुछ सर्वश्रेष्ठ लोग इस समूह में शामिल हैं. इसने अपनी रिपोर्ट का खंड 1 पहले ही प्रस्तुत कर दिया है, और अक्टूबर में दूसरा खंड प्रस्तुत करेगा. सिफारिशें मुख्य रूप से एमडीबी की वित्तीय ताकत बढ़ाने, गरीबी उन्मूलन और साझा समृद्धि को बढ़ावा देने के मूल उद्देश्य को पूरा करने के लिए ऋण देने के स्तर को बढ़ाने पर भारत के विचारों को प्रतिबिंबित करती हैं.
● भारत में इंडिया स्टैक का सार्वजनिक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और उसकी आधार, यूपीआई, कोविन और प्रधानमंत्री जन धन योजना जैसी सेवाएं लाभार्थियों को सीधे सेवा मुहैया कराने में कामयाब रही हैं. क्या भारत जी20 में इन्हें कारगर विकास मॉडल की तरह पेश कर पाया है?
समावेशी विकास सामाजिक न्याय की पहली जरूरत है और उसके लिए आखिरी व्यक्ति तक सेवाएं पहुंचना जरूरी है. भारत ने दिखाया है कि टेक्नोलॉजी आखिर व्यक्ति तक पहुंचने में खासी मददगार है. यह हमारी नीतियों की चमकदार मिसाल है कि दुनिया में 46 फीसद डिजिटल लेनदेन अब भारत में होता है. आज दुनिया भारत को नवाचारों के पथप्रदर्शक की तरह देखती है. भारत के सार्वजनिक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल की दुनिया के विशेषज्ञ न सिर्फ सराहना करते हैं, बल्कि मैंने वैश्विक नेताओं के साथ बैठकों में उनमें इसके प्रति दिलचस्पी का अनुभव किया.
भारत के सार्वजनिक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में कई तरह के प्रोडक्ट हैं, जिनकी उपयोगिता दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों और विकसित दुनिया में देखी जा रही है. कई देशों की रुचि हमारे अनुभव से सीखने की है और हमने करीब दर्जन भर देशों को सफलतापूर्वक सहयोग किया है. हम जी20 देशों के साथ टेक्नोलॉजी के जरिए वैश्विक विकास को प्रशस्त करने के लिए काम कर रहे हैं, खासकर सार्वजनिक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रति साझा नजरिए से डिजिटल जन हित को आगे बढ़ाने की खातिर. इसे जी20 के सदस्यों से काफी सराहना मिली. हमें यकीन है कि भारत की सार्वजनिक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की लोकप्रियता वैश्विक वित्तीय समावेशन और जिंदगी की सहूलियत बढ़ाने में लंबा रास्ता तय करेगी.
● वैश्विक स्टार्ट-अप इकोसिस्टम के निर्माण में मदद के लिए जी20 मंच का उपयोग करने पर चर्चा हुई है. आपकी सरकार इस संबंध में किस प्रकार आगे बढ़ने की उम्मीद करती है?
हम इतिहास पर नजर डालें तो लंबे समय तक क्रमिक विकास का दौर रहा है. लेकिन आज, चीजें बदल गई हैं. क्रमिक परिवर्तन के युग से, हम बदलावकारी नवाचारों के युग में आ गए हैं. जितना परिवर्तन पहले 100 वर्षों में देखा जाता था, वह आज केवल 10 वर्षों में हो जाता है! सरकारों और समाज को तेजी से हो रहे बदलावों के प्रति सचेत रहना होगा. अगर हम भारत के अनुभव को देखें तो हमने न केवल स्टार्ट-अप की क्षमता को समझा, बल्कि उन्हें लॉन्च पैड भी उपलब्ध कराया. हमने अटल इनोवेशन मिशन और अटल टिंकरिंग लैब्स शुरू किए. आज, 10,000 अटल टिंकरिंग लैब्स हैं जहां 75 लाख छात्रों ने लाखों नवाचार परियोजनाओं पर काम किया है. हमने इन्क्यूबेशन केंद्र बनाए हैं और कई हैकथॉन आयोजित किए हैं. इससे 'समस्या-समाधान’ की मानसिकता विकासित हुई है.
इन सभी हस्तक्षेपों से स्टार्ट-अप का तेजी से उदय हुआ है और वे व्यापक परिवर्तन ला रहे हैं. आज, भारत में लगभग 1,00,000 स्टार्ट-अप और 100 यूनिकॉर्न हैं. कई विशेषज्ञ भारत को स्टार्ट-अप के केंद्र के रूप में देखते हैं. यह हमारे राजकाज का बुनियादी सिद्धांत है, तो स्वाभाविक है कि हम इस गति को विश्व स्तर पर ले जाना चाहते हैं.
भारत की अध्यक्षता के दौरान हमने स्टार्टअप20 एंगेजमेंट ग्रुप की स्थापना की, जो जी20 के तहत नई पहल थी. यह समूह वैश्विक स्टार्ट-अप इकोसिस्टम की आवाज बना है, जो विभिन्न पक्षों को साझा मंच पर ला रहा है. यह स्टार्ट-अप के लिए वैश्विक नैरेटिव तैयार करने और कॉर्पोरेट, निवेशकों, नवाचार एजेंसियों और अन्य प्रमुख पक्षों के साथ तालमेल को संभव बनाने की उम्मीद करता है. हमें उम्मीद है कि वे क्षमता निर्माण, वित्त पोषण में कमी की पहचान, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, एसडीजी लक्ष्यों की प्राप्ति और समावेशी इकोसिस्टम के विकास जैसे क्षेत्रों में ठोस कदम उठाने में सक्षम होंगे.
● प्रतिकूल भू-राजनीतिक परिस्थितियां, विशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक सहमति को जटिल बना देती हैं. हम देख रहे हैं कि विभिन्न देश रूस और यूक्रेन के बीच शांति स्थापित करने का रास्ता खोजने की कोशिश कर रहे हैं. जी20 अध्यक्ष के रूप में, क्या आपके पास कोई योजना है जो रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्ति का मार्ग खोजने में मदद कर सकती है?
आपको यह आकलन करना चाहिए कि क्या जी20 या जी20 की हमारी अध्यक्षता को इस मुद्दे के साथ जोड़ना सही है. आपके मन में सिर्फ इसी मुद्दे के बारे में पूछने का विचार क्यों आया? दुनिया में फिलहाल केवल यही एक समस्या है? दुनिया के अन्य हिस्सों जैसे सीरिया, अफ्रीका के कुछ देशों, पूर्वी एशिया, लैटिन अमेरिका, में भी समस्याएं हैं पर आपके ध्यान में वह क्यों नहीं आया? संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं जो इन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. मेरा ध्यान इस बात पर है कि हम जी20 के अपने अध्यक्ष पद का उपयोग उन विकासात्मक मुद्दों पर साझा स्थिति बनाने के लिए करेंगे जो वैश्विक दक्षिण के लिए महत्वपूर्ण हैं.
● आपने अफ्रीकन यूनियन को जी20 की सदस्यता दिलाने की पुरजोर वकालत की. आप जी20 में और नई उभरती विश्व व्यवस्था को आकार देने में अफ्रीकन यूनियन की क्या भूमिका देखते हैं?
अक्टूबर 2015 में हमने नई दिल्ली में भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन आयोजित किया था. यह एक बड़ा प्रयास था जहां अफ्रीका महाद्वीप के 54 देशों के नेता भारत आए थे. मैं ग्लोबल साउथ के देशों के लिए गहरी सहानुभूति रखता हूं. मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमें वैश्विक विकास एजेंडे पर प्रगति करनी है तो विकासशील विश्व को महत्व देना होगा. उनमें वैश्विक कल्याण में योगदान देने की भरपूर क्षमता और योग्यता है लेकिन इसके लिए हमें उन्हें गौरवपूर्ण स्थान देने, उनकी बात सुनने, उनकी प्राथमिकताओं को समझने की जरूरत है.
जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था, तब मैंने पहली बार अहमदाबाद में अफ्रीका डेवलपमेंट बैंक के शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी. उन्होंने अफ्रीका के बाहर अपनी बैठक भी पहली बार की थी. यह बड़ी कामयाबी थी. इस बार हमने अपनी जी20 अध्यक्षता का आदर्श वाक्य 'वसुधैव कुटुंबकम्’ रखने का फैसला किया. यह हमारी मौलिक आस्था और लोकाचार है. हम विकासशील देशों को शामिल नहीं करेंगे, तो वसुधैव कुटुंबकम् कैसे हो सकता है?
एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य कैसे हो सकता है? इसीलिए, जी20 की अध्यक्षता संभालने के बाद मैंने जो पहला कार्यक्रम आयोजित किया, वह इस वर्ष जनवरी में वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट था. उनकी बात सुनने के बाद, उनकी प्राथमिकताओं और चिंताओं को समझने के बाद, हमने अपनी जी20 अध्यक्षता के लिए एजेंडा तय किया. हम ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को जी20 के एजेंडे में लाए हैं. इसी भावना के साथ मैंने हमारी अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकन यूनियन को जी20 का स्थायी सदस्य बनाने की पहल की है. मुझे विश्वास है कि इसमें हमें समर्थन मिलेगा. इससे जी20 अधिक प्रतिनिधिक बनेगा और ग्लोबल साउथ की आवाज ज्यादा बुलंद होगी.
विश्व व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा तब उभरता है जब देशों को लगता है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनके विचारों, चिंताओं और मुद्दों पर कान नहीं दिए जाते. हमारा मानना है कि विकासशील दुनिया की आवाज और भागीदारी के बिना वैश्विक चुनौतियों का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता. विश्व व्यवस्था में अफ्रीका को वह जगह नहीं मिली जो उसे मिलनी चाहिए. भारत और अफ्रीका के बीच विशेष संबंध हैं और भारत वैश्विक मामलों में उसकी बड़ी भूमिका का समर्थक रहा है.
जी20 की हमारी अध्यक्षता के दौरान, हमने जी20 में पहल की है कि अफ्रीकन यूनियन के लिए स्थायी सीट हो, और हमें विश्वास है कि हमारे प्रस्ताव का जी20 के सदस्य देश समर्थन करेंगे. हमारा मानना है कि यह कदम अफ्रीकी महाद्वीप को सशक्त बनाएगा और उसे वैश्विक मंच पर अपनी चिंताओं को बेहतर ढंग से व्यक्त करने में सक्षम बनाएगा तथा विश्व व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
— साथ में, सौरभ मजूमदार और सिद्धार्थ जाराबी