जो भी बाथरूम जाए उनको दो दो फिल्मफेयर हाथ लगें
दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह अरसे बाद एक अहम रोल में आए हैं. यह किरदार है ताज-2 सीरीज में मुगल बादशाह अकबर का. इसका पार्ट-2 आ चुका है. संपादक सौरभ द्विवेदी से उन्होंने कई मसलों पर बेबाक बात की. उसके अंश:

क्या यह सच है कि आपने घर के दरवाजों के हत्थों की जगह ट्रॉफियां लगवा रखी हैं?
सच है. क्योंकि इन ट्रॉफियों की कोई कीमत नहीं है मेरे लिए. पहली वाली मिली तो बहुत खुश हुआ था. उसके बाद अवॉर्ड पर अवॉर्ड मिलते गए. फिर पता चला कि ये मेरिट की वजह से नहीं मिल रहे बल्कि लॉबीइंग का नतीजा हैं. तो मैंने उन अवॉर्ड्स को कहीं रख दिया. फिर मुझे पद्मश्री, पद्मभूषण वगैरह दिया गया तो अपने वालिद की याद आई जो गुजर चुके थे. हमेशा फिक्र में रहते थे कि तुम ये निकम्मों का काम करते हो, भांड बनोगे. मैं राष्ट्रपति भवन में था तो बाबा (ऊपर की ओर देखते हुए) से कहा, देख रहे हो? वे देख रहे थे और बड़े खुश हो रहे थे. कॉम्पिटेटिव अवॉर्ड्स से मुझे सख्त नफरत है. पिछले दो अवॉर्ड तो मैं लेने भी नहीं गया. फार्म हाउस बनाया तो सोचा कि इनको यहां लगा देते हैं. जो भी बाथरूम जाएगा, दोनों हाथ से दरवाजा खोलने पर उसे दो-दो फिल्मफेयर मिलेंगे.
हम सबकी किस्मत में ऐसा ही है क्या कि जब गले लगाना था तब हमारे पिता सख्त बने रहे, और जब उन्होंने समझना चाहा तब हम दूर जा चुके थे.
मेरे साथ ये दुतरफा था. न मैं अपने वालिद को समझ पाया, न वो कभी मुझे समझ सके. वे पुराने खयालों के थे: पिता घर का मुखिया होता है. जो वो कहे, वही सच. एक फासला बना रहा हमारे बीच ताउम्र. मैं उनकी कब्र पर गया तो उनसे खूब बातें कीं. वह सब कुछ उन्हें बताया जो मैं कहना चाहता था और कह नहीं पाया था. ऐसा लगा कि वे सुन रहे थे. लेकिन आपने जो कहा वो सही है कि जब गले लगाना था तब सख्त हो जाते हैं. अब एक लड़का अगर क्लास में फेल हुआ है तो वह खुश तो नहीं होगा. घर आएगा तो हालत पतली होगी. उसी वक्त कंफर्ट की जरूरत होती है. ये नहीं कि आप चिल्लाएं उस पर और धमकियां दें. मैं इस बात का खयाल जरूर रखता हूं अपने बच्चों के साथ.
अमन (1967) फिल्म की क्या यादें हैं जब आप पहली दफा स्क्रीन पर आए थे?
लम्हे भर को दिखा था. उस रोल के साढ़े सात रुपए मिले थे. शायद उस फिल्म का कुछ पैचवर्क बचा था, दो तीन शॉट का. राजेंद्र कुमार साहब के क्लोज अप चाहिए होंगे. उनके पीछे भीड़ चली आ रही है. (मुंबई में) लिंकिंग रोड पर एक पैंपोश रेस्टोरेंट हुआ करता था जहां सारे स्ट्रगलर्स पड़े रहते थे. वहां एक दिन एक बंदा आया, हम लोगों को इकट्ठा किया, कहा कल नटराज स्टूडियो पहुंच जाना. मैं चौंका, अच्छा! क्या करना है? शूटिंग? अरे वाह. शूटिंग में धक्का-मुक्की करके मैं सबसे आगे खड़ा हो गया. इसीलिए उस फिल्म में मेरा शॉट अभी भी है. घर जाकर मैंने डींगें उड़ाईं कि मेरा बड़ा लंबा रोल था, राजेंद्र कुमार की मौत पर मैंने तो एक स्पीच भी दी पर वह सब काट दिया उन्होंने. हर नाकाम ऐक्टर यही कहानी सुनाता है.
तब मैं बिल्कुल खस्ताहाल था. मदनपुरा में एक जगह थी जहां सोने के लिए एक बिस्तर मिला हुआ था. वहां से रोज पैंपोश आता जाता, बेटिकट. मैंने बड़ी कोशिश की कि वेटर या दरबान की नौकरी मिल जाए. तभी ताज महल होटल में बेलबॉय के लिए अप्लाय किया. वो नौकरी मिल जाती तो आज पता नहीं क्या होता. शायद हेड शेफ.
(जब घर से बंबई भागे) तब दिलीप कुमार ने क्या बोला आपको?
उन्होंने कहा (दिलीप साब की मिमिक्री करते हुए) कि ''नहीं, अच्छे खानदान के बच्चे फिल्मों में नहीं आते.'' कि तुम अच्छे खानदान के हो. तुम्हारे वालिद अजमेर शरीफ के नाजिम हैं. ये सब छोड़ दो. वापिस जाओ. अगर मुझमें हिम्मत होती तो मैं पूछता कि फिर आप कैसे आ गए फिल्मों में, अगर शरीफ खानदान के लोग फिल्मों में नहीं आते. लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई. उन्होंने मुझे घर भिजवा दिया. मुद्दत बाद कर्मा की शूटिंग के दौरान उनसे मुलाकात हुई. पर मैंने उन्हें वह वाकया याद दिलाने की कोशिश नहीं की.
वह लम्हा जब वालिद को आपके निकाह की खबर मिली.
मैं इतनी हरकतें कर चुका था. सिगरेट पीता, फिल्में देखता, आवारागर्दी, क्रिकेट का शौक. लेकिन शादी भी कर लूंगा, इसकी उम्मीद उन्हें न थी. फिर जब मेरी बेटी हुई तब बाबा गए मिलने. उस समय मैं दिल्ली में था. बड़े खुश हुए बेटी को देख के क्योंकि बेटी की उनको बहुत तमन्ना थी. हम पांच बेटे हुए. उन्हें बेटी चाहिए थी, जो मेरे जरिए उन्हें मिल गई. एक पैचअप वहां हुआ. पर बहुत देर न चला वो.
(एफटीआइआइ जाने पर) अल्काजी साहब ने आपको गद्दार कह दिया था.
उनकी वो बात बहुत चुभी थी मुझे. दरअसल (एनएसडी में) वे मुझे डायरेक्शन की तरफ खींचने में लगे थे, मैं ऐक्टर बनना चाह रहा था. मैं जिद करके वापस ऐक्टिंग कोर्स में आ गया. लेकिन कोर्स खत्म होने को आया तो खयाल आया कि अब मैं क्या करूंगा? क्योंकि वो खफा थे और मुझे रेपर्टरी कंपनी में लेने वाले नहीं थे. मुझे लगा कि फिल्म इंस्टीट्यूट जाना चाहिए. शायद कुछ काम मिले. कम से कम पेट तो भर सकूंगा. भले ही दो साल और लग जाएं. मैं सेलेक्ट हो गया. भाइयों ने मदद की. बाबा नाराज थे लेकिन दाखिले की फीस के 600 रुपए टेलीग्राफिक मनी ऑर्डर से भेजे. न जाने कहां से इकट्ठे किए होंगे उन्होंने.
आपका ऐक्टिंग प्रोसेस क्या है?
शुरू में मुझे लगता था कि किसी किरदार को गहराई में समझना, उसके नजदीक जाना जरूरी है. करते करते तजुर्बा हुआ. महात्मा गांधी, गालिब, आइंस्टाइन का रोल मिला तो मैंने सोचा कि इन किरदारों को भला समझ कैसे सकता हूं? बेकार की बात है. एक कैरेक्टर प्ले करने के लिए आपको उसे समझने, उसका साइको-एनालिसिस करने की जरूरत नहीं. वो कर क्या रहा है, उस पर गौर करें क्योंकि जो जज्बात पैदा होते हैं वो बरास्ते इससे होते हैं कि वह क्या कर रहा है. ऐक्ट शब्द का मतलब ही होता है-टू डू. करना. प्रिटेंड करना नहीं, करना. कोई और किरदार बन जाना नहीं.
आप मुगल बादशाह अकबर के रोल में हैं. रोल मिला तो क्या सोच रहे थे?
मैं फिक्रमंद था क्योंकि पृथ्वीराज कपूर जी ने अकबर का जो रोल किया है, वह लोगों के दिमाग में बैठ गया है कि अकबर ऐसे ही थे. मेरा न वैसा कद है न पर्सनैलिटी, न पृथ्वीराज जी जैसा आभामंडल. मैंने सोचा, ये रोल नहीं करूंगा क्योंकि तुलना होगी, मैं मारा जाऊंगा. लेकिन स्क्रिप्ट पढ़ने पर मैंने अपना इरादा बदल दिया क्योंकि स्क्रिप्ट में कोई भी ऐसी चीज नहीं थी जो पृथ्वीराज कपूर के परफॉर्मेंस या सलीम-अनारकली के चित्रण से मिलती हो. न कोई डायलॉगबाजी थी.
कैसा प्रतिसाद मिला?
लोगों ने तारीफ की कि अच्छा है. लेकिन सबकी अपनी-अपनी राय है. न मैं क्रिटिक्स की राय पर गौर करता हूं न किसी और की. मेरे खयाल से एक क्रिटिक की ओपिनियन उतनी ही जायज है जितनी एक टैक्सी ड्राइवर की. मैं जानना चाहूंगा कि उस तबके के लोगों ने ये देखा है कि नहीं.
ऐक्टर्स पोलिटिकल मुद्दों पर बोलने से बचते क्यों हैं?
क्योंकि असुरक्षा से भरे हैं. जिस स्तर के उत्पीड़न का सामना उन्हें करना पड़े, वो शायद मैं सोच भी न पाऊं. जो उत्पीड़न मुझे फेस करना पड़ता है वो तो बहुत कम है.
किस तरह का उत्पीड़न?
गालियों भरी चिट्ठियां. एक साहब ने मुझे पाकिस्तान जाने का टिकट भेज दिया. कमेंट्स भेजने वाले किराए के टट्टू हैं. पैसे मिलते हैं सरकार से कि उसको गालियां लिखो. दिनभर बैठे यही करते हैं. मैं उन्हें कोई तवज्जो नहीं देता. अगर प्रधानमंत्री मेरे बारे में कुछ बोलें तो शायद मैं सुनूंगा कि उन्होंने क्या कहा. पर वे मेरे बारे में क्यों कुछ कहेंगे.
कभी नरेंद्र मोदी सरकार, महाराष्ट्र सरकार की तरफ से ऐक्टिंग में आपके तजुर्बे का इस्तेमाल करने की पेशकश?
सुभाष घई साहब ने विस्लिंग वुड्स इंस्टीट्यूट बनाते वक्त मुझे बुलाया था. मैं खुशी खुशी उनके साथ हुआ. दो साल मौका मिला और मैं ऐक्टिंग का ऐसा विभाग स्थापित कर पाया जहां ऐक्टिंग सही तरीके से सिखाई जाए. लेकिन भारत सरकार की तरफ से कोई ऑफर नहीं आया, न ही महाराष्ट्र सरकार से.
कांग्रेस के राज में भी नहीं?
कांग्रेस के समय में आया था कि सरधना से (विधायकी के लिए) खड़े हो जाओ. मैंने हाथ जोड़ लिए. 20-25 साल पहले की बात है.
(कमेंट्स भेजने वालों को) मैं कोई तवज्जो नहीं देता. प्रधानमंत्री मेरे बारे में कुछ बोलें तो शायद मैं सुनूंगा. पर वे मेरे बारे में क्यों कुछ कहेंगे?''