बातचीत-''कांग्रेस वक्त की जरूरत है''
राकांपा सबसे मुश्किल दौर का सामना करती नजर आ रही है. हालांकि किरण डी. तारे के साथ बातचीत में मराठा दिग्गज और पार्टी अध्यक्ष शरद पवार बेफिक्र नजर आते हैं और इसे अपनी पार्टी में नई जान फूंकने का मौका बताते हैं. पेश हैं कुछ अंश:

आप बतौर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस के कामकाज को कैसा पाते हैं?
वे अच्छे हैं. लेकिन सरकार चला रहे शख्स को अच्छा प्रशासक भी होना चाहिए और राज्य के हर हिस्से का ख्याल रखना चाहिए. फडऩवीस ने समग्र विकास पर कभी ध्यान नहीं दिया. जब वे विपक्ष में थे तो अलग विदर्भ राज्य का आंदोलन चला रहे थे. अब वे कहते हैं कि विदर्भ के लोग तय करेंगे. बतौर मुख्यमंत्री उन्हें संयुक्त महाराष्ट्र के लिए खड़ा होना चाहिए.
क्या यह राकांपा के लिए मुश्किल दौर है? आपके कई नेता भाजपा और शिवसेना में चले गए हैं..
जो लोग केंद्र और राज्य की सत्ता में पहुंचे हैं, उनका विपक्ष के प्रति बदला लेने सरीखा रवैया है. उन्होंने (पूर्वाग्रहपूर्ण) जांच शुरू कर दी है और (कानूनी) कार्रवाई कर रहे हैं. जो लोग इसका मुकाबला करने में सक्षम नहीं थे, वे भाजपा या शिवसेना में शामिल हो गए.
उनके विकल्पों के बारे में क्या सोचते हैं?
ऐसा मेरे साथ दूसरी बार हुआ है. 1980 में मेरे साथ 62 विधायक थे. उनमें से 52 पार्टी छोडकऱ चले गए. लेकिन मैं लड़ा और नया युवा नेतृत्व खड़ा किया. अगले चुनाव में मेरे 73 विधायक जीते. इस बार भी मुझे भारी जन समर्थन मिल रहा है, खासकर युवाओं का. यह मेरे लिए नौजवानों को साथ लेकर पार्टी को फिर से खड़ा करने का अच्छा मौका है.
अस्सी साल की उम्र में आपकी पार्टी का सारा बोझ आपके कंधों पर ही नजर आ रहा है. युवा नेता कहां हैं?
मेरे युवा साथी अपने-अपने जिलों में ध्यान दे रहे हैं. मैंने पूरे राज्य की जिम्मेदारी ली है. मेरे साथ जयंत पाटिल, धनंजय मुंडे और अजित पवार हैं. मैं बाकी नेताओं के मुकाबले मीडिया में अधिक दिख जाता हूं.
कांग्रेस के बारे में आपकी राय क्या है? क्या पार्टी मरणासन्न हालत में है?
कांग्रेस आज वक्त की जरूरत है, उसकी जड़ें देश के हर राज्य में हैं. सियासी जीवन में झटके आते हैं. 1977 में कांग्रेस पस्त हो चुकी थी और मीडिया कह रहा था कि वह 25 साल तक सत्ता में नहीं आएगी. पर 1980 में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला. वैसा फिर होगा.
क्या आप किसी मौके पर राकांपा और कांग्रेस के विलय के बारे में सोचेंगे?
मैंने अपना करियर गांधी-नेहरू की विचारधारा के साथ शुरू किया था. मैं आज भी उसका आदर करता हूं. (कांग्रेस और राकांपा) साथ-साथ काम कर रही हैं, एक-दूसरे की मदद कर रही हैं. हमने विलय के बारे में नहीं सोचा है पर साथ काम करने से दोनों को लाभ हो रहा है.
हाल के वर्षों में भाजपा और शिवसेना के उभार के बारे में आप क्या सोचते हैं?
ऐसा होता है. असली भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की थी. उन लोगों ने अच्छी जमीन तैयार की, दूसरे फल खा रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी की स्वीकार्यता भी अलग थी.
आप अपने राजनीतिक जीवन के 50 वर्षों में 27 साल विपक्ष में रहे हैं. क्या यह दौर पहले से कुछ अलग है?
सिर्फ एक फर्क है—पहले की सरकारों में समझ थी कि लोकतंत्र के लिए विपक्ष भी जरूरी है. आज, कोई सरकार की सोच का विरोध करता है तो उसे राष्ट्र-विरोधी बता दिया जाता है.
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