जुर्म से दो-दो हाथ
राजकुमार हीरानी की यह पहली वेब सीरीज प्रीतम ऐंड पेड्रो साइबरक्राइम कॉमेडी थ्रिलर है, जिसे हॉटस्टार स्पेशल्स पर दिखाया जा रहा.

पॉपुलर फिल्मकार राजकुमार हीरानी किसी निर्देशक को फोन करें कि वह उनकी अकेली संतान के रुपहले पर्दे पर पदार्पण का निर्देशन करे, तो समझ लीजिए कि आपके काम ने उनके ऊपर अच्छी छाप छोड़ी है. हम अविनाश अरुण (किल्ला, पाताल लोक) की बात कर रहे हैं, जो जाने-माने सिनेमेटोग्राफर भी हैं.
वे हीरानी के लिए शूट करने का अपना सपना सच होते देख 'आश्चर्यचकित' थे. बेहद लोकप्रिय और धमाकेदार फिल्मों 3 ईडियट्स और पीके के लेखक-निर्देशक के बारे में अरुण कहते हैं, ''किसी फिल्मकार के लिए अपना अलग फॉर्म ईजाद करना मुश्किल होता है, लेकिन उन्होंने यह किया है. उनका हास्य गहरी हमदर्दी से उपजता है. यह न किसी को नीचा दिखाता है और न किसी को दूसरों से सयाना बनाकर पेश करता है. तभी यह दिलों को छूता है.”
हीरानी बताते हैं कि शो लिखे जाते वक्त वीर का नाम कतई तय नहीं था. लंदन के रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामैटिक आर्ट्स के छात्र वीर साइबर एक्सपर्ट की भूमिका के लिए कुछ ज्यादा युवा माने गए. मगर शो ज्यों-ज्यों आकार लेता गया, वीर ने दिलचस्पी दिखाई, हालांकि यह उन्होंने सीधे अपने पिता के सामने जाहिर नहीं की.
शो के प्रोड्यूसरों में से एक से उन्होंने कहा, ''तुम लोग इधर-उधर ढूंढ रहे हो, घर में ऐक्टर बैठा हुआ है.’’ मगर वीर को पिता से ज्यादा डायरेक्टर पर छाप छोड़नी पड़ी. यह उन्होंने स्टेज पर नाटक लेटर्स टु सुरेश में अपने प्रदर्शन और सिनेमा के प्रति जज्बे और जुनून से किया.
हीरानी की कई कृतियों की तरह यह शो भी प्यारी-सी मगर बेमेल शख्सियतों के इर्द-गिर्द घूमता है. एक रिटायरमेंट की कगार पर खड़ा पुलिस अफसर है, तो दूसरा जेन ज़ी का हैकर, जिसका बहुत कुछ निजी दांव पर लगा है.
हीरानी प्रीतम और पेड्रो को इन्वेस्टिगेटिव साइबरक्राइम थ्रिलर कहते हैं, जिसमें उनके हास-परिहास का छौंक लगा है और जो उस समाज के बारे में सोचने का मौका देता है जिसमें हम रचे-बसे हैं. फीचर फिल्में लिखने में तो हिरानी को पहले ही महारत हासिल है, इस शो ने उन्हें अपना हुनर नए फॉर्मेट के हिसाब से ढालने का मौका दिया. सारे तमाशे के बीच एक संदेश भी है, जो मजेदार ढंग से दिया गया है.
नाटक : सत्ता से सवाल
हबीब नागमोचिन का यह हैमलेट अनिर्णय से जूझते हुए भी करता है प्रतिष्ठान से प्रश्न
बड़ी संख्या में लोग आज भी हैमलेट को शेक्सपियर का श्रेष्ठतम नाटक मानते हैं. नियति, आकांक्षा, साजिश, प्रतिशोध. पिता का कत्ल कर राजा बन बैठे चाचा और उससे विवाह कर लेने वाली मां. कत्ल का प्रतिशोध लेता हैमलेट.
फ्रांसीसी रंगकर्मी और पीटर ब्रूक के सहयोगी रहे हबीब नागमोचिन ने हाल में इसे दिल्ली में श्रीराम सेंटर रंगमंडल के साथ हिंदी में खेला. तिनके भर का सेट नहीं, पूरा खाली स्टेज. बस जमीन पर कालीन. मूल कथ्य को लेकर चुस्त गति से बढ़ते दृश्य, खालिस हिंदुस्तानी में संवादों के साथ.
वस्त्र और रूपसज्जा भी कहने भर को. हैमलेट की धुरी अनिर्णय और ऊहापोह पर टिकी होने के बावजूद यह नायक सत्ता प्रतिष्ठान से आंखें मिलाकर सवाल कर रहा है. हैमलेट अक्सर होता ही रहा है पर यह अलग और गहराई से ध्यान खींचने वाला है. बेशक देखने लायक.
श्रीराम सेंटर रंगमंडल की नाट्य प्रस्तुति होने के कारण भविष्य में इसके शो दिल्ली या दूसरे शहरों में होंगे. उस दौरान इसे देखा जा सकता है.