उनके दिखने की पॉलिटिक्स
कान फिल्म फेस्टिवल में अवार्ड जीतने वाली अबिनाश बिक्रम शाह की पहली ही फिल्म 'एलिफैंट इन द फॉग' नेपाल के स्वतंत्र सिनेमा आंदोलन के लिए एक निर्णायक मोड़ मानी जा रही है

अबिनाश बिक्रम शाह कुछ वक्त आराम करना चाहते हैं. उनके मन में अपने अगले प्रोजेक्ट पर लौटने का ज्वार जो ठाठें मार रहा है. वे दशक भर से ठंडे बस्ते में पड़ी पटकथा को बनाने को बेसब्र हैं. इस साल नेपाली सिनेमा के लिए उन्होंने मील का पत्थर गाड़ दिया. उनकी डेब्यू फीचर फिल्म एलीफेंट इन द फॉग ने कान फिल्म फेस्टिवल में अन सर्टेन रिगार्ड जूरी पुरस्कार जीता: अंतरराष्ट्रीय सिनेमा की असाधारण प्रतिभा को दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित सम्मान.
यह नेपाल के दक्षिणी तराई इलाके के किन्ररों या ट्रांसजेंडर समुदाय की कहानी है. इसके केंद्र में उस समुदाय की मुखिया पिराती है, जिसकी एक बेटी के गुम होने से उसकी जिंदगी में उथल-पुथल मच जाती है. फिल्म थ्रिलर के रूप में गढ़ी गई है.
यह नेपाल के किन्नर समुदाय के भीतर अपनापे, विलगाव और जिंदा रहने की जद्दोजहद सरीखे मसलों की पड़ताल करती है. शाह ने इस समुदाय के सदस्यों को न केवल अदाकारी बल्कि फिल्म के प्रोडक्शन से भी जोड़ा है, वह इस किस्सागोई को अनोखा और खास बना देता है. यह उनके लिए एक किस्म की निजी फतह है.
शाह कहते हैं, ''गहराई न हो तो फिर दिखने का कोई अर्थ नहीं. फिर तो यह महज दिखावे और राजनैतिक चर्चा का विषय बनकर रह जाता है. मैं हर कीमत पर इससे बचना चाहता था.’’ फिल्म के जरिए वे नेपाल में लैंगिक अधिकारों में असमानता की झलक दिखाना चाहते थे.
उनके देश ने समलैंगिक विवाहों को 2023 में वैधता तो दे दी लेकिन इसी अप्रैल में, शाह की कान में जीत से चंद दिनों पहले, अधिकारियों ने ट्रांसजेंडर्स के उन आवेदनों पर कार्यवाही रोक दी जो दस्तावेजों में लिंग बदलवाने के लिए दिए गए थे.
शाह की फिल्म इसी कमी पर उंगली रखती है. सीधे नीति पर बहस करने के बजाय यह उस समाज के भावनात्मक और शारीरिक नतीजों को दिखाती है जो अधिकारों का वादा तो करता है लेकिन व्यवहार में अक्सर गरिमा प्रदान करने से इनकार कर देता है.
उन्होंने समुदाय के भीतर रचने-बसने में दो साल लगाए. शाह कहते हैं, ''मेरे लिए बहुत जरूरी था कि मैं अपने विशेष अधिकारों और पूर्व धारणाओं से बिल्कुल बाहर निकलूं.’’ इसके लिए कोई शॉर्टकट. नेपाल के सिनेमाघरों में फिल्म सितंबर में रिलीज होने की उम्मीद है. शाह को लगता है कि भारत में भी लोग इसे स्वीकारेंगे. वे कहते हैं, ''कला सबके लिए है. सभी इसमें हिस्सा ले सकें, इसकी जगह होनी चाहिए.’’