स्मृति, हिंसा और करुणा के बीच हान कांग
हान कांग ने अपनी नई पुस्तक लाइट ऐंड थ्रेड में बताया है कि लेखक वह है जो रोशनी को उन जगहों तक पहुंचाने की कोशिश करता है, जहां उसकी सबसे अधिक जरूरत है.

- आशुतोष कुमार ठाकुर
कुछ किताबें अपने कथ्य से ज्यादा अपनी संवेदना के कारण याद रह जाती हैं. वे पाठक पर अचानक प्रभाव नहीं डालतीं, बल्कि धीरे-धीरे उसके भीतर जगह बनाती हैं. हान कांग की नई पुस्तक लाइट ऐंड थ्रेड ऐसी ही कृति है.
हान कांग पिछले दो दशकों में विश्व साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण आवाजों में शामिल हुई हैं. द वेजिटेरियन, ह्यूमन एक्ट्स, द व्हाइट बुक और ग्रीक लेसंस जैसी कृतियों ने उन्हें एक ऐसे लेखकीय व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया जो हिंसा, इतिहास, शरीर और स्मृति के बीच मौजूद जटिल संबंधों को गंभीरता से देखता है.
लाइट ऐंड थ्रेड उनकी पहली बड़ी कथेतर पुस्तक है, जो अंग्रेजी में उपलब्ध हुई है. माया वेस्ट, ई. यावॉन और पैज अनियाह मॉरिस अनूदित इस पुस्तक में निबंध, कविताएं, डायरी के अंश, तस्वीरें और उनका नोबेल व्याख्यान आदि शामिल हैं.
पुस्तक का शीर्षक बचपन में लिखी गई एक कविता से आया है. हान कांग ने आठ वर्ष की उम्र में एक सुनहरे धागे की कल्पना की थी, जो एक मनुष्य के हृदय को दूसरे मनुष्य के हृदय से जोड़ता है. यही धागा पूरी पुस्तक का केंद्रीय रूपक बन जाता है.
हान कांग के लिए साहित्य वही अदृश्य धागा है. बहुत नाजुक लेकिन जरूरी. इसीलिए उनके लेखन में करुणा का स्वर लगातार उपस्थित रहता है, लेकिन वह कभी भावुकता में नहीं बदलता.
इस पुस्तक का सबसे प्रभावशाली प्रसंग उनके घर के छोटे-से आंगन का है. आंगन उत्तर दिशा की ओर खुलता है, इसलिए वहां धूप सीधे नहीं आती. पौधों तक रोशनी पहुंचाने के लिए हान कांग दिनभर अलग-अलग जगहों पर आईने रखती हैं.
धीरे-धीरे यह दृश्य लेखन का रूपक बन जाता है. हान कांग की दृष्टि में लेखक वह है जो रोशनी को उन जगहों तक पहुंचाने की कोशिश करता है, जहां उसकी सबसे अधिक जरूरत है. यही बात इस पुस्तक को साधारण आत्मकथात्मक लेखन से अलग करती है.
यहां निजी अनुभव भी व्यापक मानवीय संदर्भ ग्रहण कर लेते हैं. पौधों की देखभाल, कमरे में बदलती रोशनी, दीवारों पर पड़ती छाया, बारिश, ठंड, अनिद्रा और बीमारी, सब कुछ धीरे-धीरे साहित्य और जीवन के बड़े प्रश्नों से जुड़ने लगते हैं.
लाइट ऐंड थ्रेड का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वह इतिहास को निजी जीवन से अलग करके नहीं देखती. ग्वांगजू नरसंहार की स्मृति इस पुस्तक के भीतर लगातार मौजूद रहती है. हान कांग लिखती हैं कि उन तस्वीरों को देखने के बाद उनका लेखन बदल गया. उन्हें लगा कि वास्तविकता उनसे एक दूसरी भाषा की मांग कर रही है. यहीं से पुस्तक का नैतिक पक्ष उभरता है.
क्या भाषा दुख को ठीक तरह से व्यक्त कर सकती है? क्या साहित्य इतिहास के सामने मनुष्य की गरिमा को बचा सकता है? क्या लेखक की कोई जिम्मेदारी मृत लोगों के प्रति भी होती है? हान कांग इन प्रश्नों के आसान उत्तर नहीं देतीं. वे उनके भीतर बनी रहती हैं. शायद यही कारण है कि उनका लेखन विश्वसनीय लगता है. उसमें वैचारिक घोषणा की जगह नैतिक गंभीरता है.
पुस्तक में शामिल उनका नोबेल व्याख्यान भी इसी दृष्टि को आगे बढ़ाता है. वहां पुरस्कार से ज्यादा साहित्य की सीमाओं और जिम्मेदारियों पर विचार है. हान कांग साहित्य को एक सतत मानवीय प्रयास की तरह देखती हैं.
कुछ पाठकों को यह पुस्तक बहुत धीमी या बिखरी हुई लग सकती है. इसमें पारंपरिक कथात्मक प्रवाह नहीं है. कई हिस्से अधूरे नोट्स की तरह दिखाई देते हैं. लेकिन यही इसकी संरचना है. स्मृति हमेशा क्रमबद्ध नहीं होती. मनुष्य अपने अनुभवों को पूरी तरह समझ भी नहीं पाता.
हान कांग इस अधूरेपन को स्वीकार करती हैं. और शायद यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति है.
हान कांग हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य अभी भी मनुष्य के भीतर बची हुई संवेदना को बचाए रखने का माध्यम हो सकता है. वे हमें यह भी याद दिलाती हैं कि कई बार सबसे महत्वपूर्ण काम रोशनी पैदा करना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा में मोड़ना होता है.
पुस्तक का नाम: लाइट ऐंड थ्रेड
लेखक: हान कांग
प्रकाशक: हैमिश हैमिल्टन
कीमत: 799 रु.