जिसने दिल्ली का चराग जलाए रखा

रज़ीउद्दीन अकील की पुस्तक हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अपने शुरूआती पन्ने से स्मरण कराती है कि भारतीय उपमहाद्वीप की मध्यकालीन सूफी परंपरा की आत्मा ठीक इसके विपरीत थी.

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया पुस्तक का कवर
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया पुस्तक का कवर

धर्म को जब विभाजन के औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा हो तब रज़ीउद्दीन अकील की पुस्तक हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अपने शुरूआती पन्ने से स्मरण कराती है कि भारतीय उपमहाद्वीप की मध्यकालीन सूफी परंपरा की आत्मा ठीक इसके विपरीत थी. दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इतिहासकार रज़ीउद्दीन अकील दिल्ली सल्तनत और सूफी साहित्य के स्कॉलर हैं.

इस पुस्तक की बुनियाद वे फवाइद-उल-फुआद पर रखते हैं जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (1238-1325) की आध्यात्मिक बातचीतों यानी मलफूजात का वह प्रामाणिक संकलन है जिसे उनके प्रिय शिष्य और कवि अमीर हसन सिजज़ी ने लगभग पंद्रह सालों की साधना के बाद संकलित किया था. यही वजह है कि किताब केवल इतिहास का पुनर्पाठ नहीं रह जाती. वह धीरे-धीरे एक जीवित अनुभव में बदलने लगती है.

पढ़ते हुए कई बार लगता है कि पाठक दिल्ली की उसी खानकाह में बैठा है, जहां धूप की धीमी परतों और फकीराना सन्नाटे के बीच निज़ामुद्दीन औलिया अपने मुरीदों से मुखातिब रहे. कहीं फारसी अशआर हैं, कहीं नैतिक दृष्टांत, कहीं साधारण मनुष्य के दुख-दर्द से उपजी व्यावहारिक बुद्धि.

अपने विन्यास में किताब पारंपरिक जीवनी की तरह कालक्रम का अनुसरण नहीं करती बल्कि विषयों के सहारे निज़ामुद्दीन की जीवन-दृष्टि के आयाम खोलती है. रोजे, गरीबों को भोजन कराने की परंपरा, स्त्रियों का सम्मान, सूफी संगीत, समा और कव्वाली, फारसी कविता आदि पर केंद्रित अध्याय धीरे-धीरे एक ऐसी शख्सियत की छवि निर्मित करते हैं, जिसने धार्मिकता को कर्मकांड में नहीं बल्कि खिदमत-ए-खल्क यानी मनुष्य और समस्त सृष्टि की सेवा में देखा.

बदायूं में जन्मे और दिल्ली में रहे निज़ामुद्दीन औलिया का जीवनकाल दिल्ली सल्तनत के कई उतार-चढ़ावों का गवाह रहा. कई सुल्तानों के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण और टकराव भरे रहे. गयासुद्दीन तुग़लक के कोर्ट में उनकी जबरन पेशी तक हुई.

उनका यह कहना, ''मेरे घर में दो दरवाजे हैं. यदि सुल्तान एक से प्रवेश करेगा तो मैं दूसरे से निकल जाऊंगा’’, सत्ता से दूरी बनाए रखने वाली आध्यात्मिक स्वतंत्रता के उद्घोष के तौर पर पढ़ा जाना चाहिए. किताब में ऐसे कई प्रसंग हैं.

स्त्रियों पर केंद्रित अध्याय पुस्तक को एक अतिरिक्त ऊष्मा और विस्तार देते हैं. प्रारंभिक सूफी संत राबिया-अल-बसरी और दिल्ली की प्रभावशाली शख्सियत बीबी फातिमा साम से जुड़े प्रसंग पुस्तक के आलोकित हिस्से हैं.

हालांकि इस तरह की पुस्तकें जब प्रोफेसर लिखते हैं तो अकादमिक बने रहने का खतरा रहता है. ऐसे में सामान्य पाठक क्या उसमें रुचि लेगा, इसकी आशंका रहती है. यहां भी यही हुआ. अकादमिक विस्तार कई जगह बहुत व्यापक हो गया है.

इसके बावजूद इसका महत्व है क्योंकि यह सूफीवाद को जीने की लिखावट है. उस सांस्कृतिक विरासत का स्मरण भी जिसके जमातखाने के दरवाजे सभी धर्म के अनुयायियों के लिए खुले रहे और जिसने भारतीय समाज को प्रेम, सह-अस्तित्व और मनुष्यता की भाषा सिखाई.

पुस्तक का नाम: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया 
बिलवेड ऑफ गॉड
लेखक: रज़ीउद्दीन अकील
पब्लिकेशन: पैन मैकमिलन 
कीमत: 599 रुपए.

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