मराठी फिल्मों की बहार
उनके पास न ज्यादा पैसा है और न ही बॉलीवुड सरीखे नामी सितारे. इसके बावजूद अपनी दमदार कहानियों और जानदार किरदारों के बूते मराठी फिल्में कमर्शियली कामयाब हो रहीं. आलोचक भी तारीफ कर रहे

एक दूसरे से अनबन रखने वाली दो बहनें कैंसर का कहर झेल रही अपनी उस मां की देखभाल के लिए साथ आती हैं जो अपने सीने में गहरा राज छिपाए है. भारी कलह और झगड़े के बाद अलग हुआ एक युगल तोक्यो में एकाएक आमने-सामने आ जाता है और फिर उन सचाइयों से टकराता है जिनकी वजह से वे अलग हुए थे.
पिता और बेटा जब स्वीकार कर लेते हैं कि उनकी पत्नी और मां उन्हें छोड़कर चली गई है, तभी उन्हें पता चलता है कि वह तो अब आदमी है. एक प्रसिद्ध मराठा शासक मुस्लिम दुश्मनों से लड़ता है और अपनी प्रजा का परिचय स्वराज्य की अवधारणा से करवाता है.
ये 2026 के पहले पांच महीनों में रिलीज हुई उन चार फिल्मों—तिघी (तीन औरतें), तो ती आणि फुजी (वह पुरुष, स्त्री और फुजी), बाप्या, और राजा शिवाजी—की थीम हैं जिन्होंने छाप छोड़ी और हलचल पैदा की है. बॉलीवुड भले ही विशाल बजट और भरोसे लायक सितारों के दम पर इस क्षेत्र का उस्ताद हो, लेकिन दमदार कहानियों और जानदार किरदारों के दम पर मराठी सिनेमा आहिस्ता-आहिस्ता और लगातार छाप छोड़ रहा है.
तिघी से फिल्म निर्देशन में पहला कदम रखने वाली जिजीविषा काले का कहना है कि मराठी सिनेमा की अपील हमेशा उसकी 'प्रगतिशील धारा’ में रही है. वे कहती हैं, ''यही वजह है कि तिघी सरीखी कहानी लेकर आते हुए मैं इतनी सहज थी.’’
काले की आत्मविश्वास से भरी यह पहली फिल्म बच्चों के साथ यौन बदसलूकी, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और सदमे से गुजरने सरीखे मुद्दों से टकराती है. इसमें भारती आचरेकर ने मां और नेहा पेंणसे और सोनाली कुलकर्णी ने उनकी बेटियों के किरदार में बहुत सधा हुआ अभिनय किया है. यह मां-बेटियों के रिश्तों की नाटकीय कहानी भर नहीं है.
उससे कहीं ज्यादा यह औरतों के रोजमर्रा के अनुभवों को पकड़ती है. काले कहती हैं, ''तुम्हें पता है कि तुमको अलग ढंग से देखा जा रहा है. नजर रखी जा रही है कि तुम उन लोगों के सामने कैसे बात करती हो जिनके साथ तुम बड़ी हुईं. जब लोगों को पता होता है कि परिवार में कुछ हुआ है लेकिन उस पर विश्वास नहीं करना चुनते हैं, तो हमेशा फुसफुसाहटें होती हैं.’’
बहुत कुछ तिघी की तरह ही लेखक-निर्देशक मोहित ताकलकर की तो ती आणि फुजी भी आधुनिक रिश्तों की जी हुई सचाई से प्रेरित है. इसमें अदाकार ललित प्रभाकर और मृणमयी गोडबोले रंजिशजदा जोड़े का किरदार निभा रहे हैं और बरसों बाद अपने रिश्ते पर विचार करते हैं.
ताकलकर कहते हैं, ''रिश्ते आज महत्वाकांक्षा, करियर, प्रवास, अकेलेपन, भारी डिजिटल दबाव, लैंगिक भूमिकाओं में बदलाव से समझौता कर रहे हैं...मैं जिसकी पड़ताल करना चाहता था वह प्रेम की शुरुआत नहीं थी, बल्कि यह था कि रिश्तों की प्रगाढ़ता शांत होने के बाद क्या होता है. नाकाम रिश्ता जरूरी नहीं कि झूठा रिश्ता हो.’’
सादगी की ताकत
समीर तिवारी बाप्या की पटकथा लेकर दो साल घूमते रहे. वे उस महिला की कहानी को स्वीकार करने वाले की खोज में थे जो आदमी में बदल जाती है. शुरुआत में उन्होंने यह फिल्म हिंदी में बनाने पर विचार किया. लेकिन जरा आगे नहीं बढ़ पाए. आखिरकार इसे मराठी में बनाया और प्रोड्यूस किया.
वे कहते हैं, ''हिंदी सिनेमा भव्यता पर खेलता है जिसमें हर चीज तड़क-भड़क से भरी होती है. मराठी कहीं ज्यादा निजी और अंतरंग है. इसमें इतनी प्यारी, सीधी-सादी और भावनात्मक कहानियां हैं. मराठी दर्शक भी इसे खुले दिल से स्वीकार करते हैं.’’ बाप्या को तो उन्होंने स्वीकार किया ही. इसकी सुरम्य कोंकण पृष्ठभूमि और हास-परिहास के प्रयोग ने विषय को सहज और सुगम बना दिया.
गिरीश कुलकर्णी, राजश्री देशपांडे, श्रीकांत जाधव और देविका दफ्तरदार सरीखे कुशल अदाकारों ने उन किरदारों को बखूबी पर्दे पर उकेरा जिनमें हर वह चीज नुमाया थी जिसे तिवारी समाज में देखने की उम्मीद करते हैं. यह दिखाती है कि संकीर्ण सोच की सबसे अच्छी काट प्यार है. वे यह भी कहते हैं, ''बाप्या नॉन-जजमेंटल होने के बारे में है.’’
मराठी सिनेमा का 2026 में इतनी जोरदार रचनात्मकता के साथ उभार अचानक नहीं है. पिछले साल ही ऐसी फिल्मों की बाढ़ देखी गई जिन्होंने नया और स्वागतयोग्य नजरिया पेश किया. रोहन कनावड़े की पहली निर्देशित फिल्म साबर बोंडा (कैक्टस नाशपाती) ऐसे समलैंगिक आदमी की कहानी है जो पैतृक गांव में बचपन के दोस्त के साथ अपने रिश्तों को फिर जागृत कर लेता है.
इस फिल्म ने सनडांस फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी. अभिनेता शिवराज वाइचल ने अपनी पहली फीचर फिल्म आता थांबायचा नाहि (अब कोई रोकने वाला नहीं) से निर्देशक का बाना सफलता के साथ पहना.
मराठी सिनेमा उस विरासत से ओतप्रोत रहा है जो दादासाहब फाल्के और वी. शांताराम सरीखे महान फिल्मकारों से आई है और जिसमें उमेश कुलकर्णी, नागराज मंजुले और रवि जाधव सरीखे निर्देशकों ने हाल के सालों में अपनी छाप छोड़ी. इंडस्ट्री ने पहली बार श्वास (2004) से देशभर का ध्यान खींचा था. यह दादा और उनके दृष्टिबाधित पोते की मार्मिक कहानी थी, जिसने ऑस्कर में विदेशी फिल्म के वर्ग में भारत की नुमाइंदगी की.
मुश्किलें और संभावनाएं
धन जुटाने की चुनौती फिर भी बनी हुई है. ताकलकर कहते हैं, ''मराठी सिनेमा के साथ मसला लंबे वन्न्त के सहारे का है. छिटपुट उत्कृष्टता को फलता-फूलता उद्योग नहीं समझा जा सकता. मराठी सिनेमा के भीतर दर्शकों, सिनेमाघरों के सहयोग, बजट और प्रचार-प्रसार को लेकर बहुत ज्यादा फिक्र है.’’
तमिल, तेलुगु और मलयालम फिल्मों के विपरीत मराठी फिल्में एक और रुकावट का सामना करती हैं. वह है सीमित भौगोलिक पहुंच. उनका बॉलीवुड से मुकाबला है, जो फिल्मों की भारी संख्या, स्टार पावर और कद्दावर कहानियों के दम पर पर्दे हड़प लेता है.
जी5 के अलावा दूसरे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्मों ने मराठी मनोरंजन के पारिस्थितिकी तंत्र की अभिव्यक्तियों में निवेश नहीं किया, चाहे फीचर फिल्में हों या लंबे फॉर्मेट की किस्सागोई. काले कहती हैं, ''अगर लोग सबटाइटल के साथ कोरियाई फिल्में देख सकते हैं, तो वे मराठी फिल्में भी देख ही सकते हैं.’’
अलबत्ता क्षितिज पर उम्मीद दिखाई देती है. मराठी ज़ी5 की बिजनेस हेड हेमा वी.आर. का कहना है कि मराठी फिल्मों के दर्शक कर्नाटक, गुजरात, गोवा, तेलंगाना और दिल्ली में बढ़ रहे हैं. उद्योग के 'सार्थक कंटेंट’ से ग्राहकों की संक्चया में 38 फीसद का उछाल आया है. वे कहती हैं, ''यह असल बदलाव का संकेत है.’’
रितेश देशमुख की मुंबई फिल्म कंपनी ने दिखा दिया कि मराठी फिल्में खासा धन बटोर सकती हैं, खासकर जब लाई भारी (2014) और वेद (2022) के बाद राजा शिवाजी अब तक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली मराठी फिल्म बन रही है.
इस बीच अपनी दिल तोड़ देने वाली कहानी सैराट (2016) से लोगों के दिलों को छूने वाले नागराज मंजुले जियो स्टूडियोज की बड़ी मराठी पेशकशों में से एक खाशाबा का निर्देशन कर रहे हैं. यह स्वतंत्र भारत के लिए पहला व्यक्तिगत ओलंपिक पदक जीतने वाले उस पहलवान की जिंदगी पर आधारित है जिनके नाम पर फिल्म का नामकरण है. मंजुले सैराट की उपलब्धि को दोहराते हुए अखिल भारतीय मराठी फिल्म बनाने की उम्मीद कर रहे हैं.
ताकलकर कहते हैं, ''मराठी सिनेमा का भविष्य हिंदी सिनेमा का छोटा संस्करण बनने में नहीं है, बल्कि अपनी ही आवाज में ज्यादा विशिष्ट, भावनात्मक रूप से ज्यादा समकालीन और ज्यादा निर्भीक बनने में है.’’
आ रहीं देखने लायक मराठी फिल्में
खाशाबा
बॉलीवुड में उनका जाना उतना कामयाब नहीं रहा. लिहाजा नागराज मंजुले मराठी सिनेमा में लौट आए हैं. तमाम मुश्किलों के बावजूद 1952 में भारत के लिए पहला व्यक्तिगत ओलंपिक पदक जीतने वाले सतारा (महाराष्ट्र) के पहलवान खाशाबा जाधव की अविश्वसनीय लेकिन अल्पज्ञात कहानी वे पर्दे पर उकेर रहे हैं. इसमें प्रोजेन्न्ट में संगीतकार अजय-अतुल उनके साथ हैं.
रावसाहेब
निर्देशक निखिल महाजन लेखक प्राजक्त देशमुख, श्रीपाद देशपांडे और जिजीविषा काले के साथ मिलकर वन अधिकारियों और वन्यजीवन माफिया के बीच लड़ाई से जुड़ी एक थ्रिलर फिल्म बना रहे हैं.
मर्दिनी
श्रेयस तलपड़े और उनकी पत्नी दीप्ति वह फिल्म प्रोड्यूस कर रहे हैं जिसे चौतरफा घिरी और अंतत: पलटकर वार करने वाली मां के बारे में इंटेंस ड्रामा फिल्म बताया जा रहा है. प्रार्थना बेहरे, जितेंद्र जोशी और मायरा वैकुल की अदाकारी से सजी यह फिल्म अजय बैकर निर्देशित पहली फीचर फिल्म है. उन्हें मराठी टेलीविजन पर अपने काम के लिए जाना जाता रहा है.
एकटी
कारखानेसांची वारी का सह-लेखन और निर्माण करने वाली सिनेमेटोग्राफर अर्चना बोरहाड़े इस ड्रामा फिल्म की निर्देशक हैं. इसमें सखी गोखले ने मीरा का किरदार अदा किया है, जो फिल्मकार है और टूटे रिश्ते से संभलने के लिए एक तटवर्ती गांव में लौट जाती है, जहां बेचैन करने वाले रहस्य उसके सामने आते हैं.