वे केवल खबर नहीं लिखती थीं...
बड़ी आई पत्रकार! पुस्तक में दर्ज हैं दस स्त्रियों की असाधारण कामों की कहानी

मार्च 2023 की एक दोपहर. उत्तर प्रदेश के बांदा शहर में एक छोटा-सा कमरा. गुलाबी रंग की दीवारें. सीमेंट की अलमारी. फर्श पर बिछे पतले गद्दे. बाहर मंदिरों की चोटियां और लहराते भगवा झंडे. कमरे में बीच टेबल पर लैपटॉप रखा है. कुल दस स्त्रियां मौजूद हैं. कुछ साथ बैठी हैं. कुछ मोबाइल स्क्रीन के जरिए जुड़ी हुईं.
कोई दिल्ली से, कोई अपने गांव से, कोई अस्पताल के कमरे से. वे वहां केवल बातचीत करने नहीं जुटीं. वे अपने उन असाधारण कामों को याद कर रही हैं जो बड़ी आई पत्रकार! पुस्तक में दर्ज हैं. 21वीं सदी की पत्रकारिता पर लिखी गई यह उन दुर्लभ पुस्तकों में से एक है जो शोर के भीतर मौन रचती हैं.
बात सन् 2002 की है जब बुंदेलखंड की जमीन से एक अखबार निकला था, खबर लहरिया. नाम ही अपने आप में कविता है. यह कोई महानगरीय न्यूजरूम से निकला चमकदार प्रयोग नहीं था. यह इन्हीं स्त्रियों का अखबार था जो कभी साक्षरता अभियानों में पढ़ना-लिखना सीख रही थीं. दलित स्त्रियां. पिछड़ी जातियों की स्त्रियां.
अल्पसंख्यक समुदाय की स्त्रियां. वे स्त्रियां जिन्होंने शामों और समुद्रों के रंग नहीं देखे. जिन्होंने आत्महत्या तक की कोशिश की और जो सुबह पच्चीस किलो गेहूं पीसने के बाद खबर लिखने बैठ जाती थीं. शायद पत्रकारिता भी वहीं से जन्म लेती है, जहां जीवन सबसे अधिक कठिन होता है.
पुस्तक की शुरुआत में दो पन्नों का हाथ से बनाया गया टाइमलाइन-चित्र है, जैसे किसी गांव की दीवार पर लोक चित्रकारी हो. उसमें खबर लहरिया की दो दशकों की यात्रा दर्ज है. 2002, शुरुआत. 2003, पहली लेखन कार्यशाला. 2004, चमेली देवी जैन पुरस्कार. फिर यूनेस्को सम्मान. नए एडिशन. वेबसाइट लॉन्च. पहली बार समुद्र दर्शन और फिर एक दिन अखबार बंद होना.
यह किताब पत्रकारिता को किसी प्रेरणात्मक पोस्टर में नहीं बदलती. यह बताती है कि पत्रकार होना सिर्फ सत्ता से सवाल पूछना नहीं बल्कि अपने ही जीवन से लगातार जूझना भी है.
पुस्तक में छह पाठ हैं: पत्रकार होना, पत्रकार की देह, फील्ड पर पत्रकार, ग्रामीण पत्रकारिता का मजा, पत्रकारिता का बिजनेस, हमारी ईंट-हमारा गारा. इन शीर्षकों के भीतर है स्मृतियों की वह कच्ची आंच जो हर पन्ने से उठती रहती है. कहीं कीचड़ से भरे रास्ते हैं. कहीं पेंशन के लिए वर्षों से भटकती विधवाएं. कहीं 'उन औरतों’ की तरह देखे जाने का संशय. कहीं देर रात घर लौटती एक रिपोर्टर का भय कि क्या वह गुस्सा होगा? कहीं मारेगा तो नहीं?
दिशा मलिक के साथ गीता, हर्षिता, कविता, लक्ष्मी, ललिता, मीरा, नाज़नी, श्यामकली, सुनीता की ये कहानियां पहले हिंदी, बुंदेली और कभी अवधी में बोली गईं फिर उन्हें लिखित रूप दिया गया. फिर अंग्रेजी में अनुवाद हुआ. फिर हिंदी में अनुवाद जो स्मिति ने किया है. हिंदी अनुवाद और बेहतर हो सकता था. अल्पविराम के अतिरिक्त प्रयोगों से बचा जाना चाहिए, खासकर हिंदी में.
यह किताब भारतीय लोकतंत्र के उस भूगोल की किताब है, जहां अब भी आवाज उठाना एक जोखिम है. जहां जाति न्यूजरूम तक का पीछा करती है. जहां औरतों को 'अपनी जगह’ याद दिलाई जाती है और वे उसी जगह से निकलकर कैमरा, मोबाइल और नोटबुक लेकर दुनिया को और उसी बहाने कभी-कभार अपनी जैसी कहानियों को रिपोर्ट करने चली जाती हैं.
पुस्तक का नाम: बड़ी आई पत्रकार!
लेखिका: दिशा मलिक और नौ अन्य
प्रकाशन: साइमन ऐंड शूस्टर
कीमत: 399 रुपए