प्रश्नों का पहनावा

अमेरिकी ड्रामा फिल्म 'द डेविल वियर्स प्रादा 2' ताजा दौर में फैशन और पत्रकारिता दोनों के भीतर के संकट और साथ ही उनकी आर्थिकी और सियासत को नितांत जैविक ढंग से दिखाने की कोशिश करती है

Cinema/The Devil Wears Prada 2
मेरिल स्ट्रीप और एनी हाथवे फिल्म के एक दृश्य में

यह दिलचस्प है. आप हॉलीवुड के कुछ चमकते सितारों से लैस एक फिल्म इस मकसद से देखने जाते हैं कि कुछ क्वालिटी एंटरटेनमेंट होगा. लेकिन कहानी सामने खुलने पर आपके कान और दीदे फैलने लगते हैं. अरे! यह तो अपने पेशे का, बल्कि घर-आंगन का किस्सा दिखता है.

मैगजीन जर्नलिज्म की आज की मुश्किलों और उसके भीतर की खैंचातानी पर बात चल रही है. पृष्ठभूमि बेशक फैशन की दुनिया है. फैशन मैगजीन रनवे की हालत डगमग है. प्रिंट ऑर्डर घट रहा है, नए रीडर बनाना मुश्किल हो गया है.

कंटेंट ऑनलाइन पुश करना पड़ रहा है. उसकी संपादक मिरांडा प्रीस्टली (मेरिल स्ट्रीप) खतरे की जद में हैं. साख बचाने के लिए मालिकान मिरांडा से मशविरा किए बगैर न्यूयॉर्क मिरर अखबार की हुनरमंद जर्नलिस्ट एंडी सैक्स (एनी हाथवे) को फीचर एडिटर बनाकर लाते हैं, जिसकी पूरी टीम अभी-अभी खोजी पत्रकारिता के लिए अवार्ड लेने के दौरान ही छंटनी का शिकार हुई है.

यहीं पर यह फिल्म बीस साल पहले आई अपनी प्रीक्वल का सिरा पकड़कर उसकी स्मृतियों और उसके तनाव के साथ आगे बढ़ती है. जुझारू जर्नलिस्ट बनने का सपना लिए घूमती एंडी एक्सपीरिएंस और संपर्क-संबंधों के वास्ते मिरांडा की असिस्टेंट बन जाती है. सोच आगे मुख्य धारा की जर्नलिज्म में ही जाने की है.

फैशन की सतही समझ पर रनवे के स्टॉफ में उसका मजाक भी बनता है: ''दादी का लबादा पहनकर आ गई दिखती है...हा हा हा हा.’’ पर कहानी तो यह मिरांडा की ही है. गुरूर से लदी, कांइयां और सीधी-सी बात भी तंजिया अंदाज में कहने वाली. उसी की शतरंजी चौसर पर सहकर्मी एमिली से प्रतिस्पर्धा में फंसी एंडी ने रनवे को अलविदा कहा था.

अब उसी मिरांडा से फिर साबका! करियर की ढलान पर होने के बावजूद प्रोफेशनल वजूद बचाने के लिए पहले से ज्यादा स्मार्ट. दूसरी ओर पेशे के अनुभवों और जिंदगी के थपेड़ों से सुर्खरू हुई, दिल से अभी भी पत्रकारिता को लेकर प्रतिबद्ध एंडी. लेकिन अब गंभीर किस्म का कुछ भी लिखने पर उसे रीडर नहीं मिल रहे. एडिटोरियल टीम पर लगातार एडवर्टाइजर्स को खैंचकर लाने का, उनके मन मुताबिक कुछ भी करने का दबाव है.

हर किसी को नए 'आकर्षक’ आइडियाज की बेसब्री से तलाश है. ऐसे में सिलिकॉन वैली की, अरसे से पब्लिक लाइफ से दूर, एक अरबपति सशा बर्नेस के इंटरव्यू का जुगाड़ करके एंडी अपने थोड़े नंबर बढ़ाती है. इस बीच मालिकाने के स्तर पर भी उथल-पुथल है. रनवे की मूल कंपनी ही बार-बार खरीदी-बेची जा रही है.

झल्लाई और पस्त एंडी मिरांडा की सफेद-स्याह जिंदगी पर किताब लिखने के एक पब्लिशर के ऑफर को लेकर उधेड़बुन में है. मिरांडा को हर जगह के छोटे-बड़े दांव-पेच की रत्ती-रत्ती खबर है. दोनों का करियर अगल-बगल के रेल और सड़क मार्ग जैसा है. साथ चलता पर बीच-बीच में एक-दूसरे को काटता हुआ.

दरअसल, यह फैशन की दुनिया की एक तरह की आंखों देखी है, जो अमेरिकी लेखिका लॉरेन वेसबर्गर के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है. लॉरेन उस संसार की खबर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय पत्रिका वोग की संपादक एना विंटर की असिस्टेंट थीं. मिरांडा और एंडी का किरदार, सच पूछिए तो इन्हीं दोनों का है. कल्पना और यथार्थ को एक तल पर लाते हुए वोग के मई 2026 के अंक के कवर पर एना विंटर और मिरांडा बनीं मेरिल स्ट्रीप की फोटो भी छपी है.

द डेविल वियर्स प्रादा का दो हिस्सों में चार घंटे का पूरा यह प्रोजेक्ट शायद ही कहीं आपका ध्यान भटकने देता है. पहनावे और पत्रकारिता के भीतर यह 180 डिग्री पर घूमकर पूरे ब्योरों के साथ उसकी पूरी एक कमेंट्री पेश करता, उसे चर्चा के लिए खोलता है. उस दुनिया की आर्थिकी और सियासत को संज्ञान में लेते हुए.

लॉरेन के लिखे को एलिन बॉश मैकेना ने जिस अंतर्दृष्टि के साथ स्क्रीनप्ले में उतारा है, वह एक उपलब्धि है. निर्देशक डेविड फ्रैंकेल ने बीस साल के फासले के बावजूद सीवन को दिखाए बगैर जिस ढंग से दोनों फिल्मों को जोड़ा है, उससे इसे देखने का अनुभव ज्यादा सुखद हो गया है. और मिरांडा के चोले में अंदर-बाहर तक ढलीं मेरिल स्ट्रीप के अकेले इसी किरदार पर पूरी किताब लिखी जा सकती है. कहां सिल्कवुड (1983) की वह करेन और कहां मिरांडा! उफ...

मूल चरित्र और अभिनेता या कहें कि यथार्थ और कल्पना को एक तल पर लाते हुए अंतरराष्ट्रीय फैशन पत्रिका वोग के मई 2026 के अंक के कवर पर एना विंटर और मिरांडा बनीं मेरिल स्ट्रीप दोनों की तस्वीर छपी है.

सिने-सुझाव: सुमित सिंह

मेमोरीज इन मार्च  2010 
तलाकशुदा आरती मिश्रा दिल्ली में रहती हैं. अचानक एक रात कोलकाता से एक कॉल पर उन्हें बताया जाता है कि रोड एक्सीडेंट में उनके बेटे की मौत हो गई है. वे बेटे के अंतिम संस्कार के लिए कोलकाता पहुंचती हैं. लेकिन उनके लिए यह अंतिम संस्कार उन सोलह संस्कारों में से प्रथम संस्कार साबित होता है जिनके धार्मिक हिसाब से भारत में मानव गति तय होती है.

आम भारतीय माताओं की तरह आरती भी बेटे की आदर्श लेकिन नकली पर्सनैलिटी को सच मानती हैं. अब सच को ढांपने के लिए बेटा जिंदा नहीं, तब बेटे का असली जीवन सीक्रेट पर्सनल डायरी की तरह मां के सामने आता है. इसे पढ़ने जानने के लिए कलेजे को ताकत चाहिए. दीप्ति नवल और रितुपर्णो घोष का यादगार काम. आला दर्जे का संगीत फिल्म को बेमिसाल बनाता है. यह फिल्म आपको भीतर बाहर तोड़ती है.
कहां देखें: यूट्यूब

रुई का बोझ  1997 
समय ही रिश्तों का तराजू होता है. संबंधों को लेकर आपकी समझ कभी रुककर जमा पानी की तरह नहीं होनी चाहिए. सड़ा पानी जीवन खो देता है. यही बात गांव के सम्मानित किशन साह नहीं समझ पाते और बेटों के बीच संपत्ति का बंटवारा कर सबसे छोटे बेटे रामशरण के पास रहने चले जाते हैं.

बड़े गिलास में गुनगुने दूध और स्वादिष्ट पकवानों से शुरू हुई यात्रा जल्द बिना दूध की चाय और गिनती की रोटियों पर पहुंच जाती है. अब वे इस गृहस्थी पर बोझ हैं. संबंधों के क्षरण पर बनी कुछ सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक गिनी जाने वाली इस फिल्म को पंकज कपूर, रघुबीर यादव और रीमा लागू के अद्भुत अभिनय के लिए देखा जाना चाहिए. किशन साह और उसकी बहू के बीच हुए झगड़ों के दृश्य आप शायद ही कभी भूल सकें.
कहां देखें: यूट्यूब

अमरावती की कथाएं  1995 
पूर्वांचल में एक बात कही जाती है 'मह मह महकना’. अमूमन बेला-चमेली जैसे उन फूलों के लिए यह कहा जाता है जिनकी तेज गंध अपार लगती है. आज से तीन दशक पहले टीवी पर आई इस सीरीज का टाइटल ट्रैक भी कहता है 'मह मह महकें अमरावती की कथाएं...’ दर्जन भर कहानियों पर बनी इस सीरीज की कहानियां वास्तव में अपनी गमक में छलकती हैं.

ऐसी ही कहानियों की जमीन पर रची गई मालगुडी डेज अगर आपको रह-रहकर याद आती हो तो ठीक वैसी ही गांव-जवार की कहानियां हैं अमरावती की कथाएं में. वीरेंद्र सक्सेना, नीना गुप्ता, मोहन गोखले, रघुबीर यादव जैसे दिग्गजों को उनके शुरुआती दिनों में ताजा महकती कहानियों के साथ गमकते देखना अनोखे आनंद का कारण बनता है. कोई घड़ीसाज, कोई मल्लाह, कोई पुजारी, कोई व्यापारी...दक्षिण भारत के महकते रंग हैं इनमें.
कहां देखें: यूट्यूब

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