गांधी: मजबूरी या मजबूती?

लेखक इस पुस्तक में आज के भारत की सबसे बड़ी वैचारिक बहस के केंद्रीय शब्द हिंदू, सनातन, हिंदुत्व पर विस्तार से चर्चा करते हैं. एक-एक शब्द की खोज और उसके प्रमाण रखते हैं.

गांधी मजबूरी या मजबूती पुस्तक का कवर
'मजबूती का नाम महात्मा गांधी' पुस्तक का कवर

भारतीय लोक-मानस में दशकों से एक मुहावरा पैठ बनाए हुए है, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी. यह केवल एक भाषाई विचलन नहीं बल्कि एक सुनियोजित वैचारिक उपक्रम था जिसका उद्देश्य गांधी की उस नैतिक शक्ति को कायरता या विवशता के रूप में अनूदित करना था जिसने औपनिवेशिक साम्राज्य की चूलें हिला दी थीं.

लेखक-विचारक पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई कृति मजबूती का नाम महात्मा गांधी  इसी मुहावरे को उलटते हुए गांधी को उनकी संपूर्ण मजबूती और दार्शनिक प्रखरता के साथ पुनर्स्थापित करती है. यह पुस्तक गांधी की पारंपरिक जीवनी या महिमामंडन नहीं है बल्कि एक नागरिक की बेचैनी और एक स्कॉलर के ईमानदार आत्मसंघर्ष का निचोड़ है.

लेखक इस पुस्तक में आज के भारत की सबसे बड़ी वैचारिक बहस के केंद्रीय शब्द हिंदू, सनातन, हिंदुत्व पर विस्तार से चर्चा करते हैं. एक-एक शब्द की खोज और उसके प्रमाण रखते हैं. वे सवाल करते हैं कि नेहरूवियन आइडिया की जगह सावरकर मॉडल पर बन रहे भारत का घृणा और हिंसा से क्या संबंध है? गांधी मॉडल को समावेशी बताते हुए तर्क रखते हैं कि कैसे वे अपने विरोधियों से भी संवाद करने का साहस रखते थे.

सवाल है कि मजबूती क्या है? शारीरिक बल और सत्ता का दंभ या अहिंसा और नैतिक साहस? गांधी के लिए तपस्या हिमालय की कंदराओं में छिपना नहीं था बल्कि दंगों की आग में जलते नोआखली के गांवों में नंगे पैर खड़े होना था. यही वह 'मजबूती’ है जो सत्ता की हिंसा अस्वीकार करती है और अपनी मान्यताओं पर अडिग रहती है.

जब दुनिया के तमाम देश इस समय युद्धरत हैं तब इस पुस्तक के कई अंश हमें समझाते हैं कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति सहिष्णुता और करुणा में निहित है, न कि प्रतिशोध में.

दार्शनिक धरातल पर यह पुस्तक ईश्वर और धर्म की संकीर्ण व्याख्याओं को चुनौती देती है. गांधी और गोरा (जी. रामचंद्र राव) के बीच का ऐतिहासिक संवाद इस कृति का अनमोल हिस्सा है. पढ़ते हुए जान पाते हैं कि एक नैतिक जीवन जीने के लिए किसी पारलौकिक सत्ता में विश्वास अनिवार्य नहीं. लेखक भारतीय परंपरा के हवाले से समझाते हैं कि आस्तिक केवल वह नहीं जो सिर्फ भगवान को माने, बल्कि वह भी है जो नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हो.

गांधी की यात्रा 'ईश्वर सत्य है’ से 'सत्य ही ईश्वर है’ तक की है, जो उन्हें किसी विशिष्ट धर्म के घेरे से निकालकर एक सार्वभौमिक मानवीय धरातल पर खड़ा कर देती है.

लेखक की शैली की सबसे बड़ी खूबी उनका 'साहस’ है. वे बाकायदा बताते हैं कि एक रोज उनके घर दोपहर के भोजन पर नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे आए थे. बड़े भाई ‌‌‌ह‌िंदू सभा से जुड़े थे और लेखक शाखा आया-जाया करते थे. यह व्यक्तिगत पृष्ठभूमि बताना लेखक की मजबूती है, मजबूरी नहीं. इसी पृष्ठभूमि से निकलकर वे गांधी के मूल्यांकन की राह पर चले और संभवत: इसीलिए उनकी आलोचनात्मक दृष्टि बाहरी व्याख्याता के साथ आंतरिक संघर्ष की भी है.

ऐसा नहीं कि पुरुषोत्तम अग्रवाल गांधी भक्त होकर इसे लिख रहे हों. ऐसा होता तो वे हिंद स्वराज के अंधाधुंध महिमामंडन पर सवाल न उठाते. यह न कहते कि कैसे सेकुलर और कांग्रेसी धाराओं ने हिंदुत्व की वैचारिक चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया, जिसके परिणामस्वरूप गांधी को 'मजबूरी’ का प्रतीक बनाने की योजना सफल होती रही.

पुस्तक पढ़ते हुए जो खटका, वह है एक ही पाठ और कभी एक ही पन्ने पर गांधी और गांधीजी दोनों शब्दों का प्रयोग. यह सायास था या रह गया, पता नहीं पर एकरूपता बेहतर रहती है. हालांकि यह पुस्तक के विराट अर्थ के आगे नगण्य है.

यह पुस्तक आज के हर उस जागरूक नागरिक के लिए अनिवार्य है जो इतिहास के सरलीकरण से ऊब चुका है.

यह किताब गांधी को एक महात्मा की जड़ मूर्ति बनाकर नहीं बल्कि एक जटिल, जूझते और निरंतर आत्म-सुधार करने वाले मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती है. यदि आप 'नैतिक साहस’ और 'संवाद की भाषा’ की तलाश में हैं तो यह आपकी वैचारिक भूख शांत करने के साथ आपको भविष्य के भारत के लिए एक नई दृष्टि भी दे सकती है.

पुस्तक का नाम: मजबूती का नाम महात्मा गांधी
लेखक: पुरुषोत्तम अग्रवाल
प्रकाशन: राजकमल पेपरबैक्स 
कीमत: 299 रुपए.

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