अक्षरों में बसता अफ्रीका
हालांकि, वर्णमाला (ए से जेड) के कठोर ढांचे में बंधे होने के कारण कहीं-कहीं कवि की सहज कल्पनाशीलता और काव्यात्मक प्रवाह संकुचित होता प्रतीत होता है.

- आशुतोष कुमार ठाकुर
अफ्रीका अक्सर बाहरी दुनिया की आंखों में या तो औपनिवेशिक रुग्णता का शिकार रहा है या फिर उसे एक 'अंधेरे महाद्वीप’ की उस घिसी-पिटी छवि में कैद कर दिया गया, जिसे पश्चिम ने गढ़ा था. लेकिन जब कोई कवि अपनी कूटनीतिक यात्राओं और संवेदनात्मक दृष्टि के साथ इस महाद्वीप की धूल, धूप और धड़कन को शब्द देता है तो वह केवल एक यात्रा नहीं रह जाती बल्कि सभ्यतागत संवाद बन जाती है.
अभय के. का नया काव्य-संग्रह द अल्फाबेट्स ऑफ अफ्रीका इसी अर्थ में एक विलक्षण कृति है, जहां वे एक 'आउटसाइडर’ (बाहरी) होने की दुविधा को अपनी विनम्रता और पारदर्शी दृष्टि से एक आत्मीय विलाप और उत्सव में बदल देते हैं.
किसी भी स्थान को कविता में उतारना उस स्थान के साथ 'होने’ की प्रक्रिया है. अभय ने यहां अफ्रीका को केवल देखा नहीं, उसके इतिहास को वर्तमान से जोड़ा भी है. संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे हम किसी पुराने संग्रहालय की दीर्घाओं से होते हुए अचानक एक आधुनिक महानगर की व्यस्त सड़क पर आ खड़े हुए हों. यह संक्रमण ही इस संग्रह की जान है.
संग्रह की बनावट वर्णमाला के क्रम में है—ए से जेड तक. यह ढांचा पहली नजर में शायद यांत्रिक लगे पर जैसे ही आप कविताओं में गहरे उतरते हैं, यह एक दार्शनिक अन्वेषण जैसा प्रतीत होता है. अल्जीरिया के प्राचीन खंडहरों से लेकर जिंबॉब्वे के वर्तमान तक यह पुस्तक एक समूचे महाद्वीप की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना का लेखा-जोखा है.
अभय यहां 'नेग्रिट्यूड’ आंदोलन के विचारकों और एमरी बराका जैसे व्यक्तियों को याद करते हैं. यह बताता है कि उनकी दृष्टि प्रकृति चित्रण से इतर, उन बौद्धिक संघर्षों के प्रति भी सजग है जिन्होंने आधुनिक अफ्रीका को आकार दिया है.
भारतीय पाठक के लिए तो यह पुस्तक एक विशेष महत्व का काम करती है. हम अक्सर अफ्रीका को अपनी साझा औपनिवेशिक नियति और महात्मा गांधी के शुरुआती संघर्षों की भूमि के रूप में देखते हैं. अभय की कविताएं इस परिप्रेक्ष्य को विस्तार देती हैं. वे अदीस अबाबा की गलियों में घूमते हुए उन आवाजों को पकड़ते हैं जो ग्लोबल साउथ के उस साझा दर्द और आकांक्षा को बयां करती हैं जिसे अक्सर मुख्यधारा के साहित्य में हाशिए पर धकेल दिया गया है.
आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो क्या एक 'आउटसाइडर’ किसी महाद्वीप की आत्मा को गा सकता है? यह प्रश्न विमर्श के केंद्र में रहता है. यहां अभय का उत्तर उनकी कविताओं की ईमानदारी में निहित है. वे किसी पर्यटक की तरह विस्मय में नहीं डूबे, वे एक 'फ्लानूर’ (आवारगर्द) की तरह वहां के यथार्थ को दर्ज कर रहे हैं.
वे जानते हैं कि अफ्रीका महादेश विविधताओं से भरा विशाल संसार है. उनकी भाषा में वह ठहराव है जो पूर्वग्रहों को त्यागने का आह्वान करता है.
हालांकि, वर्णमाला (ए से जेड) के कठोर ढांचे में बंधे होने के कारण कहीं-कहीं कवि की सहज कल्पनाशीलता और काव्यात्मक प्रवाह संकुचित होता प्रतीत होता है. महाद्वीप की विशालता को अक्षरों के क्रम में समेटने की यह कोशिश कुछ कविताओं को स्वतस्फूर्त रचना के बजाय एक अकादमिक अभ्यास के अधिक निकट ले आती है.
संग्रह में महाद्वीप के प्रतीकों, जैसे कि नील नदी, सहारा का रेगिस्तान और वहां के महान नायकों को जिस तरह पिरोया गया है, वह कविता को एक महाकाव्यात्मक विस्तार देता है. द अल्फाबेट्स ऑफ अफ्रीका को पढ़ना असल में उस महाद्वीप के प्रति एक कृतज्ञता ज्ञापन भी है जिसने मानवता की यात्रा को आदिम काल से अब तक संजोया है.
अभय के. भारतीय कूटनीति के साथ-साथ समकालीन भारतीय अंग्रेजी कविता के एक विशिष्ट हस्ताक्षर हैं. उनकी कविताएं केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं, वे एक वैश्विक नागरिक की उस व्यापक दृष्टि का प्रतिफल भी हैं जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों की सांस्कृतिक विरासत और स्मृतियों को शब्दों में पिरोने का जतन करती हैं.
द अल्फाबेट्स ऑफ अफ्रीका इसी निरंतर चलती आ रही वैचारिक और संवेदनात्मक कड़ी का एक सुंदर विस्तार है.
पुस्तक का नाम: द अल्फाबेट्स ऑफ अफ्रीका
लेखक: अभय के.
प्रकाशन: पेंगुइन रैंडम हाउस
कीमत: 499 रुपए.