मठ की चौखट से संगीत के शिखर तक
यह आत्मकथा महज यादों का संकलन नहीं बल्कि संगीत का दर्शनशास्त्र भी है. मंसूर लिखते हैं कि संगीत के हर आकांक्षी को संगीत रत्नाकर, भरत शास्त्र, राग विबोध और संगीत पारिजात पढ़नी चाहिए.

यह एक 'अशुभ नक्षत्र’ की घड़ी थी, जब मंसूर गांव के एक परिवार में आठ संतानों में से तीसरी संतान के रूप में मल्लिकार्जुन का जन्म हुआ. सितारों की चाल से भयभीत बुजुर्गों ने नन्हें बालक को मठ के सुपुर्द करने का फैसला किया. मठ के गुरु ने बच्चे को हाथ में उठाया पर मां ने झपटकर वापस ले लिया.
एक दिन गांव में संगीतकार अप्पयस्वामी के कदम क्या पड़े मानो पांच साल के मल्लिकार्जुन के जीवन का सोता फूट पड़ा. उस दिन बालक ने जान लिया कि वह अनंत आकाश में गूंजने वाले एक 'अनहद नाद’ के लिए जन्मा है. यहीं से उस रसयात्रा का शंखनाद होता है जो आगे चलकर जयपुर-अतरौली घराने का पर्याय बनती है.
मूल रूप से कन्नड़ में लिखी पं. मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा का अंग्रेजी में अनुवाद उनके बेटे राजशेखर और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद मृत्युंजय ने किया है. वर्तमान में जीने वाले मल्लिकार्जुन लिखते हैं कि जिन हाथों ने तानपूरा पकड़ा उनमें कलम पकड़ अतीत में जाने पर उन्हें घबराहट-सी महसूस हो रही थी. इसलिए वे अपनी शाब्दिक सीमाओं को जताते हुए पुस्तक की शुरुआत करते हैं.
पन्ने पलटते हुए हम ग्वालियर घराने के उस्ताद नीलकंठबुआ के सान्निध्य में पहुंचते हैं. रसयात्रा का यह खंड तपस्या काल है. सुबह चार बजे की निस्तब्धता, कांपते होंठों पर शुद्ध स्वर और छह वर्षों का वह कठोर रियाज, जिसने मल्लिकार्जुन को तराशा. किंतु नियति उन्हें जयपुर-अतरौली घराने तक ले जाना चाहती थी. और वे पहुंचते हैं उस्ताद मंजी खां और बुर्जी खां के शिष्यत्व में. उन्होंने पेचीदा बंदिशों और तानों को ऐसे आत्मसात किया जैसे कोई प्यासा अमृत पी जाए. तीन गुरुओं ने मल्लिकार्जुन मंसूर की ज्ञान राशि का अनंत विस्तार किया और सफलता के स्वर-पथ का निर्माण.
यह आत्मकथा महज यादों का संकलन नहीं बल्कि संगीत का दर्शनशास्त्र भी है. मंसूर लिखते हैं कि संगीत के हर आकांक्षी को संगीत रत्नाकर, भरत शास्त्र, राग विबोध और संगीत पारिजात पढ़नी चाहिए. हालांकि संगीत का व्यावहारिक पक्ष किसी किताब से नहीं सीखा जा सकता. उसकी गूढ़ता से परिचय गुरु ही करा सकता है. और रसयात्रा का साहित्यिक हृदय मंसूर जी का अपने गुरुओं के प्रति पूर्ण समर्पण है.
यह पुस्तक उन नीरस आत्मकथाओं और जीवनियों से कोसों दूर है जो केवल तारीखों का हिसाब रखती हैं. यहां कोई हिसाब है ही नहीं. समुद्र से उठी वह सांगीतिक भाप है जो बादल बनकर बरसती है और अंत में फिर उसी असीम सागर में विलीन हो जाती है. आत्मकथा की सबसे बड़ी खूबी इसका अनगढ़ सच्चापन है. यहां न कोई दंतकथा गढ़ने की चेष्टा है, न आत्ममुग्धता का शोर.
उनके पुत्र पंडित राजशेखर मंसूर द्वारा जोड़े गए अध्याय इस कृति को एक मर्मस्पर्शी पूर्णता देते हैं. सबसे करुण और शायद सबसे उज्ज्वल अध्याय वह है जहां जीवन की संध्या उतरती है. बीमारी, देह की थकान और स्वर की जिद. यहां मंसूर एक मनुष्य से अधिक साधक दिखाई देते हैं. जैसे देह हार रही हो पर राग का प्रकाश भीतर से आ रहा हो. वे 17 अगस्त, 1992 को फेफड़ों के कैंसर से जूझते अपने आध्यात्मिक गुरुओं के सामने देर तक राग हेम नट गाते रहे. यह पढ़ते हुए आप कैसे महसूस करते हैं, लिखना मुश्किल है.
पद्म विभूषण मल्लिकार्जुन मंसूर ने अपना सब कुछ संगीत साधना की वेदी पर चढ़ा दिया. अंतिम पाठ में राजशेखर ने बहुतेरी उपकथाएं जोड़ी हैं जो मल्लिकार्जुन मंसूर की प्रस्तुतियों, यादगार मौकों और लोगों से जुड़ीं हैं.
गद्य उल्लेखनीय है और उतना ही उल्लेखनीय अनुवाद. कोई भाषाई आडंबर नहीं. एक आत्मीय लय से परिपूर्ण. कहीं संस्मरण जैसा सहज, कहीं राग विस्तार जैसा गंभीर, कहीं लोककथा जैसा सरल. हिंदी अनुवाद ने इस आत्मा को बचाए रखा. यह बड़ी सफलता है.
रसयात्रा एक सांगीतिक-साहित्यिक तीर्थयात्रा है. इसे पढ़ते हुए हम खुद को एक अंतहीन महफिल में बैठा पाते हैं. यह पुस्तक संगीत-प्रेमियों के लिए तो अनिवार्य है ही, उन सबके लिए भी आवश्यक है जो जानना चाहते हैं कि कला का सच्चा साधक आखिर कैसा होता है और अंतत: वह बनता कैसे है. ठ्ठ
पुस्तक का नाम: रसयात्रा
लेखक: मल्लिकार्जुन मंसूर
अंग्रेजी से अनुवाद : मृत्युंजय
प्रकाशन: राजकमल पेपरबैक्स .
कीमत: 250 रुपए