गली के बहाने मुल्क की पड़ताल
अवसरवादी राजनीति का नंगा भौंडा प्रदर्शन है. उसके प्रतीक बने 'वीर हनुमान दल’ के युवा नेता बमबम भैया हैं. धार्मिक उन्माद अपने चरम पर है. नव-हिंदुत्ववाद का उभार सामाजिक समरसता को नष्ट करने पर आमादा है.

- गीताश्री
वरिष्ठ साहित्यकार हृषीकेश सुलभ का यह तीसरा उपन्यास है जिसमें उन्होंने अपने ही खांचे को तोड़ा है. अपनी लेखकीय सीमाओं को लांघ गए हैं. अग्निलीक और दाता पीर जैसे उपन्यासों के पाठकों के लिए यह उपन्यास अचंभे की तरह आता है जिसमें लेखक हर स्तर पर अलग दिखाई देते हैं.
यह बात साहसिकता और जोखिम भरी है. हर किताब में एक जैसा आस्वाद ढूंढ़ने वालों को इस घनचक्कर गली में नया स्वाद मिलेगा. गलियों का इतिहास होता है, न्यू कॉलोनी का नहीं. जैसे पगडंडियों का इतिहास होता है, हाइवे का नहीं.
यह जूठी गली ऐतिहासिक गली है. इतिहास के बीहड़ में घुसने के मामले में सुलभ की कलम उस्ताद कलम है. वे अतीत में घुसकर एक गली का इतिहास, वर्तमान और भविष्य तीनों को ढूंढ़ लाते हैं. इसे काल के साथ तोड़-फोड़ कहते हैं. यहां एक उलझी हुई गली है जिसका सिरा इतिहास में दबा हुआ है. इस उलझी हुई गली में कुछ और गलियां आकर उलझ गई हैं.
भोर और सांझ की लालिमा से वंचित इस गली में जाड़ा किसी बाघ की तरह घुसता है. बावजूद इसके इस गली को आता है बाघ की तरह टहलते माघ के गले में पट्टे डालना. जूठी गली के बारे में लेखक ने स्वयं ऐसा परिचय दिया है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह गली कैसी होगी या इसका चरित्र कैसा होगा.
लेखक ने खुद इसे तरह-तरह के अजूबों से भरी गली बताया है. कुछ इस तरह, ''यह गली भीतर ही भीतर एक भांवर काटकर जूठी गली के भीतर थोड़ी ही दूर पर निकलती थी. जूठी गली से निकलकर जूठी गली में खुलती थी यह गली. कबीरदास के अगम पंथ की तरह आदि-अंत और मध्य में यह गली एक समान थी.’’ यह गांजा गली थी. कई गलियां गड्डमड्ड. नव-प्रेमियों की उंगलियों की तरह उलझी हुई.
इनका नक्शा समझना हो तो उपन्यास के कवर को ध्यान से देखें या उपन्यास के अंतिम पन्ने को. ये शायद पाठकों की निगाह से ओझल रहें. इस गली के पेंचोखम से गुजरते हुए पहले इतिहास समझते हैं फिर उसके वर्तमान तक आते हैं. लेखक के भीतर भरी होती हैं कई शताब्दियां. इस उपन्यास में अतीत बड़ा कारक है और आकर्षक भी.
तरह-तरह की अनुगूंजों से भरी इस गली के एक अहम किरदार हैं सत्यानारायण लाल यानी सत्तो बाबू. गली उनके पूर्वजों ने बसाई थी. 18वीं शताब्दी में दिल्ली दरबार से दरबदर होकर दीवान जूठी लाल अपने कुनबे के साथ अजीमाबाद (अब पटना) बसने आए थे. जूठी लाल का कटरा नाम था, बदलते-बदलते जूठी लाल की गली रह गई.
वर्तमान में इस गली में बहुत भीड़ है. कायस्थों का इलाका है लेकिन और भी जातियां यहां बसती हैं. वहां बहुत भीड़ है. भांति-भांति के लोग रहते हैं. मध्यवर्गीय संस्कारों, झूठी इज्जत और जड़ताओं को ढोने वाले परिवारों में घुटती हुई स्त्रियां हैं, घर से भागती हुई लड़कियां हैं, कुंठित और पूर्वग्रह से भरी राजनीति के शिकार खास समुदाय के युवा छात्र हैं, बदलते समय को विवश आंखों से देखते हुई पुरानी पीढ़ी है.
अवसरवादी राजनीति का नंगा भौंडा प्रदर्शन है. उसके प्रतीक बने 'वीर हनुमान दल’ के युवा नेता बमबम भैया हैं. धार्मिक उन्माद अपने चरम पर है. नव-हिंदुत्ववाद का उभार सामाजिक समरसता को नष्ट करने पर आमादा है. गली से निकलकर मुंबई तक, प्रेमियों के साथ नहीं, अपने सपनों के पीछे भागती लड़कियां हैं.
जायदाद को कब्जा करने वाली, रंगदारी टैक्स वसूलने वाली शक्तियां फल फूल रही हैं. एक बदलता हुआ विकराल समय है. गली की सामाजिकता छिन्न-भिन्न होने के कगार पर पहुंच चुकी है. वैसे ही जैसे देश की सामाजिकता को चूहे कुतर गए हैं. कई कथाएं एक साथ चल रही हैं. बमबम भैया का जनकदुलारी से पेंचीदा प्रेम प्रसंग भी है.
इन सबसे परदा उठाते हुए लेखक हैं. लेखक की दिव्य आंख निर्ममता से सब कुछ देखती है और संवेदनशीलता के साथ दर्ज करती है. लेखक सटीक ढंग से सभी चरित्रों और प्रवृतियों के गोपन भावावेगों, दुर्बलताओं और जय-पराजय तक पहुंचते हैं.
पुस्तक का नाम: जूठी गली
लेखक: हृषीकेश सुलभ
प्रकाशन: राजकमल पेपरबैक्स
कीमत: 399 रुपए