इंटरनेट के तीन दशक
द डिजिटल डेकेड्स पुस्तक के लेखक का मानना है कि भारत की इंटरनेट यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है. भारत का ध्यान डिजिटल पब्लिक गुड्स और समावेशी विकास पर है. 5 जी से आगे बढ़ने के लिए देश तैयार है.

कहानी शुरू होती है साल 1995 की एक दोपहरी से जब दिल्ली विश्वविद्यालय के मानसरोवर हॉस्टल में एक खबर बिजली की तरह कौंधती है, भारत में इंटरनेट आने वाला है! उस वक्त किसी को नहीं पता था कि यह तकनीक कैसी होगी, लेकिन लेखक सुबीमल भट्टाचार्जी की आंखों में चमक थी.
यह दौर था जब बीएसएनएल भारत के चार महानगरों में इंटरनेट का दरवाजा खोल रहा था और उत्तरी अमेरिका के 34 प्रतिशत घरों में पहले से ये सेवाएं मौजूद थीं. 9.6 केबीपीएस की उस रेंगती रफ्तार के साथ ईमेल भेजना किसी विजय अभियान से कम नहीं था.
लेखक शुरुआती अध्यायों में वैश्विक स्तर से भारत की तुलना करते हैं और प्रोटाकॉल से लेकर डोमेन विवाद और तीसरी दुनिया के संघर्ष पर आंकड़ों समेत बात रखते हैं.
बड़ा मोड़ उस वक्त आता है जब देश 'डिजिटल इंडिया’ के दौर में प्रवेश करता है. सुबीमल ब्यौरा देते हैं कि कैसे इंटरनेट चंद खास लोगों के ड्रॉइंग रूम से निकलकर एक दिहाड़ी मजदूर के हाथ में स्मार्टफोन तक पहुंचता है. यहां यह केवल तकनीक नहीं लोगों के जीवन की कहानी बन जाती है.
बीस अध्यायों की इस किताब में डिजिटल स्पेस से जुड़ी सरकारी नीति, एआइ, साइबर अटैक, निजता हनन की चिंताएं, सोशल मीडिया बबल, फेक न्यूज समेत इंटरनेट के स्याह पक्ष पर भी बात की गई है. हालांकि इन पक्षों को और विस्तार दिया जा सकता था. यह सही है कि किताब भारत में इंटरनेट क्रांति की जानकारी और उसके विश्लेषण के लिए ज्यादा लिखी गई है पर जब समाज में ध्रुवीकरण और हिंसा की घटनाएं इस माध्यम से भी उपज रही हों तब लिखते हुए आलोचनात्मक होना ही चाहिए.
लेखक का मानना है कि भारत की इंटरनेट यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है. भारत का ध्यान डिजिटल पब्लिक गुड्स और समावेशी विकास पर है. 5 जी से आगे बढ़ने के लिए देश तैयार है. सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के कदम उठाए जा रहे हैं.
आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 6जी, क्वांटम कंप्यूटिंग और इंटरनेट ऑफ थिंग्स हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाएंगे. स्मार्ट सिटी और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं इसी तकनीक पर आधारित होंगी. तकनीक का असली मूल्य भी इंसानी क्षमता बढ़ाने और रिश्तों को मजबूत करने में है.
इंटरनेट के जरिए छोटे शहर के युवा और महिलाएं वित्तीय स्वतंत्रता की कहानी लिख रहे हैं. पहले के मुकाबले किसानों का सशक्तीकरण भी हो रहा है लेकिन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच डिजिटल अवसरों का एक बड़ा अंतर आज भी मौजूद है. भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इसे कितना समावेशी बनाते हैं. प्राइवेसी और सुरक्षा के नियम कैसे तय करते हैं.
द डिजिटल डेकेड, थर्टी इयर्स ऑफ द इंटरनेट इन इंडिया केवल एक किताब नहीं बल्कि सुबीमल भट्टाचार्जी के उन तीस सालों का निचोड़ है जिसमें उन्होंने भारत को रेंगते हुए फिर चलते हुए और अब डिजिटल रफ्तार से दौड़ते हुए देखा है. यह कहानी हमें याद दिलाती है कि तकनीक भले ही सिलिकॉन और तारों के इर्द-गिर्द घूमती हो पर उसका दिल इंसानी जज्बात से धड़कता है.
पुस्तक का नाम: द डिजिटल डेकेड्स
थर्टी इयर्स ऑफ द
इंटरनेट इन इंडिया
लेखक: सूबीमल भट्टाचार्जी
पब्लिकेशन: साइमन ऐंड शूस्टर
कीमत: 599 रुपए.