कालिदास के संग-संग हिमालय तक
रामटेक से रामगिरि तक, अंबिकापुर से उज्जयिनी तक, कनखल से गंगोत्री और गोमुख तक और अंतत: तिब्बत के रास्ते कैलास तक की इस यात्रा में साहित्य, प्रकृति, इतिहास, मिथक, धार्मिक विश्वास- सब एकाकार हो उठते हैं.

- प्रियदर्शन
करीब ढाई-हजार साल पहले कालिदास ने मेघदूतम् की रचना की थी. अपनी किसी हरकत की वजह से अलकापुरी से निष्कासित और शापित यक्ष अपनी यक्षिणी को संदेश भेजने को व्याकुल है. वह मेघ को अपना माध्यम बनाता है और उसे अलकापुरी तक पहुंचने का मार्ग बताता है. मेघदूतम् अपने बड़े हिस्से में इस रास्ते का काव्यात्मक और उदात्त विवरण है.
यह कैसा रास्ता है? कितना काल्पनिक है, कितना भौगोलिक और कितना ऐतिहासिक? इस प्रश्न ने हिंदी की सुख्यात लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ को प्रेरित किया कि वे कालिदास के सुझाए मार्ग पर चलें और देखें कि उन्हें क्या-क्या मिलता है और क्या-क्या नहीं. इस खोज से निकला है एक अनूठा यात्रा संस्मरण मेघदूत की राह के पथिक.
मनीषा अपने विविधतापूर्ण औपन्यासिक और गैर औपन्यासिक लेखन से पहले भी गहरी छाप छोड़ती रही हैं. अब यह कृति उनके समर्पण, अध्ययन, पर्यवेक्षण, उनकी साहित्यिकता और उनके साहस का नया साक्ष्य बन कर सामने आई है. ढाई हजार साल पहले एक कवि ने एक कल्पना की. आकाश में बनते-मिटते मेघ को साथी बनाया और उसे मार्ग समझाया.
अब इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में हिंदी की एक लेखिका उस बिखरे रास्ते पर मेघों को संबोधित करते हुए चल निकलती है. यह अपने-आप में रोमांचित करने वाला खयाल है और कमाल यह कि इस खयाल की उंगली पकड़े-पकड़े मनीषा कुलश्रेष्ठ एक बेहद दुर्गम यात्रा पूरी करती हुई कैलास मानसरोवर तक जा पहुंचती हैं. खासकर जब वे मैदानों से निकल पहाड़ों की ओर पहुंचती हैं और कैलास मानसरोवर के लिए निकलती हैं तो किताब बेहद दिलचस्प और रोमांचक हो उठती है. कुछ काव्यात्मक और उदात्त भी.
रामटेक से रामगिरि तक, अंबिकापुर से उज्जयिनी तक, कनखल से गंगोत्री और गोमुख तक और अंतत: तिब्बत के रास्ते कैलास तक की इस यात्रा में साहित्य, प्रकृति, इतिहास, मिथक, धार्मिक विश्वास- सब एकाकार हो उठते हैं. कभी कालिदास को याद करती और कभी मेघों को पुकारती मनीषा जैसे इस सदी की लेखक भर नहीं रह जातीं.
मगर यह कृति सिर्फ यात्रा संस्मरण नहीं है. यह मेघदूतम् का पुनर्पाठ भी है. यह कालिदास की खोज भी है. मनीषा बहुत जतन से मेघदूतम् और उससे जुड़े साहित्य और अनुवाद का अध्ययन करती हैं और उसके महत्वपूर्ण पक्षों को रखती चलती हैं. यात्रा के दौरान भी जैसे कालिदास की पंक्तियां उनका हाथ पकड़ कर चलती रहती हैं. रामगिरि के पहाड़ों, नर्मदा और रेवा जैसी नदियों से लेकर छत्तीसगढ़ के ग्राम प्रांतरों और उससे आगे तक मनीषा हर जगह खोजती चलती हैं कि कालिदास ने कितने निशान छोड़े हैं
और वे निशान इतनी सदियों बाद किस तरह बचे हुए हैं. वे लगभग हर जगह उन वृक्षों, नदियों, पहाड़ों, चट्टानों और रेखाओं को खोजती चलती हैं जिनका जिक्र कालिदास की कविता में मिलता है. उन्हें लगता है कि कालिदास खुद एक यात्री रहे होंगे जिन्होंने पूरी यात्रा कर यह सटीक रास्ता खोजा होगा जिसे भूगोल भी अब तक मिटा या बहुत बदल नहीं पाया है.
वे इस बात पर भी ध्यान देती हैं कि कालिदास ने बिल्कुल आकाशचारी की तरह कई दृश्यों को देखा-समझा है यानी जैसे वे ऊपर से देख पा रहे हों कि उज्जयिनी कैसी लगती होगी या क्षिप्रा कैसी झलकती होगी.
इस पूरी यात्रा में धार्मिक प्रतीकों की भरमार है.
मंदिर, मठ या आश्रम और स्तूप जगह-जगह मिलते हैं. कहीं-कहीं मजार और दरगाहें भी. रास्ते में रूमी तक मिलते हैं. लेकिन यह पूरी जगह राम, शिव और बुद्ध की है तो वे जैसे हर जगह मिल जाते हैं. जहां राम हैं वहां शिव भी हैं और वहीं बुद्ध की भी स्मृति है. गुफाओं के भीतर पत्थरों पर पुरानी लिपियों में खुदे संदेश भी.
बस एक खयाल आता है. यात्रियों को बहुत सामान लेकर नहीं चलना चाहिए. इससे यात्रा का वजन बढ़ता है, रस घटता है. इस किताब में कहीं-कहीं लगता है कि मनीषा ने ज्यादा बोझ उठा लिया है. कालिदास के कालखंड की जांच करने, उन पर जो दूसरों ने लिखा है, उसे साझा करने और जहां-जहां वे जाती हैं, उन सब जगहों के विस्तार से ब्योरे देने की वजह से किताब कुछ ज्यादा भारी हो जाती है.
अच्छे यात्रा-वृत्तांत वे हैं जो इन दबावों से कुछ मुक्त होते हैं. कृष्णनाथ की यात्राएं, निर्मल वर्मा के कई संस्मरण उदाहरण हैं. कैलास मानसरोवर की यात्रा पर केंद्रित गगन गिल की कृति अवाक भी कुछ अलग आध्यात्मिक रस पैदा करती है.
लेकिन फिर भी कहना होगा कि मनीषा की कृति का फैलाव बहुत बड़ा है. इसे पढ़ते हुए हम एक साथ कई किताबें पढ़ रहे होते हैं, एक साथ कई युगों में चल रहे होते हैं. फिर मनीषा के लेखन की अपनी सहजता, स्वत:स्फूर्तता भी है. वे अपनी अनौपचारिक बेफिक्र शैली में कालिदास की शृंगारिकता भी रेखांकित करती हैं और बादल को इतने नामों से पुकारती हैं कि लगता है कि बादल उनका सखा हो चुका है. यह हमारे समय की एक महत्वपूर्ण कृति है.
पुस्तक का नाम: मेघदूत की राह के पथिक
लेखिका: मनीषा कुलश्रेष्ठ
पब्लिकेशन: राजकमल पेपरबैक्स
कीमत: 399 रुपए.