सुर्खियों के पीछे छिपे कई भारत

द व्यू फ्रॉम हेयर पुस्तक भोर में एक बागी के साथ मुलाकात-सी है. साहित्य की उस ताकत को रेखांकित करती जो हमें सुनने, समझने और सवाल करने की ताकत देती है.

द व्यू फ्रॉम हियर पुस्तक का कवर
द व्यू फ्रॉम हियर पुस्तक का कवर

द व्यू फ्रॉम हेयर के पन्नों को पलटना, असहमति के सहेजे हुए अभयारण्य में कदम रखने जैसा है. यह संग्रह बहुभाषी और एक भारत में फैले कई भारतों का ऐसा दस्तावेज है जो भारतीय चेतना को परिभाषित करता है.

ऐसी चेतना जो एकल सांचे के बढ़ते साए से जूझ रही है. उन स्थितियों के प्रति एक बहुध्वन्यात्मक प्रतिक्रिया जिन्हें संपादक गीता हरिहरन और के सच्चिदानंदन 'घेरेबंदी का समय’ कहते हैं.

इस संग्रह की आत्मा बर्तोल्त ब्रेख्त के उस मर्मभेदी प्रश्न पर टिकी है, क्या अंधेरे समय में भी गीत गाए जाएंगे? संपादकों ने गुफ्तगू  पत्रिका के सात वर्षों के तेईस अंकों की रचनाओं को इसलिए संकलित किया है ताकि सिद्ध किया जा सके कि कला हमारे समय की विलासिता नहीं बल्कि अस्तित्व को बचाए रखने का एक मौलिक हथियार है.

जब सांस्कृतिक स्थान सिकुड़ रहे हों तब लेखक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है. कभी-कभार शब्द, छवि और कविता, हथियारों से अधिक प्रभावी होते हैं क्योंकि इनका लक्ष्य भय और उदासीनता की आंतरिक संरचना होती है.

यह संग्रह दो हिस्सों में विभाजित है, अफ्रेम्ड: शॉर्ट फिक्शन  और सर्वाइवल लिरिक्स: पोयम्स.
शॉर्ट फिक्शन में हम कथा के एक क्रांतिकारी लोकतंत्रीकरण को देखते हैं. बाबूराव बागुल और दलपत चौहान से लेकर कमला दास और सआदत हसन मंटो की ऐतिहासिक गरिमा तक यह गद्य हाशिए पर रहने वालों के लिए एक विजिटिंग कार्ड  का काम करता है. ये कहानियां दरअसल कहानी कहने की पारंपरिक सीमाओं को नकारती हैं और जाति, लिंग और धार्मिक पहचान की पथरीली, अक्सर क्रूर वास्तविकताओं को दर्शाती हैं.

इसी तरह सर्वाइवल लिरिक्स में काव्यात्मक रूप से राजनीतिक कविताएं हैं. मलयालम, तमिल, मराठी, पंजाबी, हिंदी, गुजराती और उर्दू जैसे विशाल भाषाई जलाशयों से अमृत निकालती यह पुस्तक पाठक को याद दिलाती है कि अनुवाद भी उन रूपकों के जरिए जीने का एक तरीका है जो अन्यथा अप्राप्य होते हैं.

पुस्तक के संपादकीय में एक जगह 'बंजर भूमि’ प्रतीक आता है. एक भय कि राष्ट्र की रचनात्मक मिट्टी में अधिनायकवाद का नमक मिलाया जा रहा है. फिर भी अपनी रचनात्मकता में प्रतिरोध की रोशनी बचाए रखने वाले लेखकों की उपस्थिति एक अंतर्निहित उर्वरता का संकेत देती है.

द व्यू फ्रॉम हेयर  पुस्तक भोर में एक बागी के साथ मुलाकात-सी है. साहित्य की उस ताकत को रेखांकित करती जो हमें सुनने, समझने और सवाल करने की ताकत देती है. हमें याद दिलाती कि भले ही अंधेरा समय बना रहे लेकिन यह 'बहुभाषी प्रवाह’ ही है जो सुनिश्चित करता है कि हमारी जमीन कितनी समृद्ध है. समकालीन सुर्खियों के पीछे छिपे 'कई भारतों’ को समझने वालों के लिए यह संग्रह एक कंपास, एक दिशा सूचक यंत्र का काम करता है.

पुस्तक का नाम: द व्यू फ्रॉम हेयर 
संपादक: गीता हरिहरन, के. सच्चिदानंदन
प्रकाशन: साइमन ऐंड शूस्टर
कीमत: 599 रुपए.

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