राग और रागिनियों का उत्सवधर्मी मन

संगीत का अनुरागी, जब संगीत का साहित्य रचने लगे तो वह साहित्यकार नहीं रह जाता, स्वयं राग, लय, छंद बन जाता है. यतीन्द्र सिर्फ संगीत के अनुरागी नहीं, संगीत के गहन जानकार हैं.

नैनन में आन-बान पुस्तक का कवर
नैनन में आन-बान पुस्तक का कवर

- मालिनी अवस्थी

अयोध्या में विवाह समारोह में गीत गूंज उठा, इन गलियन में लइयो रे रघुनाथ बना को...यह बन्ना हमारी दादी गाती हैं राग बिहाग में. यह कौन बोला, मैंने अचरज से देखा, बड़ी-बड़ी आंखों वाला जिज्ञासु युवा मुझे बहुत भावपूर्ण तरह से देख रहा था. राजा साहब अयोध्या के सुपुत्र यतीन्द्र मिश्र यानी युवा मोहित से मेरा पहला संवाद. राग बिहाग. इस युवा को रागदारी की ऐसी मालूमात कैसे?

तब मुझे राजसदन अयोध्या के पारिवारिक संगीत संस्कार का अनुमान ही कहां था! परिवार में राजकुमारी विमला देवी जी से मैं मिल चुकी थी. दृढ़ किंतु सौम्य मुख भंगिमा के भीतर छुपा राजसदन का गरिमामय इतिहास. युवा यतीन्द्र की बात सुन मैं हंसी और पूछा, 'दादी का कुछ है, तो सुनाओ.’ वह बोला, ''अब तो दादी बीमार हैं, रिकॉर्डिंग हैं और सब रिकॉर्डिंग  स्पूल में हैं.’’ दादी और रिकॉर्डिंग ! एक पल में सब कुछ समझ में आ गया.

समय बीता. सरयू में बहुत नीर बह गया. आज अयोध्या के यतीन्द्र मिश्र देश के जाने-माने साहित्यकार हैं. उनके बहुआयामी लेखन में संगीत की जानकारी जिस तरह बह-बहकर छलकती है, वह अयोध्या में घर से मिले उन्नत सांगीतिक विरासत का आशीर्वाद है, जो लेखनी में बरस रहा है.

संगीत का अनुरागी, जब संगीत का साहित्य रचने लगे तो वह साहित्यकार नहीं रह जाता, स्वयं राग, लय, छंद बन जाता है. यतीन्द्र सिर्फ संगीत के अनुरागी नहीं, संगीत के गहन जानकार हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने बाकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली. राग-रागिनियों, कला साधकों और बंदिशकारों को सुनने-गुनने का संस्कार उन्हें विरासत में मिला है, जिसे उन्होंने अन्त:सलिल कर लिया.

भारतीय संगीत का आकाश श्रेष्ठ कलावंत रूपी नक्षत्रों से आच्छादित है, एक से बढ़कर एक नगीने. इनमें से कितने ही अपने जीवन काल में किंवदंती बन गए और अपनी महानता के बोध से अछूते जीवन की अंतिम सांस तक संगीत साधना करते रहे. यह दुर्भाग्य है कि जितना लेखन ऐसे साधकों पर होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ.

यतीन्द्र मिश्र को इस बात के लिए हृदय से साधुवाद कि उन्होंने कला साधकों को अपनी लेखनी से अमरत्व प्रदान किया. उनकी नई पुस्तक नैनन में आन-बान  राग मुल्तानी की बंदिश से शीर्षक लेकर अपना मार्ग चुनती है. बारह सुरों की तरह संगीत की बेजोड़ बारह शख्सियतों की सांगीतिक उपस्थिति का सुरीला दस्तावेज. पीड़ा से उबरने की कोशिश में लिखा गया गद्य. उज्ज्वल और सुरीला.

जैसे शुद्ध और कोमल स्वरों का अपना अलग स्थान है, अलग प्रभाव है, वैसे ही इस किताब में जयपुर-अतरौली घराने की महान गायिका केसरबाई केरकर हैं, विलक्षण उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब, बनारस की ठसक रसूलनबाई, उस्ताद अमीर खां साहब, गंगूबाई हंगल और अपनी पुकार से प्रभु को वश में करने वाले पंडित भीमसेन जोशी.

स्वरसिद्ध सिद्धेश्वरी जी और अपने गायन में नवाचार रचते पंडित कुमार गंधर्व मौजूद हैं. लाजवाब बेगम अख्तर और बृजमंडल को गायन में उतारते पंडित जसराज. विद्रोहिणी तेवर की अनन्य साधिका गान सरस्वती किशोरी अमोणकर और अपने कंठ में बनारस की नायिका को असीम व्याप्ति देने वाली स्वरसाधिका गिरिजा देवी.

यतीन्द्र की लेखनी प्रत्येक कलाकार की गायकी को विस्तार से बरतते हुए बहुत गहनता से पाठकों के सामने उकेरती है. जटिल ताल, राग का सूक्ष्म विवेचन हो या फिर रागदारी बरतते हुए हर कलाकार का मन-मिजाज, किताब में सब मौजूद है.

यतीन्द्र की भाषा सरल है और गहन भी. इस बात की प्रशंसा की जानी चाहिए कि संगीत के दुर्लभ स्वरों, तालों-रागों, तानों और उनके व्याकरण की संरचनाओं को बखानते हुए भी उनकी लेखन शैली शुष्कता से बचती, तारतम्य बनाती आगे बढ़ती है. काव्यात्मक रूपकों से सजाते हुए रस स्थायी रूप से बना रहता है. इस शैली में किस्सागोई भी है और संगीत के निर्मल छात्र का विनम्र भाव भी.

सबसे दिलचस्प है किताब का दूसरा भाग, जहां लोकसंगीत अपने पूरे वैभव के साथ शास्त्रीय संगीत के सहोदर में बैठकर अपना लोकपथ निहारता है. दक्षिण और उत्तर का संगीत. श्रीराम के सोहर और वन-गमन की मार्मिक पीड़ा का बखान.

ठुमरी, चैती से लेकर ध्रुपद और कीर्तन परंपरा पर विचार और इन सबके बीच से बाइयों का जमाना, मंदिरों की संगीत परंपरा और कुछ दुर्लभ बंदिशों से जुड़ी कहानियां. जैसे जादू का एक पिटारा-सा खुलता जाता है, विचारवान और उत्सव संजोता हुआ, जो नैनन में आन-बान को रसिकों, शोधार्थियों के लिए एक जरूरी पाठ बना देता है.

पुस्तक का नाम: नैनन में आन-बान
लेखक: यतीन्द्र मिश्र 
प्रकाशन: पेंगुइन स्वदेश
कीमत; 399 रुपए 

Read more!