विभाजित दुनिया का सच
यह किताब समकालीन समाज और राजनीति पर बहुतेरे ऐसे सवाल छोड़ जाती है, जिनसे बच पाना आसान नहीं. सामंजस्य की जटिल राजनीति के बीच हामिद अंसारी उस संभावना की तलाश करते है.

संविधान की चर्चा में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे शब्द जिस आदर्श के साथ सुनाई देते हैं, सामाजिक यथार्थ में उनकी उपस्थिति उतनी स्पष्ट नहीं दिखती. इन मूल्यों का सचमुच जीवन का हिस्सा बन जाना कई बार किसी आदर्श लोक की कल्पना जैसा लगता है.
संविधान की इसी कल्पना और उसकी जमीनी दूरी को देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी अपनी किताब में समझने और समझाने की कोशिश करते हैं. यह पुस्तक उनके लेखों और विचारों का संकलन है, जिसमें उन्होंने भारत समेत पूरी दुनिया के बदलते सामाजिक-राजनीतिक माहौल पर अपनी चिंताएं दर्ज की हैं.
किसी वैचारिक आडंबर से दूर सीधे और स्पष्ट बात रखती यह किताब सिद्धांत गढ़ने की कोशिश कम और समकालीन हालात पर 38 वर्षों तक विदेश सेवा में रहे एक राजनयिक का अनुभव अधिक है. किताब के पहले हिस्से में राजव्यवस्था पर लेख हैं और दूसरा हिस्सा जोन ऑफ टर्बुलेंस नाम से है, जो संघर्ष से जूझ रहे देशों, खासकर पश्चिम एशिया, और भारत के साथ रिश्तों की पड़ताल है.
किताब का अंतिम पाठ इंडिया एट 2047 है, जिसमें स्वप्न, समाज, नीतियां और चुनौतियों की ओर इशारा करते हुए सलाह भी है, चेतावनी भी.
यह किताब समकालीन समाज और राजनीति पर बहुतेरे ऐसे सवाल छोड़ जाती है, जिनसे बच पाना आसान नहीं. सामंजस्य की जटिल राजनीति के बीच हामिद अंसारी उस संभावना की तलाश करते हैं जिसमें विभाजित दुनिया के बीच संवाद और सहयोग की कुछ गुंजाइश बची रह सके.
पुस्तक का नाम: आर्ग्युएबली कंटेंशियस
थॉट्स ऑन ए
डिवाइडेड वर्ल्ड
लेखक: एम. हामिद अंसारी
प्रकाशन: रूपा पब्लिकेशंस
कीमत: 595 रुपए