बीता जीवन देख रहा है

बंगाल में मछली केवल भोजन नहीं है, वह संस्कृति है, जीवन है. अमिताव घोष इस प्रतीक को रोजमर्रा के अनुभवों में घोल देते हैं. सुंदरबन के संदर्भ आते हैं, पर्यावरणीय संकट की आहट मिलती है.

घोस्ट-आई किताब का कवर
घोस्ट-आई किताब का कवर

- आशुतोष कुमार ठाकुर

अमिताव घोष का उपन्यास घोस्ट-आइ किसी बड़े घटनाक्रम से नहीं, बल्कि एक छोटे-से असहज क्षण से शुरू होता है. एक बच्ची मछली खाने की जिद करती है. यह जिद असामान्य नहीं है, सिवाय इसके कि वह ऐसे घर में उठती है जहां मछली निषिद्ध है, और सिवाय इसके कि वह कहती है कि उसने मछली पहले भी खाई है,

किसी और जीवन में, किसी और नदी के किनारे, किसी और मां के साथ. यह दृश्य नाटकीय नहीं है. लगभग घरेलू है. लेकिन इसी मामूली असहजता से एक ऐसा उपन्यास जन्म लेता है, जो धीरे-धीरे हमारी स्थिर मान्यताओं को अस्थिर करने लगता है.

उपन्यास की केंद्रीय पात्र वर्षा गुप्ता तीन वर्ष की बच्ची है जो 1960 के दशक के कलकत्ता में एक परंपरागत मारवाड़ी परिवार में रहती है. वर्षा को अपना पिछला जीवन याद है. यह बात परिवार को भयभीत नहीं करती, असहज करती है. उनके पास इस अनुभव को समझने की कोई भाषा नहीं है.

यहीं से कथा में प्रवेश होता है मनोचिकित्सक डॉ. शोमा बोस का. वे वर्षा की बातों को न स्वीकार करती हैं, न खारिज. वे उन्हें दर्ज करती हैं, उनके साथ ठहरती हैं. आज के समय में, जब हर बात को तुरंत वर्गीकृत कर देना जरूरी समझा जाता है, यह ठहराव अपने आप में एक नैतिक स्थिति बन जाता है.

घोस्ट-आइ पुनर्जन्म को रहस्य या चमत्कार में बदलने से बचता है. वर्षा की स्मृतियां किसी कहानी की तरह नहीं आतीं. वे बिखरी हुई हैं. मछली का स्वाद, पानी की छवि, किसी और मां की उपस्थिति. ये स्मृतियां भाषा और समय की सीमाओं को पार करती हैं. घोष यहां संकेत करते हैं कि स्मृति कोई निजी संप‌‌त्ति नहीं है. वह व्यक्ति से बाहर भी बह सकती है. वह रेखीय नहीं होती. वह लौटती है, बिना अनुमति.

उपन्यास का दूसरा हिस्सा वर्तमान समय में पहुंचता है. शोमा बोस के भांजे दीनानाथ दत्त, जिन्हें दीना कहा जाता है, अब ब्रुकलिन में रहते हैं. उनका जीवन प्रवासी अनुभवों से भरा है, स्थिर नौकरी, भौगोलिक दूरी और भीतर कहीं एक अनकहा खालीपन. दीना का अपनी मौसी के पुराने कागजों की ओर लौटना किसी खोज की तरह नहीं, बल्कि एक धीमे पुन:संपर्क की तरह घटित होता है. अतीत यहां किसी उत्तर की तरह नहीं बल्कि एक अधूरी उपस्थिति की तरह आता है.

मछली इस उपन्यास में कई-कई बार आती है. बंगाल में मछली केवल भोजन नहीं है, वह संस्कृति है, जीवन है. घोष इस प्रतीक को रोजमर्रा के अनुभवों में घोल देते हैं. सुंदरबन के संदर्भ आते हैं, पर्यावरणीय संकट की आहट मिलती है, लेकिन उपन्यास किसी चेतावनी-पट्टी की तरह नहीं बदलता. यहां पर्यावरण एक बेचैनी है, नाजुकता है, जिसे देखा जा सकता है, पर पूरी तरह समझा नहीं जा सकता.

घोस्ट-आइ शीर्षक, देखने के एक अलग ढंग की ओर इशारा करता है. अलग रंगों वाली आंखें, जो एक से अधिक संसार देख सकती हैं. यह भूत किसी डरावनी उपस्थिति का नाम नहीं है.

उपन्यास समापन से बचता है. उत्तर नहीं देता. अधूरापन सौंपता है और यही उसका साहस है.

पुस्तक का नाम: घोस्ट-आइ
लेखक: अमिताव घोष
प्रकाशन: हार्पर कॉलिन्स
कीमत: 799 रुपए.

Read more!