मां! जो कहीं नहीं जाती
बैचलर्स किचन पुस्तक एक स्मृति गाथा है, जिसमें मां की उपस्थिति-अनुपस्थिति को मार्मिक ढंग से याद किया गया है

- गगन गिल
बैचलर्स किचन शीर्षक पढ़ कर बिल्कुल अनुमान नहीं होता कि यह एक स्मृति गाथा है, कि इसमें मां की उपस्थिति-अनुपस्थिति को ऐसे मार्मिक ढंग से याद किया होगा. मां यानी जीवन देने वाली, संसार की पहली अमृत घूंट पिलाने वाली. अपने पिल्लू को पोर-पोर बड़ा करने वाली.
किताब का स्वर अनूठी तरह से एलिजिएक है, शोकमय मगर जिजीविषा को ऊपर उठाता हुआ. एक विकट संसार में मां की रसोई के स्वाद के साथ स्वाभिमानी जीवन जीने का पराक्रम. एक युवा पुरुष की रसोई विजय की यह गाथा वैसी ही रोमांचक है जैसी पहले-पहल अक्षर पहचानने में समर्थ या वेतन कमाने वाली किसी महिला की रही होगी.
सरल दीखती यह किताब कई संसारों में विचरती चलती है. स्वाद, गन्ध, रंग की तीखी अनुभूति जगाती. यहां दृश्य का जादू है और स्मृति का भी. मसालों के एक दूसरे के संपर्क में आकर रंग बदलने का तिलिस्म, चूल्हे पर सब्जी का हरा टटका रंग बचाने के टोटके. थाली परोसने की प्रविधि और परोसने वाले मन की कूट लिपियां. प्रेम की भाषा बनता भोजन और उसकी सघन प्रक्रिया. दोपहर और रात की थाली में अंतर के पीछे का विज्ञान.
सहज वर्णन में ऐसे अप्रचलित शब्द हैं कि आश्चर्य होता है, हमारी बोलियों ने ऐसे मौजूं शब्द गढ़े हैं. भाषा का स्वाद चखने के लिए भी यह किताब पढ़ी जानी चाहिए.
स्वयं लेखक की जो छवियां यहां बनती हैं, अधिकतर एक बालक के अपनी मां के आंचल में जा छिपने की हैं. दूसरी ओर बड़ों की दुनिया है, हिंसा है जिससे मां ही बचा सकती है. यह एक विचित्र सा दृश्य है.
बैचलर्स किचन में एक लेखक अपनी बाल अवस्था, उसके बाद के वर्षों को लिख रहा है और इतना भोला, वेध्य और फिर भी दुनिया के समक्ष ऐसी मजबूती से बड़ा होता दिखता है. यह मजबूत व्यक्ति इसकी मां ने गढ़ा है. यह मां का पराक्रम है, मां का साधुवाद.
किताब इतने सुंदर चित्रों के साथ छपी है कि इसके चित्रकार महेश वर्मा और प्रकाशक अलिंद माहेश्वरी ने भी मां की रसोई को उतना ही सेलिब्रेट किया है जितना इसके लेखक विनीत कुमार ने, इसमें कोई शक नहीं रहता.
पुस्तक का नाम: बैचलर्स किचन
लेखक का नाम: विनीत कुमार
प्रकाशन: युवान (अनबाउंड स्क्रिप्ट)
कीमत: 299 रुपए.