छोड़ गए जो एक विरासत

पिछले साल कुछ ऐसी हस्तियों ने दुनिया को अलविदा कहा, जिन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए याद किया जाएगा

विनोद कुमार शुक्ल

विनोद कुमार शुक्ल 1937, हिंदी कवि-कथाकार

यह अचरज की बात है और शायद हमारे देश की एक सांस्कृतिक विशेषता भी कि किसी दूरस्थ प्रदेश के लेखक की ठेठ प्रांतिक लेखनी पुणे के फिल्म संस्थान जैसे राष्ट्रीय स्थान पर विविध भाषाओं और संस्कारों से आए छात्रों को समान रूप से आकर्षित कर ले. यह कोई साधारण बात नहीं है. सबसे पहले मणिकौल ने विनोद कुमार शुक्ल की दो रचनाओं पर फिल्में बनाईं.

एक फीचर फिल्म नौकर की कमीज और एक लघु फिल्म भोज. इन फिल्मों ने उनकी भाषा की दृश्यात्मक क्षमता को इतने सघन और रोचक रूप में प्रस्तुत किया कि उसके बाद फिल्म संस्थान से उनका संवाद कभी समाप्त ही नहीं हुआ. अनेक विद्यार्थियों ने उनकी कहानियों पर अपनी अभ्यास फिल्में बनाईं. हम यह समझने की कोशिश करते थे कि कठिन शब्द और जटिल लेखन दृश्य में कैसे बदले जा सकते हैं. ऐसे वातावरण में विनोद जी की सीधी-सादी सधी हुई और अत्यंत सूक्ष्म भाषा का इस तरह सहज रूप से उपस्थित हो जाना अपने आप में असाधारण था.

शायद इसका कारण यह है कि विनोद जी मौन रचते थे. इससे भी सटीक यह कहना होगा कि उनके यहां बोलने से मौन उत्पन्न होता है. सामान्यत: ये दोनों बातें एक दूसरे के विपरीत मानी जाती हैं, पर उनकी भाषा में वे एक साथ घटित होती हैं. यही सिनेमा का भी सार है. दो शॉट्स के बीच का मौन वही स्थान है जहां अर्थ जन्म लेता है. पंडित प्राणनाथ ने एक बार कहा था कि राग दो स्वरों के बीच घटित होता है. इसी तरह यह प्रश्न उठता है कि विनोद जी के दो वाक्यों के बीच क्या घटित होता है?

एक दिन कैंटीन में अभिनय और कैमरे के लेंस के संबंध पर बातचीत हो रही थी. किसी छात्र ने इस विषय पर प्रश्न किया था. मैंने उत्तर दिया कि लेंस केवल रिकॉर्ड करने का यंत्र नहीं लगता बल्कि उससे कुछ अधिक है. पहले वह फ्रेम में पृष्ठभूमि और अग्रभूमि के संबंध को तय करता है और इसी से मोटे तौर पर यह निर्धारित हो जाता है कि क्या दिखाई देगा और क्या नहीं. इस प्रक्रिया में वह दृश्य को सीमित तो करता है पर उसी सीमा के भीतर एक तरह की रहस्यमयी गहराई भी रच देता है.

अगर अभिनेता लेंस की इस दृष्टि को समझ ले तो शायद वह स्वयं को दृश्य के भीतर एक सजीव तत्व की तरह स्थापित कर सकता है. विनोद जी की लेखनी भी कुछ इसी तरह निर्मित होती है. उनकी कहानियां तेजी से आगे नहीं बढ़तीं. वे एक-एक पंक्ति के माध्यम से धीरे-धीरे अपना संसार रचती हैं. शब्दों-दृश्यों का यह क्रमिक निर्माण फिल्म के लिए सहायक सिद्ध होता है. उनकी कहानियां दृश्य के विस्तार से अधिक उसकी कसावट से जुड़ी होती हैं. जैसे कैमरे का फ्रेम सीमित होकर भी दृष्टि को गहरा करता है वैसे ही उनकी भाषा साधारण होकर भी अर्थ को गहरा करती है.

इस बातचीत में उन दिनों अभिनय के छात्र पुष्पेंद्र और उसका मित्र ब्रह्मा भी उपस्थित थे. उन्होंने कहा कि उनकी कक्षा मेरे साथ एक अभ्यास फिल्म बनाना चाहती है. हम साथ बैठे और कई कहानियां पढ़ीं. अंतत: विनोद जी की कहानी पेड़ पर कमरा पर काम करने का निर्णय लिया गया. पहली कहानी के फिल्मांकन में पुष्पेंद्र और ब्रह्मा शामिल नहीं हो पाए. उनके लिए मेरे मन में आई विनोद जी की कहानी आदमी की औरत. समय बहुत कम था. अब यह कहानी 'बनाई' नहीं जा सकती थी. उसे घटित होने देना था. हाथ में कहानी के पन्ने पकड़े हम सीधे मैदान में उतर गए. वहां जो घटित हुआ वह चकित कर देने वाला था. कहानी की प्रत्येक पंक्ति इस तरह दृश्य में बदलती चली गई मानो वह पहले से ही हमारी फिल्म को ध्यान में रख कर लिखी गई हो. 

विनोदजी के पात्र विश्लेषण का विषय नहीं बनते. वे एकायामी प्रतीक के रूप में खड़े नहीं रहते. वे अपने छोटे से संसार में अपने ही प्रकाश में रहते हैं. घटनाओं की न व्याख्या होती है और न निष्कर्ष. केवल स्थितियां होती हैं जिनमें जीवन धीरे धीरे झरता रहता है.

विनोद कुमार शुक्ल पर यह स्मृतिलेख एफटीआइआइ से पढ़े लेखक-फिल्मकार अमित दत्त ने लिखा है.

अब जानते हैं, उन हस्तियों के बारे में जो अपनी विरासत छोड़ हमारे बीच से हमेशा के लिए चले गए-

वी.एस. अच्युतानंदन, जन्म 1923, माकपा नेता, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री

भारत के इस दिग्गज वामपंथी नेता ने पिछले वर्ष जुलाई में 101 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली. कट्टर 'लाल सलाम' विचारधारा वाले ये पुराने धुरंधर राज्य में सभी दलों में सबसे लोकप्रिय नेता थे. युवा पीढ़ी के बीच 'अचुमामा' नाम से ख्यात वी.एस. महज 14 वर्ष की आयु में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे और 1964 में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या माकपा मूल पार्टी से अलग हुई, तब वे इसके संस्थापक सदस्यों में से एक बने. हमेशा मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दूसरे स्थान तक ही पहुंच पाने वाले वी.एस. आखिरकार 82 वर्ष की आयु में (2006-2011) मुख्यमंत्री बने. भ्रष्टाचार, भूमि हड़पने आदि के खिलाफ मुखर और अडिग रुख ने उन्हें जनता का चहेता बना दिया लेकिन बाद के वर्षों में पार्टी ने उन्हें दरकिनार कर दिया.

वी.एस. अच्युतानंदन माकपा नेता, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री

के. कस्तूरीरंगन जन्म 1940, पूर्व अध्यक्ष, इसरो

डॉ. कस्तूरीरंगन ने न केवल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और अंतरिक्ष आयोग को नए मुकाम पर पहुंचाया, बल्कि राज्यसभा सदस्य, योजना आयोग के सदस्य और विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख के तौर पर भारत के विज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी नीतियों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के निर्माता बने और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा संचालन समिति का भी नेतृत्व किया. कुशल खगोल भौतिक विज्ञानी कस्तूरीरंगन के इसरो अध्यक्ष के तौर पर नौ वर्ष के कार्यकाल (1994-2003) के दौरान ही अंतरिक्ष एजेंसी ने भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (इनसैट-2), भारतीय रिमोट सेंसिंग उपग्रह (आइआरएस-1ए और 1बी) विकसित किए और प्रमुख उपग्रह प्रक्षेपण यान पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) को संचालित करने में सफलता हासिल की.

के. कस्तूरीरंगन पूर्व अध्यक्ष, इसरो

जयंत नार्लीकर, जन्म 1938, खगोल भौतिकीविद् और विज्ञान शिक्षक

जयंत विष्णु नार्लीकर ने आजीवन समर्पण के साथ स्थापित सिद्धांतों से आगे बढ़कर सोचने को भारत की वैज्ञानिक संस्कृति का हिस्सा बनाया. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रशिक्षण के बाद उन्होंने फ्रेड होयल के साथ मिलकर होयल-नार्लीकर गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत प्रतिपादित किया और ब्रह्मांड के निर्माण से जुड़े बिग बैंग सिद्धांत को चुनौती दी.  

जयंत नार्लीकर, खगोल भौतिकीविद् और विज्ञान शिक्षक

 

 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे नार्लीकर एक दृढ़ सिद्धांतकार, सुरुचिपूर्ण लेखक और बौद्धिक संकीर्णता के आलोचक भी थे. 26 वर्ष की आयु में वे पद्मभूषण से सम्मानित हुए. उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालय खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी केंद्र की स्थापना की, जिससे विश्वविद्यालय स्तर पर अनुसंधान में क्रांतिकारी परिवर्तन आया. खुशमिजाज और सुलभ नार्लीकर ने अंग्रेजी और मराठी में लिखे उपन्यासों और निबंधों के माध्यम से विज्ञान को लोकप्रिय बनाया.

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