धुरंधरों का पूरा धमाल
मन और मोह की वर्जनाओं से गुजरते हुए सिनेमा ने ग्रेसफुल तरीके से ललकारने का अपना काम तो किया ही, गांव-खेड़े की उस जमीन को भी तर किया जहां से कहानियां उपजती रही हैं

- गजेंद्र सिंह भाटी
साबर बोंडा
लूका ग्वादानीनो की भीनी भीनी बयार वाली ''कॉल मी बाय योर नेम’’ दो पुरुषों के प्रेम और वर्जित कामनाओं को दिखाने के लिए आड़ू के रसीले फल को रूपक बनाती है. डायरेक्टर रोहन कानावड़े की यह डेब्यू आत्मकथात्मक मराठी फिल्म भी यही करती है. अपने शीर्षक में यही स्थान पेरू के फल (केक्टस पीयर) को देती है.
यह आनंद की कहानी है. वह मुंबई में कॉल सेंटर में काम करता है. पिता का देहांत होने पर गांव आता है. उसी माहौल में जहां उसकी पहचान को स्वीकार करने वाला कोई नहीं. 10 दिनों के शोक-काल में उसका अपने बचपन के दोस्त बाल्या से पुन: संपर्क होता है. पुराना प्रेम जगता है. मीठा, ग्रेस से भरा, अमूर्त. मन मोह लेने वाली राइटिंग. सनडांस में वर्ल्ड सिनेमा ग्रैंड ज्यूरी प्राइज जीती साबर बोंडा ग्रामीण जीवन में समलैंगिक संबंधों पर बनी माइलस्टोन मूवी है.
धुरंधर
म्यूनिख और फौदा की राह चलते-चलते डायरेक्टर आदित्य धर की यह विस्फोटक, नशीली, आनंद के ज्वारभाटे वाली स्पाय थ्रिलर उनसे भी आगे निकल गई. अंतत: अपनी तरह की पहली फिल्म हो गई. संसद पर हमले के बाद जब भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान की ''अ थाउज़ेंट कट पॉलिसी’’ से आजिज आ जाता है तो एक ऑपरेशन लॉन्च किया जाता है.
ऑपरेशन धुरंधर. एक विध्वंसक एसेट पाकिस्तान भेजा जाता है. वह ल्यारी टाउन के गैंगस्टर्स के जरिए कराची और पाकिस्तान के भारत-विरोधी तंत्र में एम्बेड होता है. मार्च 2026 में फिल्म के भाग 2 में वह उन्हें चुन-चुन कर मारता दिखेगा. यकीनन 2025 में धुरंधर जैसी प्रचंड फिल्म कोई न थी. एक मॉडर्न क्लासिक, जो इंडियन सिनेमा को बहुत अर्थों में बदल गई. एक न्यू नॉर्मल स्थापित कर गई. सॉलिड फिल्ममेकिंग.
कांतारा: अ लेजेंड—चैप्टर 1
2022 में 16 करोड़ की एक अदनी-सी कन्नड़ फिल्म आई कांतारा. भारत के माइथोलॉजिकल सिनेमा में डोरे डाल गई. क्राफ्ट और कलेक्शन में बेमिसाल फिल्म. कांतारा चैप्टर 1 ने इस काम में यह कमाल किया कि वह ओरिजिनल से भी ज्यादा विराट साबित हुई. कहानी में एक कबीला काला जादू करके देवताओं को बांधने का प्रयास करता है.
वही काला जादू फिल्म के मनोरंजन ने किया. दर्शकों को सीटों से बांध दिया. हम चाहकर भी न हिल सके. भारी उम्मीदों के बाद भी अगर कोई फिल्म आपको भौचक्का कर दे तो वह सिद्ध सिनेमा है. ऐक्टर-डायरेक्टर ऋषभ शेट्टी ने अपनी इन्वेंटिवनेस और महत्वाकांक्षी विजन के साथ धारणाओं को धता बताया. नया मानक गढ़ा कि सीक्वल, प्रीक्वल भी ज्यादा ताकतवर हो सकते हैं. निर्विवाद रूप से उनकी फिल्म फौलादी थी.
सू फ्रॉम सो
बिलाशक ऐसी हॉरर कॉमेडी फिल्म नहीं बनी. ऐसी हॉरर फिल्म जिसमें कोई भूत नहीं है लेकिन आप लगातार डरते हैं और ठठाकर हंसते हैं. नायाब और जबरदस्त फिल्म. कहानी है एक छोटे-से गांव सोमेरा की जहां एक से एक विचित्र हंसोड़ पात्र हैं. इन्हीं में से एक है अशोक. एक रात नशे में धुत्त वह बाथरूम की खिड़की से किसी महिला को ताकने की नाकाम कोशिश करता है.
यहीं से उसकी और गांव वालों की लाइफ में भूचाल आता है. सुबह उठते हैं तो उसमें एक बुजुर्ग महिला सुलोचना का भूत कथित तौर पर घुस चुका होता है. भगाने के लिए एक फैंसी बाबा को भी लाया जाता है. अब क्या होगा? स्वादिष्ट खाना, शराब, पार्टियां, हंगामे, अजब-गजब ग्राम्य जीवन, मनमोहक इमोशन इस फिल्म की जान हैं. डायरेक्टर जे.पी. थुमिनाड (अशोक) ने नन्हा शाहकार रचा.
अंगम्मल
यह भी 2025 की कमाल की विरली फिल्म थी. ऐसी बुजुर्ग महिला अंगम्मल (गीता कैलासम) की कहानी जैसी दुनिया के सिनेमा में संभवत: नहीं देखी गई. जिद्दी, बोल्ड, बीड़ी फूंकने वाली, गालियां बकने वाली, किसी नियम और झिझक को न मानने वाली और साड़ी के नीचे कभी ब्लाउज न पहनने वाली, क्योंकि वह उसे आरामदायक नहीं लगता है.
अंगम्मल का नौजवान डॉक्टर बेटा अपनी शहरी गर्लफ्रेंड और उसके पैरेंट्स को गांव लाना चाहता है लेकिन मां का ब्लाउज न पहनना उसके लिए एक बड़ा मसला बन जाता है. टकराव होता है. वह मनाता है लेकिन अंगम्मल मान जाए, सवाल ही नहीं उठता. एक भावनात्मक द्वंद्व चलता है. इस क्रम में डायरेकटर विपिन राधाकृष्णन हमें एक इंगेजिंग और दुर्लभ सिनेमा अनुभव देते हैं. एक मस्ट वॉच फिल्म.