शारदा सिन्हा: पुरबिया अस्मिता की आवाज
शारदा जी की पहचान की एक बड़ी रेखा है, बिहारी और पुरबिया अस्मिता को अपनी शर्तों पर वहां पहुंचाना, जहां पहुंचाने की क्षमता तो बहुतों में थीं, पर किसी ने कोशिश नहीं की

शारदा सिन्हा नहीं रहीं. करीब पखवाड़े भर जिंदगी उनके साथ शह-मात का खेल खेलती रही. पर संयोगों का संयोग कि जिस छठ पर्व को उन्होंने अपार विस्तार देने में गीतों के माध्यम से कालजयी भूमिका निभाई, उसी छठ पर्व के दौरान वे दुनिया से विदा हुईं.
उन्होंने पेशेवर गायन 1974 में शुरू किया था. पर गांव की गलियों में बिखरे छठ गीत 1978 में पहली दफा उनके स्वर में रिकॉर्ड हुए तो रातोरात ऐसे लोकप्रिय हुए कि बड़ी म्यूजिक कंपनियों और बॉलीवुड के नामी सिंगर्स तक में उन्हें गाने-लाने की होड़ मच गई.
वही शारदा जी शुरुआती दिनों में पटना आकाशवाणी के लिए अपने पहले ही ऑडिशन में छंट जाने से खासी निराश हो गई थीं. पर लखनऊ में एचएमवी के लिए जीवन के दूसरे ऑडिशन में उन्होंने द्वारछेकाई का गीत द्वार के छेकाई नेग...गाया और तुरंत चुन ली गईं. तभी उन्हें एहसास हुआ कि बिहार के पारंपरिक लोकगीतों का असर जब गैर बिहारियों पर इस कदर पड़ रहा है तो बिहारी और पुरबिया तो इससे और जुड़ेंगे. इसके बाद उन्होंने इसको गांव-गलियों में बिखरे विवाह गीतों पर भी आजमाया. पूरब के लोगों के लिए यह सब अप्रत्याशित-सा था. शारदा जी के गीतों में वे दादी-नानी के स्वर पा रहे थे. अपने गांव से दूर देश-प्रदेशों में रहने वाले लोग भी ये गीत साथ ले गए. शारदा सिन्हा लोकमानस और लोककंठ, दोनों में रच-बस गईं.
पारंपरिक गीतों से अलग शारदा सिन्हा ने कुछ ऐसे महत्वपूर्ण काम किए,जो न उनके पहले हुए थे, न अब भी उस अनुरूप हो रहे हैं. वे बिहार में कल्चरल गैप को पाटने वाली पहली ब्रिज बनीं. शारदा सिन्हा से पहले भोजपुरी गीत, मिथिला के इलाके में चलन में नहीं थे. जिस दौर में पटना में गंगा नदी पर ऐतिहासिक गांधी सेतु का निर्माण कर उत्तर और मध्य बिहार को जोड़ने की कोशिश हो रही थी, उसी दौर में शारदा जी गीतों के जरिए उत्तर और मध्य बिहार की दूरियों को पाटना शुरू कर रही थीं.
गांधी सेतु ने जितना बिहार को नहीं जोड़ा, उससे ज्यादा आत्मीय तौर पर शारदा सिन्हा के गीतों ने जोड़ा. दूसरा एक बड़ा योगदान रहा, बिहार के लोकसाहित्य को उसके असल रूप में उभारने का. उन्होंने अपने समय से आगे का गायन किया. एक ओर उन्होंने मैथिली में विद्यापति के गीतों को रिकॉर्ड करा विद्यापति के पद गायन में एक नई परंपरा की शुरुआत की, उसका सरलीकरण किया, सर्वग्राह्य बनाया; मिथिला के ही अहम गीतकार स्नेहलता के गीतों को गाकर जानकी विवाह गीतों को फैलाया.
दूसरी ओर बालेश्वर जैसे लोकप्रिय भोजपुरी गायकों के उफानी युग में जगदंबा घर में दियरा ...गीत गाकर धारा बदल दी. महेंदर मिसिर, विश्वनाथ सैदा, त्रिलोकीनाथ उपाध्याय, महादेव सिंह जैसे भोजपुरी लोककवियों की रचनाओं को गाना शुरू कर, भोजपुरी लोकगायन को एक नया आयाम दिया और भोजपुरी गायन को उसके साहित्य से जोड़ा. भोजपुरी के लिए यह एक नई दुनिया थी.
शारदा जी की पहचान की एक बड़ी रेखा है, बिहारी और पुरबिया अस्मिता को अपनी शर्तों पर वहां पहुंचाना, जहां पहुंचाने की क्षमता तो बहुतों में थीं, पर किसी ने कोशिश नहीं की.
बॉलीवुड में बिहारी लोकसंगीत को अपनी शर्तों पर पहुंचाना. शारदा सिन्हा की आवाज बॉलीवुड में मशहूर हुई मैंने प्यार किया फिल्म में गाए गीत कहे तोसे सजना...गीत से. बाद में अनुराग कश्यप ने गैंग्स ऑफ वासेपुर में उनसे तार बिजली से...गवाया. लेकिन बॉलीवुड में गाने से ज्यादा बड़ी उपलब्धि है पुरबिया लोकसंस्कृति को वहां तक पहुंचाना.
बिहार की सांस्कृतिक पहचान को बॉलीवुड से जोड़ने का यश भी शारदा जी के हिस्से आया और छठ को अपार विस्तार देने का यश भी हमेशा उनके ही नाम रहेगा. पर शारदा जी का जब मूल्यांकन होगा तो छठ गीतों से पार एक बड़ी दुनिया खुलेगी, जिसमें प्रतिरोध का स्वर भी होगा. समाज की पीड़ा भी.
शारदा जी ने ही तो गाया था हमसे ना होई बनिहरिया ए मालिक... उन्होंने ही तो गाया था रोइ रोइ पतिया लिखावे राजमतिया... शारदा जी ने ही बिहार के लोकगायन में सार्वजनिक मंच पर महिलाओं के लिए नाम, काम, दाम तीनों के रास्ते खोले. उनका जब भी मूल्यांकन होगा तो यह लिखा जाएगा कि उनका उदय न हुआ होता तो बिहारी और पुरबिया लोकसंगीत, सार्वजनिक मंचों पर सिर्फ पुरुष गायन का मंच होता.
रिटायर होने के पहले से ही वे प्लान कर रही थीं कि उन्हें कितने काम करने हैं. जब स्वर शारदा की परिकल्पना कर रही थीं तो कई बार पटना स्थित उनके नारायणी आवास मैं गया. वे बस इतना ही कहती थीं, नई पीढ़ी में कुछ लोगों को तैयार करना है, जो बचे काम को पूरा करें. ज्यादा नहीं, बस थोड़े लोग भी नई पीढ़ी से मिल जाएं जो रातोरात लोकप्रिय होने के मोह से बंधे न हों, जिनके लिए काम पहले और अहम हो, फिर नाम की कामना और तब दाम. कितने सपने थे उनके.
—निराला बिदेसिया