आखिर क्या पक रहा है
हुमा कुरेशी तरला दलाल की उन्हीं के नाम से बनी बायोपिक में कुकबुक लेखिका का किरदार अदा कर रही हैं.

तरला दलाल उन पहली कुक्स में से थीं जिन्हें लोगों ने टीवी पर देखा. उनकी कुछ याद है आपको?
उन्होंने औसत भारतीय महिला के टीवी पर होने को सहज-सामान्य बनाया. वे प्यारी-सी मिलनसार महिला थीं. घर पर उनकी कुकबुक होती थीं और मेरी मां उन्हें देखा करती थीं, चाहे चाइनीज बनाना हो, इटैलियन या मैंगो आइसक्रीम. फिल्म के एक दृश्य में तरला को उनकी पहली कुकबुक की कॉपी मिलती है. मुझे लगा, ओत्तेरे की! यह किताब तो घर में होती थी. और अब देखो, मैं उन्हीं के रोल में.
आपके वालिद ने दशकों दिल्ली में कामयाब रेस्तरां चलाया. खाने से आपका रिश्ता किस हद तक सीझकर तरला दलाल का किरदार निभाने में आया?
खाना शेयर करना प्यार साझा करने वाला काम है. यह रिश्ते बनाता है. हमें याद है कि कैसे हम टिफिन और ड्रिंक शेयर करते थे. हमें बताया जाता था कि इससे प्यार बढ़ता है. बेशक फिल्म बायोपिक है और दिखाती है कि वे कैसे आंत्रप्रेन्योर बनीं लेकिन यह भी दिखाती है कि उन्होंने इतनी महिलाओं की जिंदगी कैसे बदली और उनके व्यंजनों का क्या असर पड़ा.
किरदार के तौर पर आप तरला दलाल की व्याख्या कैसे करती हैं?
इरादा उनकी नकल या कैरिकैचर बनाने का नहीं था. मैं घिसा-पिटा गुजराती किरदार बिल्कुल नहीं करना चाहती थी. इरादा यही था कि उन्हें असल रखते हुए सार और उनकी आत्मा को अपने अंदर उतारा जाए. मैंने उनके ढेरों कुकिंग वीडियो देखे और पाया कि कई गृहिणियों की तरह वे मल्टीटास्किंग करती थीं. वे हाथों का बहुत इस्तेमाल करती थीं, उनके वाक्य पूरे नहीं होते थे, और वे शब्दों का गलत उच्चारण भी करती थीं.
महारानी और मोनिका, ओ माइ डार्लिंग सरीखी रिलीज के साथ क्या इसे आपकी प्रोफेशनल जिंदगी के सबसे अच्छे दौरों में से एक माना जाए?
देखिए, यहां तक पहुंचने में लंबा वक्त लगा है. मैंने गलतियां कीं, उन्हें जाना और फिर उनसे सबक लिया. शुरू के दिनों में मैं इस बात को लेकर परेशान रहती थी कि लोग भला क्या सोचेंगे मेरे बारे में! पर अब मजा आ रहा है. मुझ पर जीती-जागती, सांस लेती थ्री-डायमेंशनल महिलाओं को परदे पर उतारने की धुन सवार है, जो लोगों से कनेक्ट हो सकें.
—सुहानी सिंह.